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जब इंदिरा गांधी ने कहा था, 'मैं पीवी नरसिम्हा राव से परेशान हो गई हूं'

पीवी नरसिंह राव के साथ इंदिरा गांधी (फाइल फोटो)

पीवी नरसिंह राव के साथ इंदिरा गांधी (फाइल फोटो)

पीवी नरसिम्हा राव अगर ऐसे प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने अपनी नीतियों से देश को तरक्की की राह पर आगे बढाया तो अपने व्यक्तिगत जीवन में वो संबंधों को लेकर विवादित भी रहे.

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इंदिरा गांधी बुरी तरह झुंझलाई हुई थीं. उन्होंने कहा, 'मैं इस पीवी का क्या करुं. पीवी ने लक्ष्मीकांता अम्मा के साथ फ्लर्ट करने के अलावा कुछ नहीं किया. मैं परेशान हो गई हूं. मुझे उनके बेटे पर दया आती है.'

कांग्रेस के सीनियर लीडर और आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वेंगल राव ने अपनी ऑटोबॉयोग्राफी "ना जीविता कथा" (माई लाइफ स्टोरी) में इस वाकये का जिक्र किया. उन्होंने लिखा, " वो इंदिराजी से मुलाकात करने गए दिल्ली गए थे. इंदिराजी बुरी तरह झुंझलाई हुईं थीं. पीवी नरसिम्हा राव का नाम लेते ही फट पड़ीं." वेंगल राव ने किताब में लिखा, "उन्होंने इंदिराजी को पार्टी के किसी वरिष्ठ मंत्री पर इस तरह झुंझलाते हुए कम देखा था. इंदिरा जी ने कहा, "मैं उम्मीद नहीं करती थी कि वह इतने चरित्रहीन होंगे. जबकि उनके इतने बड़े बच्चे हैं".

वेंगल ने आत्मकथा में ये भी लिखा, "नरसिम्हा राव के बड़े बेटे पीवी रंगाराव अक्सर पिता के अफेयर की शिकायत लेकर दिल्ली पहुंचते थे. उन्होंने कई बार इंदिरा से मिलकर पिता की शिकायत की थी." उन दिनों राव आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री थे. एक ओर अगर बेटा उनकी शिकायत कर रहा था तो दूसरी ओर विरोधी भी उनके अफेयर को मिर्च मसाला लगाकर उछाल रहे थे. उन्हीं लोगों ने लक्ष्मी कांतम्मा नाम की महिला नेता से संबंधों की बात मसाला लगाकर पहुंचाई. इंदिराजी इतनी आजिज आ गईं कि राव की सीएम की कुर्सी तीन साल में ही चली गई.

राव के महिला नेता से रिश्ते 
विजय सीतापति की किताब "द हाफ लॉयन" में भी इसका उल्लेख है कि आखिर क्यों इंदिरा उनसे नाराज हो गईं. लेखक के अनुसार, "राव के रिश्ते और भी कई महिलाओं से थे लेकिन छोटे-छोटे टुकड़ों में. सबसे ज्यादा प्रगाढ़ता लक्ष्मी कांताम्मा नाम की एक महिला नेता से थी." कांताम्मा 1977 तक लगातार सांसद चुनी जाती रहीं.



राव ने उदारीकरण से देश को बदला
नरसिम्हा राव की आज पुण्यतिथि है. राव को 90 के दशक में उदारीकरण के जरिए देश की तस्वीर बदलने का भी श्रेय जाता है. उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के साथ मिलकर जिस तरह के कदम उठाए और नीतियां बनाईं, उससे देश में प्राइवेटीकरण का रास्ता मजबूत हुआ. देश और विकास की पूरी तस्वीर बदली. उन्हें "फादर ऑफ इंडियन इकोनॉमिक रिफॉर्म्स" भी कहा जाता है.

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लक्ष्मी और नरसिम्हा राव साथ बने थे विधायक
वर्ष 1957 में एक महिला खम्मम से जीतकर आंध्र प्रदेश के विधानसभा में पहुंची. राजनीति से उसका ज्यादा लेना-देना नहीं था लेकिन उसने कम्युनिस्टों के अजेय गढ़ में सेंध लगाकर चुनाव जीता था. नाम था लक्ष्मी कांताम्मा. लंबी, छरहरी, आकर्षक, वाकपटु, तेजतर्रार और पढ़ी लिखी. आंध्र प्रदेश के अनंतपुर के नामी रेड्डी जमींदार परिवार से ताल्लुक रखने वाली. बौद्धिक तौर पर प्रखर. लक्ष्मी जब विधानसभा में पहुंची तब उनकी उम्र थी 33 साल. उसी विधानसभा में 36 साल के पीवी नरसिम्हा राव भी पहली बार मंथनी से जीतकर पहुंचे थे.



होने लगी थीं नजदीकियां
राव और लक्ष्मी में विधानसभा सत्रों के दौरान मुलाकातें हुईं. दोनों की पृष्ठभूमि में जमीन-आसमान का अंतर था. एक खाते-पीते और बेहद समृद्ध परिवार की और राव बेहद साधारण और अभाव से गुजरकर आए हुए. विधानसभा में बहुत कम समय में नरसिम्हा राव की विद्वता और समझ-बूझ की धाक जम गई. लक्ष्मी उनकी ओर आकर्षित होने लगीं. 1962 में जब लक्ष्मी ने लोकसभा का चुनाव लड़ा तो राव ने उनकी भरपूर मदद की. वह उनके करीबी और राजनीतिक गुरु बन चुके थे. हालांकि राव विवाहित थे. दस साल की उम्र में उनका विवाह सत्यम्मा से हो चुका था. वो तीन बेटों और पांच बेटियों के पिता थे.

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इंदिरा ने ही बनाया था राव को सीएम
लक्ष्मी लोकसभा में पहुंचीं. नरसिम्हा राव आंध्र के तेज-तर्रार नेताओं में गिने जाने लगे. जल्द मंत्री बन गए. लक्ष्मी से नजदीकियां बढ़ती रहीं. राव की पहचान केंद्रीय नेतृत्व तक बन गई थी. नेहरू और इंदिरा उन्हें पसंद करते थे. इसी वजह से इंदिरा ने प्रधानमंत्री बनते ही 1970 में राव को मुख्यमंत्री बनने में मदद की.



प्राइवेट लाइफ
60 के दशक के आखिर तक नरसिम्हा राव और लक्ष्मी कांताम्मा का रिश्ता समय के साथ और मजबूती ले चुका था. हालांकि दोनों ने इसे गुप्त रखने की कोशिश की. लक्ष्मी संसद में प्रखर वक्ता के रूप में पहचान बना चुकी थीं. विजय सीतापति ने अपनी चर्चित किताब "द हाफ लॉयन" में यूं तो नरसिम्हा राव की तारीफ में काफी कसीदे पढ़े हैं, लेकिन उनकी प्राइवेट लाइफ पर निगाह डालने में भी कोताही नहीं बरती. उन्होंने किताब में लिखा, सत्यम्मा का जीवन पति की उपेक्षा और इसी वजह से मिले अकेलेपन से भरा था. उनका 1970 में निधन हो गया. इसके बाद लक्ष्मी से रोमांटिक रिलेशनशिप में ज्यादा स्वेच्छाचारिता आ गई.

फिर सचेत हुए
नरसिम्हा राव को जब आंध्र प्रदेश में झटका लगा तो वह कुछ सचेत तो हुए लेकिन लक्ष्मी से उनके संबंध कभी खत्म नहीं हुए. हालांकि तब जरूर पसोपेश की स्थिति बन गई जब आपातकाल के दौरान लक्ष्मी कांतम्मा इंदिरा के विरोध पर उतर आईं. जनता पार्टी में चली गईं. 1977 में चुनाव भी जनता पार्टी के टिकट पर लड़ा. "हाफ लॉयन" में लेखक विजय सीतापति ने लिखा है कि नरसिम्हा राव से लक्ष्मी के रिश्ते 1962 से लेकर 1975 तक चले. लेकिन वह राव के साथ जब तक रहीं, तब तक पूरी तरह समर्पित और प्रतिबद्ध.

लक्ष्मी साध्वी बन गईं
बाद में लक्ष्मी ने राजनीति से अपने सारे संपर्क काटकर आध्यात्म की ओर कूच किया. साध्वी बन गईं. वह गुरु श्रीशिवा बालयोगी महाराज के शरण में चली गईं. उन्होंने अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा धर्मार्थ कामों में दे दिया. कहा जाता है कि उन्होंने नरसिम्हा राव को भी राजनीति छोड़ साथ आने को प्रेरित किया. 1991 में राव बोरिया बिस्तर और किताबें बांधकर संन्यास की ओर ही जाने वाले थे लेकिन राजीव गांधी की हत्या ने उनके भाग्य को पूरी तरह बदल दिया.



"इनसाइडर" में संबंधों की ओर इशारा
राव ने प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद एक आत्मकथात्मक उपन्यास लिखा-"इनसाइडर", जिसे पेंग्विन ने प्रकाशित किया. इस किताब को लिखने के लिए राव को उस जमाने में बतौर एडवांस एक लाख रुपए मिले थे. इस किताब में उन्होंने संकेतों, इशारों और परोक्ष तौर पर अपने कुछ संबंधों पर इशारा किया है. हालांकि उनके सहयोगी कहते हैं कि जब वह प्रधानमंत्री थे, तब अपनी कैबिनेट की एक जूनियर महिला मंत्री पर मेहरबान थे. इसका लोगों ने अलग-अलग तरीके से अर्थ लगाया.

तब अपना सामान बांध चुके थे राव 
नरसिम्हा राव 17 भाषाओं के जानकार थे. उन्होंने तेलुगू, मराठी और हिन्दी में किताबें भी लिखीं. 90 के दशक में जब वो प्रधानमंत्री बने. उससे पहले ही उन्होंने राजनीति से संन्यास लेकर वापस अपने गांव जाने का मन बना लिया था. उनका सामान करीब करीब पैक हो चुका था. अपना बहुत सा सामान उन्होंने बांधकर भेज भी दिया था. इसी बीच 21 मई 1991 को राजीव गांधी की हत्या हो गई. उससे उपजी संवेदना का कांग्रेस को चुनावों में फायदा मिला. उसने सरकार बनाई और नए हालात में नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बनाए गए. हालांकि उसके कुछ ही समय बाद राजीव गांधी की विधवा सोनिया गांधी से उनके विवाद भी उभरने लगे.

83 साल की उम्र में निधन 
बाद में वो कांग्रेस में उपेक्षित हो गए. उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा. वर्ष 2004 में हार्ट अटैक के बाद उन्हें दिल्ली के एम्स में भर्ती कराया गया. जहां उनका स्वास्थ्य बिगड़ता चला गया. 83 साल की उम्र में 23 दिसंबर 2004 को उनका निधन हो गया. लेकिन ये कहना सही होगा कि अगर आज भारत को दुनिया में एक बड़ी आर्थिक ताकत माना जाने लगा है तो उसके पीछे उनके प्रधानमंत्री रहते शुरू की गईं नीतियों का बहुत बड़ा हाथ है.

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