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बंटवारे में पाकिस्तान के इन मुसलमानों ने हिंदुस्तान को चुना और हुए मशहूर

1947 में बंटवारे के वक्त पाकिस्तान को छोड़कर मुसलमान भारत भी आए थे

1947 में बंटवारे के वक्त पाकिस्तान को छोड़कर मुसलमान भारत भी आए थे

बंटवारे के वक्त मुसलमान (Muslim) हिंदुस्तान (India) से पाकिस्तान (Pakistan) ही नहीं गए थे, पाकिस्तान के मुसलमान भारत भी आए थे. इनमें से कुछ ऐसे मुसलमान थे, जो बाद में यहां काफी मशहूर हुए.

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    अपने बयानों को लेकर चर्चा में रहने वाले केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह (Giriraj Singh) ने एक बार फिर सनसनीखेज बयान दिया है. अपने ताजा बयान में गिरिराज सिंह ने कहा है कि 1947 में बंटवारे (India Pakistan Partition) के वक्त यहां के सारे मुसलमानों (Muslims) को पाकिस्तान भेज दिया जाना चाहिए था.

    बुधवार को बिहार के पूर्णिया में एक जनसभा को संबोधित करते हुए गिरिराज सिंह ने कहा कि देश के सामने ये स्वीकार करने का वक्त है कि जब 1947 से पहले जिन्ना ने इस्लामिक देश की मांग की. यह हमारे पूर्वजों की बड़ी चूक थी, जिसकी कीमत हम चुका रहे हैं. यदि सभी मुस्लिम भाइयों को उसी वक्त वहां भेज दिया जाता और हिंदुओं को यहां लाया जाता तो हम उस स्थिति में नहीं होते, जहां आज हैं.

    भारत से गए ही नहीं थे, पाकिस्तान से आए भी थे मुसलमान
    आमतौर पर माना जाता है कि बंटवारे के वक्त बड़ी संख्या में हिंदुस्तान के मुसलमान पाकिस्तान चले गए, वहीं पाकिस्तान से बड़ी संख्या में हिंदुओं और सिखों का पलायन हिंदुस्तान हुआ. ये सदी का सबसे बड़ा विस्थापन था, जिसने भयावह दंगों का दर्द झेला.

    मोटे तौर पर आंकड़े के मुताबिक करीब डेढ़ करोड़ लोगों का विस्थापन हुआ था. ये एक बड़ी त्रासदी थी. लेकिन इस बीच इस बात को लेकर कोई चर्चा नहीं होती कि बंटवारे के वक्त मुसलमान हिंदुस्तान से पाकिस्तान ही नहीं गए थे, पाकिस्तान के मुसलमान भारत भी आए थे. इनमें से कुछ ऐसे मुसलमान थे, जो बंटवारे के वक्त पाकिस्तान में अपना घरबार छोड़कर हिंदुस्तान चले आए और बाद में यहां काफी मशहूर हुए.

    फिल्म अभिनेता दिलीप कुमार के पिता ने हिंदुस्तान को चुना था
    फिल्म अभिनेता दिलीप कुमार के पिता का नाम गुलाम सरवर था. उनका परिवार पाकिस्तान के पेशावर से ताल्लुक रखता था. हालांकि बंटवारे के वक्त गुलाम सरवर बॉम्बे (मुंबई) में थे. जब बंटवारे का ऐलान हुआ तो पेशावर से उनके परिवार का फोन आया. परिवारवालों ने गुलाम सरवर को तुरंत हिंदुस्तान छोड़कर पेशावर आने की सलाह दी. लेकिन गुलाम सरवर ने बिना ज्यादा सोचे अपने परिवारवालों को पाकिस्तान आने से मना कर दिया. दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा The Substance and the Shadow में इस वाकये का जिक्र किया है.

    दिलीप कुमार ने अपनी किताब में लिखा है कि जब उनके पिता को वापस लौटने को कहा गया तो उन्होंने कहा- कभी नहीं. हम बॉम्बे कभी नहीं छोड़ेंगे. अब हिंदुस्तान ही हमारा देश है. 1947 तक दिलीप कुमार हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बड़े सितारे बन चुके थे. 1947 में उनकी फिल्म ज्वार भाटा रिलीज हुई थी. दिलीप कुमार देविका रानी के बॉम्बे टॉकीज के साथ जुड़कर फिल्में कर रहे थे.

    शाहरुख के पिता ने भी पाकिस्तान की बजाए हिंदुस्तान को चुना
    फिल्म स्टार शाहरुख खान के पिता ने भी बंटवारे के वक्त पाकिस्तान की बजाए हिंदुस्तान को चुना था. शाहरुख खान के पिता का नाम ताज मोहम्मद खान था. वो पेशावर के पठान थे और कांग्रेस पार्टी से जुड़े हुए थे. जब बंटवारे का ऐलान हुआ तो उन्होंने जिन्ना के पाकिस्तान के बजाए गांधी और नेहरू के हिंदुस्तान को चुना.

    अगस्त 1947 के दूसरे हफ्ते में ताज मोहम्मद अपने परिवार और दोस्तों के साथ पेशावर छोड़कर भारत आ गए. वो गांधीजी और फ्रंटियर गांधी के नाम से मशहूर खान अब्दुल गफ्फार खान से काफी प्रभावित थे. नेहरू को अपना नेता मानते थे. शाहरुख खान कई बार कह चुके हैं कि उनके पिता ताज खान कांग्रेस के कार्यकर्ता थे. उन्होंने धर्म के आधार पर देश के विभाजन का विरोध किया था. वो अपने परिवार और दोस्तों के साथ दिल्ली आ गए थे. ताज खान एक वकील थे. 1981 में कैंसर से उनका निधन हो गया.

    पाकिस्तान से बड़ी संख्या में हिंदुस्तान आए थे मुसलमान
    बंटवारे के वक्त पाकिस्तान से बड़ी संख्या में मुसलमान भारत भी आए थे. लेकिन इसके आंकड़ों के बारे में नहीं पता चलता. कई लोग ऐसे थे, जो बंटवारे के वक्त अपने परिवार से मिलने पाकिस्तान गए और फिर वापस लौट आए. दिल्ली में बड़ी संख्या में ऐसे पंजाबी मुस्लिम रहते हैं.

    मोटे तौर पर एक आंकड़े के मुताबिक बंटवारे के वक्त करीब डेढ़ करोड़ आबादी का विस्थापन हुआ. 1951 की जनगणना के मुताबिक भारत से करीब 72 लाख 62 हजार मुसलमान पाकिस्तान चले गए. उसी तरह पाकिस्तान से करीब 72 लाख 49 हजार हिंदू और सिख हिंदुस्तान आ गए. लेकिन पाकिस्तान से कितने मुसलमान भारत आए, इसका आधिकारिक आंकड़ा नहीं मिलता.

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