2020 में छाए रहेंगे CAA, NPR समेत ये 5 सियासी मुद्दे

2020 में छाए रहेंगे CAA, NPR समेत ये 5 सियासी मुद्दे
CAA और NRC का मुद्दा साल 2020 में भी बना रहेगा

नागरिकता कानून (Citizenship Amendment Act) का विरोध कम नहीं पड़ा है. ऐसे में CAA और NPR समेत ऐसे पांच बड़े मुद्दे हैं, जिसकी चर्चा साल 2020 में बनी रहेगी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 1, 2020, 1:01 PM IST
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नया साल (New Year) आ चुका है. पूरा देश नए साल का स्वागत कर रहा है. लोग एकदूसरे को नए साल की शुभकामनाएं (best wishes) दे रहे हैं. नया साल नई चुनौतियां भी लेकर आता है. ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि नए साल में वो कौन से राजनीतिक मुद्दे होंग, जो पूरे वर्ष छाए रह सकते हैं.

बना रहेगा नागरिकता संशोधन कानून का मुद्दा
नए साल में नागरिकता संशोधन कानून का मुद्दा बना रहेगा. मोदी सरकार के बनाए नए नागरिकता कानून का विरोध अब तक शांत नहीं पड़ा है. कई राज्यों में इसको लेकर विरोध प्रदर्शन जारी है. खासकर पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी इसका जोरदार विरोध कर रही हैं. उनकी कोशिश है कि CAA के विरोध के बहाने वो समूचे विपक्ष को एकजुट करें और पूरे विपक्ष की आवाज बनकर उभरे. पिछले 2 हफ्तों में वो पश्चिम बंगाल में आधा दर्जन से ज्यादा रैलियां कर चुकी हैं और वो इसे आगे भी जारी रखेंगी.

मोदी सरकार भी इस बात की कोशिश में लगी है कि नए नागरिकता संशोधन कानून से जुड़ी गलतफहमियों को दूर किया जाए. इसके लिए हर स्तर पर कोशिश की जा रही है. बीजेपी के नेता और कार्यकर्ता इसको लेकर सभाएं कर रहे हैं. नागरिकता कानून के पक्ष में रैलियां भी हुई हैं. नए साल में भी ये मुद्दा बना रहेगा. क्योंकि न मोदी सरकार इस कानून पर कोई समझौता करने को तैयार दिख रही है, न विपक्ष अपने विरोध के तेवर को कम कर रहा है.
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NRC और CAA के खिलाफ ममता की रैली




'कागज नहीं दिखाएंगे' नारे का क्या होगा?
इसी तरह से एनपीआर यानी नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर का मुद्दा भी बना रहेगा. मोदी सरकार देश की जनता की जानकारियों को इकट्ठा करने के लिए एनपीआर लेकर आई है. लेकिन इसका भी लगातार विरोध हो रहा है. मोदी सरकार नागरिकता अधिनियम 1955 के अंतर्गत एनपीआर को लेकर आई है. लेकिन इसको फॉर्म को लेकर विवाद बना हुआ है.

बताया जा रहा है कि सरकार नया फॉर्म लेकर आई है. इसमें आधार कार्ड, पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस से लेकर पासपोर्ट तक की जानकारी मांग रही है. सीएए का विरोध करने वाले लोग एनपीआर का भी विरोध कर रहे हैं. 'कागज नहीं दिखाएंगे' नारे के साथ सिविल सोसायटी के लोग कैंपेन चला रहे हैं. नए साल में भी एनपीआर को लेकर विरोध प्रदर्शन देखने को मिल सकता है.

विपक्षी पार्टियों का ये भी कहना है कि एनपीआर दरअसल एनआरसी यानी नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स को पूरे देश में लागू करवाने के लिए किया जा रहा है. हालांकि एनपीआर का एनआरसी से किसी भी तरह के संबंध होने से गृहमंत्री अमित शाह ने जहां इनकार किया है. वहीं कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि एनपीआर के आंकड़ों का इस्तेमाल एनआरसी में किया भी जा सकता है और नहीं भी. 2019 के आखिरी हफ्तों में ये मसला छाया रहा. सीएए के बाद एनपीआर का विरोध भी तेज हुआ है. ऐसे में 2020 में एनपीआर का मुद्दा भी बना रहेगा.

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NPR को लेकर भी विपक्ष ने विरोध किया है


पूरे देश में NRC लागू करने का जोखिम लेगी मोदी सरकार?
इसी के साथ एक मसला एनआरसी का भी है. मोदी सरकार पहले कह चुकी है कि एनआरसी को पूरे देश में लागू करवाया जाएगा. असम में एनआरसी के लागू होने के बाद उसके फाइनल लिस्ट से 19 लाख लोग बाहर हो गए हैं. अभी उनका मसला अटका पड़ा है. वहीं बीजेपी के घोषणापत्र में शामिल पूरे देश में एनआरसी लागू करने का मसला 2020 में भी बना रहेगा.

हालांकि नागरिकता कानून पर देशभर में हो रहे विरोध के बाद सरकार ने एनआरसी पर अपना रवैया नरम किया है. एनआरसी को पूरे देश में लागू करने को लेकर कोई स्पष्ट बात नहीं कही जा रही है. सरकार की तरफ से अब कहा जा रहा है कि एनआरसी को पूरे देश में लागू करने की प्रक्रिया बहुत बड़ी और लंबी चलने वाली है. अभी इस बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी है.

कानूनमंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि अभी इसके नोटिफिकेशन जारी होगी, राज्यों से बात की जाएगी, इस पर सलाह मांगी जाएगी, इसके बाद ही कोई फैसला लिया जाएगा. हालांकि पूरे देश में एनआरसी लागू करने के मुद्दे पर विपक्ष आक्रमक रवैया अपनाए हुए है. एनआरसी का मुद्दा भी साल 2020 में छाया रहेगा. ये देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस बारे में लोगों के परसेप्शन में क्या तब्दिली ला पाती है और क्या इसे लागू कर पाना संभव हो पाता है?

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चेन्नई में CAA-NRC के खिलाफ रंगोली बनाने के लिए 8 लोगों को हिरासत में लिया गया (फोटो- ट्विटर)


इस बार दिलचस्प रहेगा दिल्ली का चुनाव?
इन राजनीतिक मुद्दों के साथ ही दो राज्यों के चुनाव भी नए साल में सियासी गहमागहमी बनाए रखेंगी. जनवरी-फरवरी महीने में दिल्ली में चुनाव होने हैं. नए साल के पहले ही हफ्ते में चुनाव आयोग इसकी तारीखों का ऐलान कर सकती है. इसके बाद दिल्ली का दिलचस्प चुनाव सामने होगा.

आम आदमी पार्टी से दिल्ली की सत्ता छीनने की बीजेपी पूरी कोशिश करेगी. हालांकि ये आसान नहीं है. दिल्ली में आम आदमी पार्टी पिछले एक साल से चुनावों की तैयारी में लगी है. आम आदमी पार्टी अपने काम के आधार पर वोट मांगेंगी. वहीं बीजेपी की पुरजोर कोशिश होगी कि वो कुछ नए मुद्दे लाकर बाजी पलट दे.

हालांकि दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून को लेकर जिस तरह के विरोध हुए हैं, उसके बाद अनिश्चितता बढ़ी है. बीजेपी केंद्र और राज्य में एक पार्टी की सरकार ही विकास दे सकती है, का अपना पुराना नारा उछाल सकती है. कुल मिलाकर इस बार का दिल्ली का चुनाव दिलचस्प रहने वाला है.

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इस बार दिल्ली का चुनाव दिलचस्प रहने वाला है


शुरू हो चुकी है बिहार चुनाव की चर्चा
दिल्ली चुनाव के बाद अक्टूबर-नवंबर में बिहार में चुनाव होने हैं. इसकी तैयारियां भी अभी से शुरू हो चुकी हैं. बिहार में बीजेपी-जेडीयू की गठबंधन की सरकार है. हालांकि इसके पहले 2015 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी और जेडीयू अलग होकर लड़े थे. जेडीयू ने आरजेडी, कांग्रेस और कुछ दूसरे छोटे दलों के साथ मिलकर महागठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा था. महागठबंधन को बहुमत हासिल हुआ और नीतीश कुमार सीएम बने थे.

लेकिन महागठबंधन की सरकार 2 साल ही चली और 2017 में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर नीतीश कुमार ने आरजेडी से रिश्ता तोड़ लिया और बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई. जेडीयू और बीजेपी एकसाथ तो आ गई है लेकिन सबसे बड़ा मसला सीट बंटवारे का है. बीजेपी जहां बिहार में अपना विस्तार करना चाहती है, वहीं जेडीयू भी अपनी भूमिका राज्य में कहीं ज्यादा बड़ा देखती है. दोनों पार्टियों के बीच सीट का पेंच फंस सकता है. इस बीच नीतीश कुमार के फिर से महागठबंधन की ओर लौटने की चर्चाएं चलती रहती है. बिहार में चुनावों के दौरान काफी कुछ उलटफेर हो सकता है. बिहार की चुनावी सरगर्मी 2020 में पूरे साल छाई रहेगी.

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बढ़ने लगी है बिहार चुनाव की सरगर्मी


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