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भारतीय राजनीति की ये दो दमदार पार्टियां, जो हो चुकी हैं गायब

जनसंघ और स्वतंत्र पार्टियों के प्रतीक

जनसंघ और स्वतंत्र पार्टियों के प्रतीक

जनसंघ का चुनाव निशान था जलता हुआ दीपक और स्वतंत्र पार्टी का चुनाव निशान था सितारा.

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    आम चुनाव 2019 की शुरुआत में बस दो दिन का वक्त बचा है. 23 मई को चुनाव परिणामों की घोषणा होगी. इसके बाद नई सरकार का गठन होगा. लेकिन भारतीय लोकतंत्र अब अपनी प्लेटिनम जुबली भी मना चुका है और इसने यहां तक की यात्रा में कई पड़ाव देखे हैं. इन पड़ावों में कई राजनीतिक पार्टियों का इतिहास छिपा हुआ है. हम बात कर रहे हैं ऐसे दो पार्टियों की जो भारतीय राजनीति में लंबे वक्त तक अपना करिश्मा दिखाती रहीं लेकिन अब पूरी तरह से खत्म हो चुकी हैं. ये दो पार्टियां हैं, जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी. पढ़ें कैसी रही है दोनों की यात्रा?

    जनसंघ बंटा और बनी बीजेपी
    भारतीय जनसंघ की स्थापना अक्टूबर, 1951 में डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की थी. भारतीय जनसंघ का शॉर्ट फॉर्म BJS था. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारत की पहली सरकार में कैबिनेट का हिस्सा भी थे. 1952 में भारत में पहले आम चुनाव हुए. जिनमें इस चुनाव में भारतीय जनसंघ भी मैदान में उतरा और तीन सीटें जीतीं. जनसंघ का मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दल के तौर पर उदय हुआ. 1957 के आम चुनावों में जनसंघ को 5 सीटें मिलीं और एक भविष्य का नेता, अटल बिहारी वाजपेयी. जो पहली बार 1957 में ही सांसद बने.

    1962 के आम चुनावों में जनसंघ की स्थिति और अच्छी हुई और 14 सीटों पर जीत दर्ज की. 1967 के आम चुनावों में पार्टी के 32 सांसद जीते. हालांकि एक साल के अंदर ही पार्टी को बड़ा झटका तब लगा, जब 1968 में जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी का निधन हो गया. इसके बाद 1969 में अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष चुने गए.

    1971 में पांचवीं लोकसभा के चुनाव हुए और भारतीय जनसंघ के 23 सांसद जीते. 1973 में पार्टी की कमान लालकृष्ण आडवाणी को मिली. लेकिन अगले आम चुनाव वक्त से नहीं हो सके क्योंकि इंदिरा गांधी ने इसी दौर में इमरजेंसी लगा दी. देश के ज्यादातर नेता और राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया.

    इंदिरा गांधी के इमरजेंसी लगाने के विरोध में कई राजनीतिक दल एक साथ आ गए, इसमें जनसंघ भी शामिल था. इन दलों ने साथ मिलकर 'जनता पार्टी' बनाई. जिसने इंदिरा गांधी को 1977 के आम चुनावों में बुरी तरह से हराया. जनता पार्टी को इन चुनावों में 302 सीटें मिलीं. मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने. इस सरकार में जनसंघ की ओर से अटल बिहारी वाजपेयी को विदेश मंत्री और लालकृष्ण आडवाणी को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली.

    बहुत से दलों के अपने हितों को साधने के लिए बने इस महागठबंधन का हश्र बहुत खराब रहा. इसकी सरकार एक कार्यकाल भी पूरा नहीं कर सकी और मात्र 30 महीनों में जनता पार्टी का विघटन हो गया. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इसके कई घटक दलों ने इससे समर्थन वापस ले लिया था. मोरारजी देसाई को इस्तीफा देना पड़ा. जून, 1979 में चौधरी चरण सिंह ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. कांग्रेस ने इसके बाद चरण सिंह को समर्थन करने का वादा किया लेकिन सदन में बहुमत न साबित करने से पहले ही कांग्रेस मुकर गई. इसके बाद 1980 में फिर से चुनाव कराने पड़े.

    1980 में भारतीय जनसंघ ने लोकसभा चुनाव, भारतीय जनसंघ के नाम पर ही लड़ा. वहीं चौधरी चरण सिंह के धड़े ने जनता पार्टी (एस) के नाम से चुनाव लड़ा. इस बार जनसंघ को मात्र 2 सीटें मिलीं. और जनता पार्टी (एस) को 31. कांग्रेस ने 1980 में 353 सीटों के साथ सरकार बनाई और इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं. लेकिन सातवीं लोकसभा की करारी हार ने जनसंघ में फूट डाल दी और इसके बाद 6 अप्रैल 1980 को अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ. 1984 के अपने पहले लोकसभा चुनाव में बीजेपी को महज 2 सीटें मिलीं.

    1986 में लालकृष्ण आडवाणी ने पार्टी के अध्यक्ष के रूप में कमान संभाली. इसके बाद 1989 में नवीं लोकसभा के चुनाव में बीजेपी ने अप्रत्याशित बढ़त दर्ज की और 89 सीटें जीतीं. बीजेपी ने जनता दल को समर्थन देकर वीपी सिंह की सरकार बनवाई.

    स्वतंत्र पार्टी जो आज से 6 दशक पहले ही कर रही थी फ्री मार्केट का सपोर्ट
    स्वतंत्र पार्टी भारत का एक राजनैतिक दल था जिसकी स्थापना चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने अगस्त 1959 में की थी. इस दल ने जवाहरलाल नेहरू की समाजवादी नीति का विरोध किया और तथाकथित लाइसेंस-परमिट राज को खत्म कर मुक्त अर्थव्यवस्था का समर्थन किया. हालांकि भारत में तब चारों ओर गरीबी और भुखमरी का बोलबाला था, इसलिए यह पार्टी उस दौर में जमींदारों और उद्योगपतियों की पार्टी मान ली गई.

    इसके बावजूद स्वतंत्र पार्टी ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में अच्छी सफलता पाई. बनने के बाद से ही स्वतंत्र पार्टी का प्रदर्शन बढ़िया रहा. 1967 के आम चुनावों में स्वतंत्र पार्टी कांग्रेस के बाद सबसे बड़ा दल बनकर उभरी. सी राजगोपालाचारी के अलावा मीनू मसानी, केएम मुंशी, एनजी रंगा और पीलू मोदी इस पार्टी के प्रमुख नेता थे. 1974 में इस पार्टी का भारतीय लोकदल में विलय हो गया.

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