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इन 10 बातों के लिए सुषमा स्वराज हमेशा याद की जाएंगी

सुषमा स्वराज

सुषमा स्वराज

सुषमा स्‍वराज (Sushma Swaraj) की कुछ ऐसी खासियतें थीं, जिसकी वजह से उन्हें हमेशा याद रखा जाएगा, चाहे उनका विनम्र व्यक्तित्व हो या फिर प्रशासनिक क्षमता

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    पूर्व विदेश मंत्री और भारतीय जनता पार्टी की नेता सुषमा स्वराज (Sushma Swaraj) को उनकी सादगी, स्नेहपूर्ण व्यवहार और विदेशमंत्री के तौर पर हर छोटी से छोटी बात पर ध्यान देने के लिए अगर याद किया जाएगा. तो उनके ओजस्वी भाषणों के लिए भी. हम यहां बताते हैं उन दस बातों को जिनके लिए सुषमा स्वराज को हमेशा याद किया जाएगा.

    1. सादगी - सुषमा स्वराज का सियासी करियर करीब 42 साल का था. उन्होंने 1977 में हरियाणा में विधानसभा का पहला चुनाव लड़ा और जीतीं. तब से लेकर वो कई पदों पर रहीं. लेकिन इतने लंबे समय में उनकी सादगी हमेशा कायल करने वाली रही. वो हर किसी से अपनत्व से मिलती थीं. उनकी बातें सुनती थीं. उनका जीवन हमेशा सादगी वाला रहा. कहीं कोई आडंबर नहीं और ना ही किसी तरह का कोई घमंड. उनकी वेशभूषा और जीवन हमेशा ऐसा रहा, जिससे कोई भी प्रेरणा ले सकता है.


    2. ओजस्वी वक्ता- जब वो अम्बाला में कॉलेज में पढ रही थीं, तभी कॉलेज की भाषण प्रतियोगिताओं में उनकी खास बोलने की शैली लोगों को प्रभावित करती थीं. इसके बाद जब वो चंडीगढ़ में कानून की पढाई करने पहुंचीं तो उनकी भाषण कला में और निखार आया. यहीं वो स्टूडेंट पॉलिटिक्स में कूदीं. उनके ओजस्वी भाषण लोगों को प्रभावित करते थे. इसके बाद लगातार सियासत में जब वो आगे बढ़ती गईं तो उनके भाषणों की भी धाक जमती गई. चाहे संयुक्त राष्ट्र में भाषण देना हो या फिर चुनावी सभा में बोलना हो या संसद में अपनी बात कहनी हो, वो हर जगह अपनी खास शैली और विषय पर पकड़ से पक्ष या हो विपक्ष सभी को प्रभावित कर लेती थीं. हर पार्टी के लोग ये कहते थे कि सुषमा जब बोल रही हों तो उन्हें सुनना अच्छा लगता है.

    सुषमा को उनके सहयोगी हमेशा कड़ी मेहनत करने वाली नेता के रूप में मानते थे


    3. हमेशा मेहनती- सुषमा स्वराज ने हमेशा अपने लंबे राजनीतिक करियर में यही सिखाया कि कहीं कोई शार्टकट नहीं होता. जिस भी मुकाम पर पहुंचना हो उसके लिए पर्याप्त मेहनत करनी होती, ये उन्हें पग-पग पर सिखाया भी. चाहे वो दिल्ली में मुख्यमंत्री रही हों या फिर अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री या यूपीए-एक में विदेश मंत्री, उनके बारे में हमेशा कहा जाता था कि वो लंबे समय तक आफिस में रहती थीं. अपना होमवर्क बहुत बारीकी से करती थीं. यहां तक के उनके विभाग के जूनियर मंत्री भी ये कहते थे कि सुषमा जिस तरह काम में जुटी रहती हैं. मीटिंग्स करती हैं. उसमें बारीक बातों पर भी गौर करती थीं, वो उनकी समझ-बूझ और मेहनत को दिखाता था.

    4. गजब का आत्मविश्वास- सुषमा स्वराज ने जब हरियाणा विधानसभा के लिए अपना पहला चुनाव लड़ा, तो मतदाताओं को उन्होंने अपनी कम उम्र के बाद भी आत्मविश्वास से प्रभावित किया. वो जनता पार्टी के टिकट पर चुनी गईं. उस समय उनकी उम्र केवल 25 साल की थी. कई चुनावी सभाओं में जनता पार्टी के सीनियर नेता देवीलाल भी उनके साथ होते थे.

    उनके आत्मविश्वास को देखकर ही उन्होंने सुषमा स्वराज को अपने मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री बनाया. इससे लोगों को हैरानी भी हुई कि केवल पहला चुनाव जीतकर आई सुषमा को क्यों मंत्री बना दिया गया, जबकि उनकी उम्र भी कमोवेश बहुत कम थी. लेकिन देवीलाल यही कहते थे कि इस लड़की में गजब का आत्मविश्वास है, देख लेना ये खुद को बहुत जल्दी साबित भी कर देगी. ऐसा हुआ भी. देवीलाल ने उन्हें श्रम और रोजगार मंत्री बनाया.

    इस मंत्रालय में अपने काम और आत्मविश्वास से उन्होंने कुछ ही महीनों में धाक जमा ली. आत्मविश्वास उनकी ऐसी पूंजी थी, जो हमेशा याद की जाएगी. उनकी सफलता की सबसे बड़ी कुंजियों में आत्मविश्वास सबसे अहम था. जिसने उन्हें हमेशा अलग खड़ा किया.

    भाजपा की मीडिया प्रवक्ता के रूप में भी उनका अंदाज अलग और काफी अनौपचारिक था, जो बहुत पसंद किया गया


    5- मीडिया को डील करना- जब 1992 में बाबरी मस्जिद ध्वंस हुआ  तो उस समय वो भारतीय जनता पार्टी की प्रवक्ता थीं. उस समय मीडिया को डील करना आसान नहीं था, लेकिन जिस तरह सुषमा मीडिया से मुखातिब होती थीं, उससे उनकी अपनी पार्टी के सीनियर लीडर भी उनके कायल हो गए.

    6. तुरंत कार्रवाई- जिसने विदेश मंत्री के रूप में उन्हें देखा है और उनके काम को देखा है, वो हर शख्स कहता है कि अगर वो कभी उनके पास किसी काम के लिए गया है तो वो उस पर तुरंत कार्रवाई करती थीं. ट्विटर पर जो भी शख्स मैसेज भेजता था, वो चाहे देश का नागरिक हो या फिर विदेश का-उस पर वो तुरंत हरकत में आती थीं. जवाब भी देती थीं और आवश्यक कार्रवाई भी करती थीं. ऐसे एक नहीं कई मामले हुए हैं जब सुषमा ने ट्विटर पर आए संदेश के बाद मुसीबत में फंसे लोगों की मदद की.

    7. व्यक्तित्व - सुषमा का व्यक्तित्व ऐसा था कि कोई भी उनके संपर्क में आकर उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता था. इसलिए हर पार्टी का नेता या आमजन भी जो उनसे एक बार मिल लेते थे, उनसे प्रभावित हो जाते थे. वो हर किसी की समस्या को ध्यान से सुनती थीं. उसका हल निकालने की कोशिश करती थीं. जब कोई उन्हें धन्यवाद करता तो उनका हमेशा यही जवाब होता था कि इसकी जरूरत नहीं, ये तो उनका काम है.

    8. अच्छी कम्युनिकेटर - सुषमा ऐसी राजनीतिज्ञ थीं, जो हमेशा शानदार कम्युनिकेटर थी. वो धाराप्रवाह अंग्रेजी और हिंदी में बोल सकती थीं. इंटरनेशनल मीटिंग्स में भी वो जिस तरह लोगों से मुखातिब होती थीं, और अपनी टीम से भी संवाद करती थीं, उससे हर बात बहुत स्पष्ट हो जाती थी. जब वो एक बार बेल्लारी से सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा तो उन्होंने कन्नड़ भी सीख ली.

    9. सेंस ऑफ ह्यूमर - उनका सेंस ऑफ ह्यूमर गजब का था . अक्सर गंभीर माहौल में वो चुटकी लेकर उसे हल्का कर देती थीं. उनके पास शेरो-शायरी का भी खजाना था, जो अक्सर माहौल को बदलने में बड़ा काम आता था.

    10 विषय पर पकड़- सुषमा ने अपने लंबे सियासी करियर में कई मंत्रालयों में काम किया और उन सभी की बारीक बातों को भी उन्होंने बखूबी समझा. जिसका असर ये हुआ कि वो जहां कहीं रहीं और जिस भी भूमिका में रहीं, उसमें उन्होंने बखूबी काम को अंजाम भी दिया.

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