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सिर्फ चार दिनों में 8000 लोगों की जिंदगियां निगल ली थीं खतरनाक स्मॉग ने

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: November 4, 2019, 9:26 PM IST
सिर्फ चार दिनों में 8000 लोगों की जिंदगियां निगल ली थीं खतरनाक स्मॉग ने
लंदन की सड़कों पर दिन में भयंकर स्मॉग के दिनों में ये हाल हो गया था

05 दिसंबर 1952 की सुबह लंदन में हल्की काली धुंध छाई हुई थी जो कुछ घंटों में और मोटी होती चली गई. पूरा शहर अंधेरे में डूब गया. पांच दिनों तक शहर में उजाला ही नहीं हुआ. स्मॉग मौत का सौदागर बन गया. असर बाद में भी कई महीनों तक रहा.

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  • Last Updated: November 4, 2019, 9:26 PM IST
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उस स्मॉग (Smog) को लोग आज भी मौत का तांडव करने वाला स्मॉग कहते हैं. उसने देखते ही देखते चार दिनों में 8000 या इससे ज्यादा लोगों को मौत की नींद सुला दिया था. अस्पताल लोगों से पटे पड़े थे. हजारों लोग बीमार होकर अस्पतालों में चले आ रहे थे. दिन में भी हर ओर अंधेरा नजर आता था. वाहन हेडलाइट्स ऑन करके सड़कों पर चीटियों सरीखी चाल चलते थे. घर का दरवाजा खोलते ही काली धुंध सीधे अंदर घुस आती थी. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि ये क्या हो गया है और कब तक ये हालत रहने वाले हैं.

इससे ज्यादा भयावह स्मॉग दुनिया में कभी नहीं देखा गया. इसे याद कर उस दौर के लोग आज भी सिहर उठते हैं. इसे ग्रेट स्मॉग ऑफ लंदन के रूप में याद किया जाता है. दिसंबर की उस ठंडी सुबह जब लंदन के लोगों ने खिड़कियों से बाहर का नजारा देखा तो बाहर हल्की काली धुंध छितराई हुई थी. कुछ ही घंटों में इसकी परत कम होने की बजाए मोटी होती गई. जमीन से लेकर आसमान तक ऐसी कालिमा की दो मीटर दूर की चीजें नजर आना बंद हो चुकी थीं. आसमान तो दिख ही नहीं रहा था. किसी की समझ में ही नहीं आया कि ये क्या हो गया है.



हालांकि लंदन में स्मॉग कोई नई बात नहीं थी. 13वीं सदी से ही यहां स्मॉग एक बड़ी समस्या थी. इसकी मुख्य जड़ थी बेशुमार कोयले की अंगीठियों का इस्तेमाल. 13वीं सदी में किंग एडवर्ड ने एकबारगी इस पर रोक भी लगा दी थी. ये घटना 1952 में घटी थी. पांच दिसंबर 1952 को इसकी शुरुआत हुई थी.

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हजारों चिमनियां लगातार काला धुआं फेंकती थीं
उन दिनों लंदन में ठंड में घर से ऑफिस तक कोयले की अंगीठियां और अलाव कुछ ज्यादा ही बढ़ जाते थे. घर-घर में लगी चिमनियां कुछ ज्यादा काला धुआं फेंकने लगती थीं. फिर शहर में तमाम फैक्ट्रियां थीं, जो केवल कोयले से चलती थीं.
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कुछ ही दिनों पहले डीजल आधारित बसें शुरू की गईं थीं. बिजली का उत्पादन करने वाले बड़े बिजली उत्पादन गृहों में टनों कोयला लगातार झोंका जाता था. स्टीम इंजन तो थे ही. फिर सड़कों पर चलने वाले वाहनों का प्रदूषण भी. यानी हजारों टन जहर हवा में घुलता रहता था.

फिर हर ओर से आने लगीं बीमार होने की खबरें
लंदन में हर साल जाड़ा शुरू होने के साथ ही स्मॉग की परतें बिछने लगती थीं लेकिन उस दिन तो वाकई गजब हो गया. ये अति थी. पांच दिसंबर की शाम तक पूरे शहर में हजारों ऐसे लोग थे, जिनकी आंखें जल रही थीं, गले चोक हो चुके थे. सांस लेने में दिक्कत हो रही थी. खांसते-खांसते जान निकल जा रही थी. कुछ के लिए सांस लेना ही मुश्किल हो चुका था. कुछ को दम घुटता हुआ महसूस हो रहा था. रात होते-होते मौत की खबरें आने लगीं.

वो भयावह काला स्मॉग शहर वालों के लिए ऐसा मौत का सौदागर बन गया, जिसने हर घर में अपने पैर पसार लिए.


स्मॉग बना मौत का सौदागर 
फिर अगले पांच दिनों तक लंदन में स्मॉग मौत का सौदागर बना रहा. नौ दिसंबर को जब तेज हवा इस काले भयावह स्मॉग को उड़ाकर ले गई तब तक लंदन मातमी शहर में बदल चुका था. सरकारी आंकड़ों ने कहा चार दिनों में स्मॉग से 4000 लोगों की मौत हुई तो एक्सपर्ट्स ने कहा कि मौत का आंकड़ा 8000 से कम नहीं है.

जानकारों का मानना था कि दरअसल ये संख्या जरूर 12 हजार को पार कर गई होगी. बीमार लोगों का हाल ये था कि अगले छह महीने तक इसका असर देखा जाता रहा. इस शहर की बड़ी आबादी सांस संबंधी रोगों का शिकार हो गई. इस स्मॉग को कुछ लोगों ने काला भूत कहा, जो दरवाजा खोलते ही घर के अंदर घुस आता था.

लंदन में इस घने स्मॉग में दृश्यता बहुत कम हो गई थी.आंखों से अपनी ही एड़ियां नजर नहीं आती थीं


जैसा आप तस्वीरों में भी देख रहे हैं कि लंदन के कुछ इलाकों में ये स्मॉग इतना घना था कि आंखों से अपने ही पैरों की एड़ियां नजर नहीं आती थीं. पांच दिनों तक लंदन ठप हो गया. ना स्कूल खुले ना ऑफिस और ना बाजार.

इसके बाद ही दुनियाभर में पर्यावरण पर रिसर्च, स्वास्थ्य पर इसका असर और सरकार के पर्यावरण संबंधी कानून से लेकर हवा की शुद्धता को लेकर जन जागरूकता की बातें शुरू हुईं. बाद में 1956 में पहली बार ब्रिटेन में क्लीन एयर एक्ट बना.



लंदन के ग्रेट स्मॉग में जिस तरह से दिन में अंधेरा हुआ, उससे पक्षी तक बेचैन थे.

क्या थी ग्रेट स्मॉग की वजह
सर्दियों में लंदन के लोग बड़े पैमाने पर अपने घरों को गर्म रखने के लिए कोयला जलाते थे. इसके धुएं से बड़े पैमाने पर सल्फर डाई ऑक्साइड बनता था. लंदन के इलाकों में कोयला आधारित कई पॉवर स्टेशन भी शुरू हो चुके थे. वो सल्फर डॉई ऑक्साइड में और बढ़ोतरी कर रहे थे.

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लंदन के मौसम विभाग के अनुसार ये सभी चीजें हवा में रोज एक हजार टन स्मोक पार्टिकल्स, 140 टन हाइड्रॉलिक एसिड, 14 टन फ्लोरिन कंपाउंड्स, 370 टन सल्फर डाईऑक्साइड हवा में घोलती थीं. जो सल्फ्यूरिक एसिड के तौर पर 800 टन नमी पैदा करती थी.

लंदन में उन दिनों काफी कोयला जलाया जाता था, ये स्मॉग उसी की देन थी


साथ ही वाहनों के जरिए हवा में जो प्रदूषण होता था, सो अलग. उस समय कोयला स्टीम आधारित ट्रेनें और डीजल के ईंधन वाली बसें चला करती थीं, जिन्हें बाद में इलेक्ट्रिक ट्रॉम सिस्टम से रिप्लेस किया गया.

ग्रेट स्मॉग में लंदन में एक लाख से ज्यादा लोग बीमार पड़े


मौसम कैसा था
04 दिसंबर को लंदन में गर्म हवा और कोहरे के मिश्रण से स्मॉग की मोटी परत बनती चली गई. स्मॉग में वो धुआं शामिल था जो लोगों के घरों और फैक्ट्रियों की चिमनियों से निकल रहा था. इन सबसे मिलकर स्मॉग की इतनी मोटी सतह बन गई तो अगले कई दिनों तक बरकरार रही.

क्या असर हुआ
दृश्यता बहुत घट गई. केवल कुछ मीटर तक. इसमें ऐसा लग रहा था मानो आप अंधे हो गए हों. ड्राइविंग करना तो असंभव ही था.
- पब्लिक ट्रांसपोर्ट बंद कर दिए गए. हालांकि लंदन अंडरग्राउंड की सेवाएं चालू रहीं. एंबुलेंस सर्विस रोक दी गई. जिससे लोगों को खुद अपने बल पर अस्पताल पहुंचना पड़ रहा था.
- स्मॉग इतना घना था कि ये घरों और इंडोर में घुस आया. इसके चलते कंसर्ट और फिल्म स्क्रीनिंग बंद कर दी गई. आउटडोर स्पोर्ट्स इवेंट्स रद्द हो गए.
- दिन में नजर नहीं ही आ रहा था. लोगों के लिए घरों से बाहर निकलना मुश्किल हो गया. रात में हालत और भी खराब हो गई.
- उन दिनों स्मॉग मास्क न के बराबर थे और अगर थे भी तो बहुत महंगे, लिहाजा ज्यादातर लोग उसको खरीदने की स्थिति में नहीं थे.

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First published: November 4, 2019, 8:55 PM IST
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