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कोरोना रहा तो क्या होंगे हमारे फ्यूचर के कपड़े और तौर-तरीके

कोरोना रहा तो क्या होंगे हमारे फ्यूचर के कपड़े और तौर-तरीके

जब भी फैशन में कोई बड़ा बदलाव आया है, उसकी शुरुआत जरूरत से हुई लेकिन फिर वही पसंद बन गया

जब भी फैशन में कोई बड़ा बदलाव आया है, उसकी शुरुआत जरूरत से हुई लेकिन फिर वही पसंद बन गया

रहस्यमयी कोरोना वायरस (coronavirus) के बारे में कयास है कि ये सीजनल बीमारी (seasonal disease) भी बन सकता है. अगर ऐसा हुआ तो आने वाले वक्त में सबसे पहले हमारे कपड़ों पर असर दिखेगा. बैक्टीरिया मारने वाले साबुन (antibacterial soap) की तर्ज पर जर्म-फ्री भी कपड़े बनेंगे.

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    पूरी दुनिया में 19 लाख से ज्यादा लोग कोरोना संक्रमित (corona infected) हो चुके हैं, जबकि 1 लाख 20 हजार से ज्यादा जानें जा चुकी हैं. चूंकि कोविड-19 (Covid-19) नया वायरस (virus) है इसलिए इसके बारे में रोज नए-नए अनुमान लगाए जा रहे हैं. कई देशों ने मास्क (mask) पहनने को अनिवार्य कर दिया है तो कईयों का मानना है कि ये सिर्फ संक्रमितों को पहनाया जाना चाहिए. इसी बीच एक सवाल ये भी आ रहा है कि कोरोना (corona) अगर जिंदगी का हिस्सा बन गया तो फैशन और खासकर कपड़ों में क्या फर्क आएगा.

    क्या कहते हैं फैशन हिस्टॉरियन
    Worn on This Day: The Clothes That Made History की लेखिका और फैशन हिस्टॉरियन Kimberly Chrisman-Campbell का मानना है कि कई बड़ी घटनाओं के बाद दुनिया का तत्कालीन फैशन पूरी तरह से बदला और उसकी जगह नई जरूरत ने ले ली थी. जैसे दूसरे विश्व युद्ध के बाद औरतों के कपड़ों में खासा बदलाव दिखा. लंबी स्कर्ट और गाउन जैसे कपड़ों की जगह चुस्त पैंट ने ले ली थी, जिन्हें पहनने और काम के लिए निकलने में वक्त न लगे. कैंपबेल के अनुसार जब भी फैशन में कोई बड़ा बदलाव आया है, उसकी शुरुआत जरूरत से हुई लेकिन फिर वही पसंद बन गया.

    नाजुक और छोटे-छोटे पीस में आने वाले कपड़ों की जगह सिंगल पीस, पैंट-शर्ट जैसे कपड़ों ने ले ली


    पहले नहीं था कपड़े धोने का चलन
    जैसे 1918 में फैले स्पेनिश फ्लू, जिसमें करोड़ों जानें गई, उससे पहले कपड़े धोने का चलन नहीं था. कपड़े महीने या कई महीने में एकाध बार धोए जाते थे. Fordham University की पैशन हिस्टोरियन Allison Pfingst बताती हैं कि तब कपड़े धोने की मशीन नहीं थी और न ही कपड़े धोने की खास जरूरत महसूस होती थी. फ्लू फैलने पर कपड़े धोने का चलन आया और तब नाजुक और छोटे-छोटे पीस में आने वाले कपड़ों की जगह सिंगल पीस, पैंट-शर्ट जैसे कपड़ों ने ले ली. खासकर ऐसे कपड़े जो आराम देने के साथ शरीर को पूरा-पूरा ढंक सकें. Boston Consulting Group की प्रमुख Javier Seara मानती हैं कि इतिहास बदलने वाले घटनाओं के बाद लोग ऐसे कपड़े लेने लगे, जिनकी क्वालिटी अच्छी हो लेकिन जो कम से कम पीसेज में हो यानी जो फटाफट पहना जा सके.

    बनेंगे खास कोरोना कपड़े
    कोरोना वायरस का कहर भी कुछ ऐसा ही हो सकता है. इसका असर काफी कुछ अभी से दिख रहा है, जब लोग ढीले-ढाले और पूरी तरह ढंके हुए कपड़े पहनकर ही बाहर आ रहे हैं. सबके चेहरों पर मास्क है. देश में हालांकि इसकी अनिवार्यता लागू हुए हफ्ताभर ही हुआ लेकिन इसके पहले से ही लोग बाहर निकलते हुए मास्क पहनने लगे थे. इसके अलावा वर्क फ्रॉम होम की जरूरत का भी फैशन स्टाइल पर फर्क पड़ा. अव्वल तो लोग शॉपिंग कर ही नहीं रहे और कर भी रहे हैं तो आरामदायक कपड़ों की. योगा पैंट इस दौरान काफी पसंद किए जा रहे हैं ताकि घर बैठे लोग किसी न किसी तरह की फिजिकल एक्टिविटी कर सकें. रोजमर्रा के ये कपड़े बाहर जाने के लिए खास 'कोरोना कपड़ों' के साथ कोएग्जिस्ट कर सकेंगे.

    बैक्टीरिया मारने वाले साबुन की तर्ज पर जर्म-फ्री भी कपड़े बनेंगे


    क्या होगी इनकी खासियत
    कोरोना वायरस सतह पर कई घंटे रह सकता है, इसे देखते हुए कपड़ों के लिए ऐसा फैब्रिक तैयार किया जा सकता है जो जर्म-फ्री हो या ज्यादा से ज्यादा देर तक जर्म-फ्री रह सके. इसे Antimicrobial fabric कहा जा सकता है. बहुत से देश अपने हेल्थ प्रोफेशनल्स के लिए पहले से ही ऐसी कोई खोज करने की कोशिश में हैं, अब कोरोना के संक्रमण से इसे और बढ़ावा मिल सकता है. वैसे अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली खास किस्म की चादरें और परदों में एंटीमाइक्रोबियल गुण होते हैं, यानी ये कपड़े इस तरह से बनते हैं कि इनमें वायरस, बैक्टीरिया, फंगी जैसे पैथोजन कम से कम हमला करें. ये अक्सर हरे या नीले रंग में आते हैं. मिलिट्री के कपड़ों में भी इसी तरह का फैब्रिक उपयोग होता है. टैक्सटाइल में लगी कंपनियों का कहना है कि जैसे एंटीबैक्टीरियल साबुन होते हैं, ये कपड़े भी उसी तर्ज पर काम करेंगे यानी संक्रमण को कम से कम रखने की कोशिश करेंगे.

    चीन ने शुरू किया काम
    इसी के साथ प्रोटेक्टिव कैप भी पहनी जाएगी. ये उसी तरह की होगी, जैसे फिलहाल डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ अस्पताल में पहन रहे हैं. फर्क इतना ही रहेगा कि ये थोड़ी स्टाइलिश हो सकती हैं. वायरस का केंद्र रहे देश चीन की एक कंपनी ने अभी से ऐसा कैप बनाना शुरू कर दिया है. उसका दावा है कि ये हवा से फैलने वाले जर्म्स के साथ-साथ खतरनाक UV किरणों से भी बचाता है.

    वायरस का केंद्र रहे देश चीन की एक कंपनी ने अभी से ऐसा कैप बनाना शुरू कर दिया है


    लेटेक्स ग्लव्स पहने जाएंगे
    चूंकि कोरोना वायरस संक्रमित के खांसने-छींकने पर हवा के साथ-साथ संक्रमित सतह को छूने पर भी फैलता है इसलिए हाथों के बचाव पर सबसे पहले ध्यान दिया जाएगा. बाहर निकलते हुए सारे लोग लेटेक्स ग्लव्स (latex gloves) पहनेंगे. ये रबर, लेटेक्स, पॉलीविनाइल क्लोराइड से बने होते हैं, जिनपर कॉर्न स्टार्च की परत होती है ताकि वे हाथों में आसानी से जा सकें और काम होने के बाद तुरंत निकाले जा सकें. सर्जरी के दौरान डॉक्टर इसी तरह के ग्लव्स पहनते हैं. लेकिन कोरोना के साथ ये आम लोगों की जिंदगी का भी हिस्सा बन जाएगा. लोग ग्लव्स पहनकर बाहर निकलेंगे और घर पहुंचते ही उन्हें फेंक दिया जाएगा.

    UK के ब्राइटन शहर की सारी दुकानों में अब कस्टमरों के लिए ग्लव्स पहनकर आना अनिवार्य कर दिया गया है. बता दें कि ये UK का वही शहर है, जो शुरुआत में कोरोना का हॉटस्पॉट रहा. इसके साथ ही हाथ मिलाने का कल्चर पूरी तरह से खत्म हो सकता है. अभी से इसका असर नजर आ रहा है और लोग भारत की नमस्ते संस्कृति की बात करने लगे हैं.

    जूते भी कोरोना-काल से प्रभावित होंगे
    Centers for Disease Control and Prevention की वुहान में स्टडी बताती है कि संक्रमितों के साथ काम करने वाले आधे से ज्यादा हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स के जूतों के तलों पर कोरोना वायरस था. यहां तक कि दवा की दुकानों का फर्श 100% कोरोना पॉजिटिव था. यानी कोरोना लंबे वक्त तक रहा तो जूते पहनने का तरीका भी बदलेगा. पूरी तरह से ढंके हुए जूते पहने जाएंगे और लौटते ही उन्हें घर से बाहर छोड़ा जाएगा या फिर ब्लीच के साथ धोया जाएगा. बाथरूम स्लिपर या खुली चप्पलें घरों के भीतर ही सीमित रह जाएंगी. ऐसे में महिलाओं के फुटवेयर में सबसे बड़ा बदलाव आ सकता है, और हाई हील्स या सैंडल्स फैशन से बाहर हो जाएंगे. चमड़े के जूते पहनने के शौकीनों को उसे पानी में 70% अल्कोहल मिलाकर धोना होगा ताकि वे संक्रमण-मुक्त हो सकें.

    कोरोना अगर स्थायी हो गया तो सबसे पहले आते ही हाथ-पैर धोने या नहाने का चलन आएगा.


    स्टाइलिश रिस्ट बैंड या नेक पीस
    एक बड़ा बदलाव गहनों पर दिखेगा. फिलहाल तक पहने जा रही जूलरी लगभग बंद हो जाएगी और मर्द-औरतें दोनों ही किसी तरह का रिस्ट बैंड पहनने होंगे जो ये बता सकें कि कितने मीटर के दायरे पर खड़े शख्स में फ्लू जैसे लक्षण हैं. अभी ही कई देशों ने इसपर एप निकालें हैं जो मोबाइल पर डाउनलोड हो सकते हैं लेकिन भविष्य में ये स्टाइलिश रिस्ट बैंड या नेक पीस के रूप में भी आ सकता है. चूंकि सॉलिड सतह पर कोरोना वायरस लंबे वक्त तक रह पाते हैं इसलिए जूलरी घर के भीतर तक सीमित रह जाएगी, जहां संक्रमण का डर न हो.

    हाथ-पैर धोने या नहाने का चलन 
    कपड़ों-एक्सेसरीज के साथ एक बड़ा बदलाव मेजबान-मेहमाननवाजी पर दिखने वाला है. फिलहाल मेहमान आते ही ड्रॉइंगरूम में बैठ जाते हैं लेकिन कोरोना अगर स्थायी हो गया तो सबसे पहले आते ही हाथ-पैर धोने या नहाने का चलन आएगा. भारत में पुराने वक्त में ये हर घर में हुआ करता था कि घर के बाहर ही पानी से भरी बाल्टी और लोटा हुआ करता था, मेहमान आते ही पहले हाथ-मुंह धोते, तब घर के भीतर पहुंचते थे. अब चूंकि लंबी-ऊंची इमारतों में घरों के बाहर हाथ-मुंह नहीं धोया जा सकता, लिहाजा हर घर की डोरबेल के साथ ही सैनेटाइजर का बड़ा डिब्बा लटकता दिखेगा. बेल बजाएं और दरवाजा खुलने का इंतजार करते हुए हाथों को सैनेटाइज करें, तब भीतर जाएं. जाने से पहले जूते भी बाहर ही उतारे जाएंगे. अगर आप घरवालों के करीबी हैं तो हाथों के सैनेटाइजेशन के बाद नहाने की जरूरत भी पड़ सकती है.

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    Tags: Corona patients, Coronavirus, Coronavirus Epidemic, Coronavirus in India, Fashion, Health News

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