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1977 आम चुनाव: इस वाकये से इंदिरा गांधी को मान लेंगे सियासत का 'सिकंदर'

इंदिरा गांधी (फाइल फोटो)
इंदिरा गांधी (फाइल फोटो)

1977 के आम चुनावों में इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी दोनों ही अपनी-अपनी सीटें हार गए थे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 11, 2019, 7:25 AM IST
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छठी लोकसभा चुने जाने के लिए आम चुनाव 1977 में हुए. ये चुनाव 542 सीटों पर लड़े गए थे. देश में उस वक्त कुल मिलाकर 27 राज्य और केंद्रशासित प्रदेश थे. 1975 में इंदिरा गांधी की लगाई इमरजेंसी के बाद लड़े जा रहे चुनावों में सिर्फ इमरजेंसी और उस दौरान हुई बर्बरता का मुद्दा था. ऐसे में जिसकी आशा थी, वही हुआ. पहली बार कांग्रेस की केंद्र की सत्ता से विदाई हुई. कांग्रेस की बहुत बड़ी हार हुई और पिछले बार के मुकाबले उसने 200 सीटें खो दीं.

कांग्रेस को 1977 में 34.5 परसेंट वोट मिले, जबकि 1971 के चुनावों में कांग्रेस को 43.7 परसेंट वोट मिले थे. 1977 के आम चुनावों में कांग्रेस की हार इतनी बुरी थी कि खुद इंदिरा गांधी और संजय गांधी भी अपनी सीटें हार गए. 1977 के बाद जनता पार्टी की सरकार आई और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने. लेकिन हम आपको बताने जा रहे हैं कि कैसे 1977 की हार इंदिरा गांधी की असली हार नहीं बनी और एक साल में ही जनता या तो उनके इमरजेंसी के फैसले को भूल गई या उसने इसके लिए इंदिरा गांधी को माफ कर दिया.

दरअसल इंदिरा गांधी को 1977 में अपनी मजबूत मानी जाने वाली रायबरेली सीट पर समाजवादी नेता राज नारायण से मात खानी पड़ी थी. लेकिन इसके अगले ही साल 1978 में उन्होंने कर्नाटक की चिकमंगलूर सीट से होने वाले उपचुनाव में भाग लिया और जीतीं. इस तरह से फिर से उनके संसद पहुंचने, खुद को राजनीतिक तौर पर मजबूत करने और 1980 में फिर से सत्ता में वापस आने का रास्ता खुला. लेकिन इस उपचुनाव की सबसे रोचक बात थे उनके मुख्य प्रतिद्वंदी, जनता पार्टी के उम्मीदवार. इनका नाम था वीरेंद्र पाटिल.



जॉर्ज फर्नांडिस भी कर्नाटक से ही आते थे और वे इमरजेंसी के अत्याचारों के प्रतीक बन चुके थे. वे इस उपचुनाव के लिए जनता पार्टी के उम्मीदवार वीरेंद्र पाटिल का प्रचार मैनेजर बने थे, लेकिन वे भी इंदिरा गांधी को नहीं रोक सके. जैसे ही इंदिरा गांधी को गिरफ्तार किया गया और उसके बाद इंदिरा गांधी का हाथी पर बैठकर घूमना और मीलों पैदल चलकर बिहार में हुई जातीय हिंसा को देखने जाने जैसे वाकयों ने फिर से जनता की सहानुभूति उन्हें दिलाई.
इंदिरा कुछ ही दिनों में फिर से भारत की जनता की चहेती बन चुकी थीं. यही वजह थी कि अगले ही लोकसभा चुनावों में उन्होंने 55.7 परसेंट रिकॉर्ड वोटों के साथ जीत दर्ज की. इतना ही नहीं 11 सालों बाद 1978 के उपचुनावों में इंदिरा गांधी के प्रतिद्वंद्वी बनने वाले वीरेंद्र पाटिल ने कर्नाटक में कांग्रेस के मुख्यमंत्री के पद की शपथ ली. पाटिल मुख्यमंत्री बन सके क्योंकि वे राजीव गांधी के करीबी थे और यही वजह थी कि उन्हें एस बंगारप्पा और एम वीरप्पा मोइली जैसे नेताओं के ऊपर तरजीह दी गई.

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