कर्नाटक का एक छोटा सा गांव, जिसे बताया जा रहा है इंडिया की सीक्रेट न्यूक्लियर सिटी

कर्नाटक का ये छोटा सा गांव देखते ही देखते पिछले कुछ सालों से विदेशी मीडिया के बीच कौतुहल का विषय बन गया है. देश के चार बड़े साइंस संस्थान यहां काम करेंगे

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: April 30, 2019, 12:39 PM IST
Sanjay Srivastava
Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: April 30, 2019, 12:39 PM IST
कर्नाटक में बन रहा एक नया शहर पिछले कुछ सालों से लगातार विदेशी मीडिया के बीच कौतूहल का विषय बना हुआ है. पाकिस्तान से लेकर अमेरिका तक का मीडिया मानता है कि ये भारत का वो शहर तैयार हो रहा है, जहां भारत के न्यूक्लियर हथियार तैयार होंगे. जिस तरह से गुपचुप इसके लिए कई गांवों से जमीनें अधिग्रहित की गईं और फिर देखते ही देखते एक बड़े भूभाग पर ऊंची दीवार खड़ी कर दी गई. तो वो भी सवालों को हवा दे रहा है.

तो कौन सा है ये शहर. क्यों इसे विदेशी मीडिया भारत का सीक्रेट न्यूक्लियर सिटी कह रहा है. देखते ही देखते कुछ सालों में यहां पर बाहर से आने वालों की भीड़ क्यों बढ़ गई है. क्यों यहां पर बाहर से कुछ ज्यादा ही मजदूर आकर काम में जुटे हुए हैं. क्या ये वास्तव में ऐसा शहर बन रहा है, जिसका अपना रहस्य है या जिसे खास मकसद से बनाया जा रहा है.



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अब जानते हैं कि ये जगह क्या है और कहां है. इसका नाम है चल्लाकेरे. एक बहुत छोटा से गांव का स्टेशन. जिसे कोई कभी नोटिस नहीं लेता था, लेकिन अब यहां ट्रेनें रुकने लगी हैं और कुछ ज्यादा ही लोग उतरने लगे हैं. ये दक्षिणी कर्नाटक में है. जिस जिले में है, उसका नाम चित्रदुर्गा है.

क्या होगा इस जगह पर 
विदेशी मीडिया का खयाल है कि भारत यहां सीक्रेट न्यूक्लियर सिटी बना रहा है, जहां परमाणु हथियार निर्माण, यूरेनियम परिशोधन, शोध और रॉकेट-मिसाइल संबंधी नए काम होंगे. हालांकि भारत ने इससे इनकार किया है, लेकिन कुछ साल पहले परमाणु प्रोग्राम के एक उच्चाधिकारी कहना था कि हो सकता है कि भारत यहां यूरेनियम ईंधन को प्रोसेस करे.

कौन से चार संस्थान यहां बनाए जा रहे हैं
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अब तक यहां 10000 एकड़ जमीन के भीतर दिन रात काम चल रहा है. चार ऐसे संस्थान एक साथ बनाए जा रहे हैं, जो भारत के सामरिक कार्यक्रम को अंजाम देने में साथ-साथ भूमिका निभाते रहे हैं. ये चारों देश के शीर्ष साइंस और रिसर्च संस्थान हैं.

चारों इस तरह बनाए जा रहे हैं कि उनमें भविष्य में काम शुरू होने के बाद पुख्ता तालमेल रहे ताकि देश की विज्ञान औऱ शोध संबंधी भविष्य की जरूरतों को तेजी से न केवल पूरा किया जा सके बल्कि देश को मजबूती भी दी जा सके.

ये है कर्नाटक का चल्लाकेरे गांव, जहां बड़े पैमाने पर दिन-रात काम करके बनाया जा है एक शहर


तब पता चला कि यहां क्या होने वाला है
वर्ष 2009 में जब बड़े पैमाने पर किसानों की जमीन अधिग्रहित होने लगी तो इलाके के लोगों ने बेंगलुरु हाईकोर्ट की शरण ली, जहां कर्नाटक सरकार को जानकारी देनी पड़ी कि ये जमीन किस काम आने वाली है.

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इसमें से 4290 एकड़ जमीन डीआरडीओ यानि डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट आर्गनाइजेशन को दी गई है. 1500 एकड़ जमीन इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस को. 573 एकड़ जमीन इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गनाइजेशन औऱ 1810 एकड़ भाभा एटामिक रिसर्च सेंटर को अलाट की गई है. कुछ बचा इलाका कर्नाटक स्माल स्केल इंडस्ट्रीज डेवलपमेंट कार्पोरेशन को मिला.

वर्ष 2011 में भारत सरकार ने घोषणा की कि इन चार संस्थानों को एक साथ एक जगह जमीन देने का उद्देश्य ये है कि भारत के भविष्य के प्रोजेक्ट सुरक्षित औऱ शांत जगह में विकसित किए जा सकें. इस जगह को साइंस सिटी नाम दिया गया. यहां डीआरडीओ एयरस्पेस औऱ मिसाइल टेक्नॉलाजी के उन्नत प्रोग्राम चलाएगा.

क्या यहां विकसित होंगे भविष्य के हथियार
अगर अमेरिका की प्रसिद्ध पत्रिका ''फारेन पॉलिसी'' पर गौर करें, जिसने कुछ समय पहले एक बहुत बड़ी रिपोर्ट छापी कि किस तरह भारत चल्लाकेरे में एक गुप्त न्यूक्लियर सिटी बना रहा है, जहां एटामिक बम के साथ भविष्य के हथियार विकसित किए जाएंगे.

ये विशाल परिसर सैन्य गतिविधियों से संबंधित प्रोग्राम के लिए संचालित किया जाएगा. इसमें तरह-तरह की प्रयोगशालाएं होंगी, जो न्यूक्लियर शोध तो करेंगी ही साथ में हथियारों के उत्पादन और एयरक्रॉफ्ट परीक्षण सुविधाओं का भी काम करेंगी.

भारत सरकार ने इस बन रहे शहर को साइंस सिटी कहा है


इसी शहर में हमारे न्यूक्लियर रिएक्टरों के लिए ईंधन बनाने का काम होगा, देश के पनडुब्बी बेड़ों को नाभिकीय ताकत से लैस करने के अभियान को अंजाम दिया जाएगा.

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2012 में शुरू हुआ था काम 
चिल्लाकेरे में वर्ष 2012 में रातों-रात काम शुरू हो गया. गांववालों में तब नाराजगी भी फैली जब उन्होंने देखा कि उनके खेतों और घरों के आसपास कंटीले तारों के बाड़ बिछा दिए गए हैं. गांव की सड़क की दिशा बदल दी गई है. ढेर सारी मशीनें नजर आने लगीं. कुछ दिनों बाद पक्की चारदीवारी बना दी गई. जो इतनी ऊंची थी कि पता भी नहीं चले कि अंदर क्या बन रहा है.

दक्षिण भारत की प्रमुख वेबसाइट न्यूजमिनिट्स डॉट कॉम ने रिपोर्ट पब्लिश की है कि लोगों ने खुद को जमीनों से बेदखल किए जाने का विरोध किया. लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ. एक दो सालों के भीतर इसका काम पूरा हो जाने की उम्मीद है. ये कर्नाटक का ऐसा इलाका भी है, जहां सौ से ऊपर किसान सूखे के कारण आत्महत्या कर चुके हैं.

भारत का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट
''फॉरेन पॉलिसी'' की रिपोर्ट के अनुसार ये महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है. वैसे ये रिपोर्ट एड्रियन लेवी नाम के उस लेखक की है, जिन्होंने पाकिस्तान के न्यूक्लियर प्रोग्राम से जुड़ी मशहूर किताब, ”डिसेप्शन पाकिस्‍तान, द युनाइटेड स्टेट्स एंड द सीक्रेट ट्रेड इन न्यूक्लियर वेपंस” लिखी है.

वर्ष 2009 में ये हालत थी चल्लाकेरे गांव की


क्या कहते हैं विशेषज्ञ
''फॉरेन पॉलिसी'' में रिपोर्ट के लेखक एड्रियन ने कुछ विशेषज्ञों से भी बात की, जिनके अनुसार भारत अगर नाभिकीय प्रोजेक्ट्स को विकसित कर रहा है तो इसका मतलब ये हुआ कि भविष्य में इसके जरिए वो परिष्कृत यूरेनियम का अतिरिक्त भंडार हासिल कर सकेगा, जिसका प्रयोग हाइड्रोजन बम या थर्मो न्यूक्लियर हथियारों में होता है.

पाकिस्तान भी इसे लेकर चिंता जरूर जाहिर कर चुका है. पश्चिमी मीडिया का शक है कि इसके बनने के बाद भारत परमाणु क्षमता में ज्यादा ताकत हासिल कर लेगा-वह कहीं ज्यादा बड़े और घातक नाभिकीय हथियार बना सकेगा.

स्टाकहोम इंस्टीट्यूट का अनुमान है कि भारत के पास फिलहाल 90 से 110 परमाणु हथियार हैं तो पाकिस्तान के पास ये क्षमता 120 की है जबकि चीन की 260 की. भविष्य में इसके और बढ़ने की आशंका जाहिर की जा रही है.

दुनिया के तीन ही देशों में हो रहा है ये 
''फॉरेन पॉलिसी'' मैगजीन ने ऑस्ट्रेलिया के परमाणु विशेषज्ञ जान कार्लसन को ये कहते हुए उद्धृत किया कि दुनिया में तीन ही देश अब भी नाभिकीय हथियारों के जरूरी सामानों का उत्पादन कर रहे हैं-वो भारत, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया हैं. कार्लसन का कहना है कि भारत का थर्मोन्यूक्लियर प्रोग्राम इतनी उन्नत स्थिति में पहुंच चुका है कि इस मामले में उसे ब्रिटेन, अमेरिका, रूस, फ्रांस और चीन के बराबर माना जा सकता है.

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