इस देश में आए हजारों भूकंपों को क्यों माना जा रहा है ज्वालामुखी फूटने का संकेत

आइसलैंड में पिछले महीने बड़ी संख्या में भूकंप आने से वहां ज्वालामुखी के फटने के अंदेशा बढ़ गया है.  (प्रतीकात्मक फोटो)
आइसलैंड में पिछले महीने बड़ी संख्या में भूकंप आने से वहां ज्वालामुखी के फटने के अंदेशा बढ़ गया है. (प्रतीकात्मक फोटो)

पिछले महीने आइसलैंड (Iceland) में बहुत सारे भूकंप (Earthquake) आए हैं, इससे वहां के ज्वालामुखी (Volcano) के फटने की संभावना ज्यादा हो गई है.

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नई दिल्ली: ज्वालामुखी (Volcanos) और भूकंपों (Earthquakes) का गहरा संबंध है. जब भी किसी इलाके में एक के बाद एक बहुत से भूकंप आते हैं तो वहां आसपास स्थित ज्वालामुखी पर्वतों में विस्फोट (Eruption) होने की संभावना बढ़ जाती है. और अगर वह इलाके संवेदनशील टेक्टोनिक क्षेत्र (Tectonic Zone) में आता हो तो इस बात की गुंजाइश और ज्यादा हो जाती है. ऐसा ही कुछ आइसलैंड (Iceland) में होने की संभावना है जहां पिछले महीने एक के बाद बहुत सारे भूकंप आए हैं.

तीन हजार भूकंप के झटके
आइसलैंड के मौसम विभाग  (IMO) ने सोमवार को कहा है कि पिछले एक महीने में तीन हजार भूकंप के झटके आइसलैंड के उत्तरी तटों पर महसूस किए गए हैं. हाल ही में तीन भूकंप 5 की स्तर पर दर्ज किए गए इनमें से एक राजधानी रेक्जाविक में भी आया था जो भूकंप के केंद्र से 265 किलोमीटर ही दूर था. इस भूकंप का केंद्र  एक छोटे से गांव से 20 किलोमीटर दूर था जिसकी आबादी 1200 है.  और देश की दूसरे सबसे बड़े शहर अकुरेयरी से कुछ दर्जन किलोमीटर ही दूर था जिसकी जनसंख्या बीस हजार है.

अभी और चलेगा भूकंपों का सिलसिला
एक सरकारी संस्थान के मुताबिक जिस तरह पिछली बार लगातार भूकंप आए थे, उससे लगता है कि इस बार यह सिलसिला अभी और चलेगा. लेकिन ज्यादातर मामलों में यह किसी बड़ी घटना के खत्म होता है. अभी तक भूकंप के झटकों से कोई बड़ी दुर्घटना या नुकसान की खबर नही हैं, लेकिन कुछ जगह पर जमीन खिसकने और पत्थरों के गिरने की घटाएं देखी गई हैं.



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आइसलैंड में इससे पहले भी ज्वालामुखी फटने से पहले कई भूकंप आ चुके हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


क्यों लग रहा है खतरा
इन भूकंपों को साथ ही अधिकारियों ने आगाह किया है कि देश का सबसे सक्रिय ज्वालामुखी जल्द ही फूट सकता है. वैज्ञानिकों ने जमीन के नीचे काफी मात्रा में सल्फर डाइऑक्साइड पाई है जो कम गहराई पर ही मैग्मा के होने को दर्शाता है.

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क्या हुआ था पिछली बार ज्वालामुखी फटने पर
उत्तर पश्चिम में वैटनाजोकुल आइस कैप पर ग्रिम्सवोट्न ज्वालामुखी स्थिति है जो पिछली बार साल 2011 में फूटा था. इसकी वजह से रेक्वाजाविक के केप्लाविक एयरपोर्ट को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा था और यूरोप की करीब 900 फ्लाइट बंद करनी पड़ी थी.

और बाढ़ का खतरा भी
आईएमओ के अनुसार ज्वालामुखी से सबसे बड़ा खतरा बाढ़ का है. क्योंकि ज्वालामुखी की वजह से पैदा हुई गर्मी से पहाड़ों की बर्फ पिघलने लगेगी. इस बारे में भी हमें सोच कर चलना होगा.  आइसलैंड उत्तरी अमेरिका और यूरेशिया की प्लेटों की सीमाओं पर स्थित है. इसमें मध्य अटलांटिक कगार इसके बीच में से जाती है. इसी की वजह से कई टेक्टोनिक और ज्वालीमुखी क्षेत्र यहां आ जाते हैं.

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गर्म लावा के कारण वहां के ग्लेशियर पिघलने से बाढ़ का खतरा भी होगा. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


2010 जितनी भीषण हालात की उम्मीद नहीं
ग्रिम्सवोट्न से पहले साल 2010 में दक्षिणी आइसलैंड के एजाफ्जालाजोकुल में ज्वालामुखी फटा था जिसके कारण बहुत ज्यादा मात्रा में धुएं और राख के बादल छा गए थे.  इसकी वजह से एक लाख उड़ाने रद्द हो गई थीं और करीब 20 लाख यात्री फंस गए थे. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ग्रिम्सवोट्न में विस्फोट होने से एजाफ्जालाजोकुल की तुलना में कम नुकसान हो सकता है.

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गौरतलब है कि 31मई से एक सितंबर तक आइसलैंड में गर्मी का मौसम होता है और इन्हीं दिनों यहां बड़ी संख्या में पर्यटन उद्योग चलता है. इसी वजह से इस मौसम में अगर ज्वालामुखी फटते हैं यहां बड़ी संख्या में यात्री फंस जाते हैं. पर्यटन पिछले कुछ दशकों में आइसलैंड का प्रमुख उद्योग के तौर पर उभरा है, लेकिन भूकंप और ज्वालामुखी का फटना इस पर बहुत बुरा असर डालता है.
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