लॉकडाउन की वजह से मारे जा रहे हैं हजारों जानवर और चूहे, ये भी हो रहा है असर

लॉकडाउन की वजह से मारे जा रहे हैं हजारों जानवर और चूहे, ये भी हो रहा है असर
लॉकडाउन के कारण शोध के लिए पाले गए चूहों को हजारों की संख्या में मारा गया है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

लॉकडाउन (Lockdown) होने के बाद शोधकार्य के लिए पाले गए हजारों चूहों (Mice) और कई जानवरों (Animals) को मारने के आदेश दिए गए. कई तो लॉकडाउन के हालात की वजह से मर गए.

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जानवरों (Animals) पर किए जाने वाले शोध (Research) का कई लोग विरोध करते हैं. उनका मानना है कि जिस तरह से हर इंसान को जीवन का अधिकार है उसी तरह बेजुबान जानवरों और अन्य जीवों को भी जीने का अधिकार है. यह भी सच है कि ज्यादातर जानवरों पर शोध उनके लिए जानलेवा नहीं होता. कोरोना के लाकडाउन का असर केवल इंसानों पर ही नहीं पड़ा है बल्कि जानवरों और हजारों चूहों पर भी पड़ा है. लैब में प्रयोग के लिए रखे गए तमाम प्रजातियों के जानवर और चूहे मारे जा रहे हैं.

बीमारी ने नहीं मर रहे हैं ये जानवर
दरअसल कोविड-19 से ये जानवर नहीं मर रहे हैं, लेकिन उसकी वजह से जरूर मर रहे हैं. दुनिया भर में शोध के चलते के चूहों सहित कई प्रकार के जानवरों को लैब में पाला जाता है. इनकी देखभाल की जाती है. इन प्राणियों पर कई तरह के प्रयोग होते हैं जो उनके लिए जानलेवा तो नहीं होते लेकिन जेनेटिक सहित कई बीमारियों के अध्ययन में ये जानवर काम के होते हैं. कुछ की प्रजाति विकसित करने में दशकों का समय लगा होता है. तो कुछ को पकड़ने के कुछ समय के बाद उन्हें वापस जंगल में छोड़ भी दिया जाता था.

मरे नहीं मारने का दिया गया आदेश
जब इस साल फरवरी मार्च में कई देशों में अचानक लॉकडाउन लगाया गया तो इन जानवरों की देखभाल का संकट सामने आ गया. सैकड़ों लैब में काम करने वालों को अपने चूहे मारने को कह दिया गया. पशु अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था पेटा ने इस मामले पर लोगों का ध्यान खींचा, लेकिन तब तक हजारों चूहों को मारा जा चुका था.



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कोरोना काल में लॉकडाउन के कारण शोधकार्य बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


कोरपालना तो गलत था ही मारने का आदेश क्यों
साइंसमैगऑर्ग में प्रकाशित खबर के मुताबिक पेटा की सीनियर वाइस प्रेसिडेंट कैथी गुलेर्मों का कहना है कि जब यूनिवर्सिटी या स्कूलों ने इन जानवरों पर प्रयोग की अनुमति दी थी तो इन्हें इतनी आसानी से मारने को क्यों कहा गया. प्रयोगकर्ता एक बार भी अपनी सुविधा का रास्ता अपना रहे हैं और उन जानवरों को मार रहे हैं जिन्हें प्रयोग के लिए लाकर पालना नहीं चाहिए था.

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हालात की दुहाई कितनी सही
वहीं इस तरह का फैसला लेने वालों का कहना है कि हालात ही ऐसे हो गए थे कि यह फैसला लेना पड़ा. किसी को भी और उन्हें भी, यह फैसला लेते समय खुशी नहीं हुई. बल्कि इससे तो बहुत से शोधकार्यों पर भी पानी फिर गया.  ऐसा नहीं है कि सभी लैब के लिए ऐसा हुआ है, यूरोप की कई लैब में जानवरों को भी बचाए रखने के इंतजाम किए गए हैं और वहां चूहों को मारने के आदेश नहीं दिए गए या नहीं देने पड़े हैं. ऐसा ही कुछ अमेरिका की कुछ प्रयोगशालाओं में भी हुआ है.

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सभी जानवरों पर कोविड-19 का संक्रमण नही हुआ है. ( फाइल फोटो)


कुछ शोधकर्ताओं ने भी की कोशिश
कई शोधकर्ताओं ने अपने नमूने वाले प्राणियों को बचाने की भी कोशिश की है और वे उन्हें अपने घर भी ले गए हैं. लेकिन हर तरह के जानवरों के साथ यह संभव नहीं भी है. वहीं कई शोध भी लॉकडाउन के कारण अटक गए हैं बंदरों को खास तौर पर परेशानी हो रही है. बंदरों से भी सोशल डिस्टेंसिंग की जा रही है कि कहीं इंसानों से ही उन बंदरों में में संक्रमण न हो जाए  जिसे क्रॉस इन्फेक्शन कहते हैं.

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वैसे तो ज्यादातर जानवरों को कोविड-19 संक्रमण नहीं हो रहा है, लेकिन लॉकडाउन से कई पालतू जानवरों की मुसीबत जरूर बढ़ गई है. उनकी आजादी छिन गई है. वहीं कुछ पालतू जानवरों में संक्रमण की भी खबरे हैं ऐसे में कई इन जानवरों को पालने वाले भी दुविधा में हैं, लेकिन जानवरों को मारने का आदेश दिया जाना इसके औचित्य पर सवाल जरूर उठ रहे हैं.
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