जन्मदिन : आजादी की लड़ाई के पहले शहीद थे बिहार के तिलका मांझी

संथाल विद्रोह, जिसके नायक थे तिलका मांझी

संथाल विद्रोह, जिसके नायक थे तिलका मांझी

11 फरवरी 1750 को बिहार में उस शख्स का जन्म हुआ था, जो असल में देश का पहला ऐसा क्रांतिकारी बना, जिसने अंग्रेजों के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी. उसकी वीरता के किस्से बिहार में जगह जगह कहे जाते हैं. बाद में इस क्रांतिकारी तिलका मांझी को पकड़कर फांसी दे दी गई.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 11, 2021, 2:43 PM IST
  • Share this:


भारतीय स्वाधीनता संग्राम की लड़ाई के पहले शहीद कौन थे. क्या आप उन्हें जानते हैं. क्या कभी उनका नाम सुना है. शायद ना तो आपने उनका नाम सुना हो और ना ही उनके बारे में जानते हों. हमारी आजादी की लड़ाई में रिकार्डों के अनुसार शहीद होने वाले पहले सेनानी बिहार के तिलका मांझी थे. जिन्होंने अंग्रेज शासन के अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाई.

तिलका मांझी का जन्म 11 फ़रवरी 1750 में बिहार के सुल्तानगंज में हुआ. 1785 में भागलपुर में अंग्रेजों ने उन्हें जेल में डालने के बाद फांसी पर चढ़ा दिया. उन्होंने अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ लंबी लड़ाई छेड़ी. संथालों के प्रसिद्ध 'संथाल विद्रोह' का नेतृत्व भी मांझी ने किया था.


उनका नाम देश के पहले स्वतंत्रता संग्रामी और शहीद के रूप में लिया जाता है. उन्हें 'जाबरा पहाड़िया' के नाम से भी जाना जाता था. उनका ज्यादा जीवन गांवों और जंगलों में कटा था. वो धनुष-बाण चलाने और जंगली जानवरों का शिकार में प्रवीण थे. कसरत-कुश्ती, बड़े-बड़े पेड़ों पर चढ़ना-उतरना, जंगलों में बेधड़क घूमना उनका रोजाना का काम था. वो निडर और वीर थे.








दुमका में लगी हुई भारत के पहले शहीद क्रांतिकारी तिलका मांझी की प्रतिमा




परिवार पर अंग्रेजों के अत्याचार को देखा

वो जब किशोर हुए तो उन्होंने परिवार तथा जाति पर अंग्रेज़ी सत्ता का अत्याचार होते देखा. वहां पर बसे पर्वतीय सरदार अपनी जमीन और खेती को बचाने के लिए अंग्रेजों से लड़ते रहते थे. ज़मींदार अंग्रेज़ी सरकार के साथ मिले हुए थे.




ये भी पढ़ें - देसी महाराजा विदेशी प्रेम : आधी उम्र की स्पेनी डांसर के प्यार में डूबे महाराजा पटियाला



तिलका ने सेना बनाकर विद्रोह कर दिया

आखिरकार जब तिलका मांझी को लगा कि अंग्रेजों का अत्याचार कुछ ज्यादा ही हो गया है तो उन्होंने 'बनैचारी जोर' नाम की जगह उनके खिलाफ विद्रोह शुरू किया. आदिवासी विद्रोही फैलने लगा. अंग्रेजों ने क्लीव लैंड को मजिस्ट्रेट बनाकर वहां हालात को काबू करने भेजा.



अंग्रेज अफसर को मार गिराया

मांझी जंगल, तराई और गंगा, ब्रह्मी और अन्य नदियों की घाटियों में अपने लोगों के साथ अंग्रेज़ी सरकार के सैनिक अफसरों के साथ संघर्ष करते रहे. ये लड़ाई मुंगेर से लेकर भागलपुर और संथाल तक फैली हुई थी. जगह जगह छिपकर अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध लड़ा जा रहा था.लड़ाई के साथ तिलका अपनी जगह भी बदल रहे थे. लड़ाई मांझी के हाथों राजमहल का सुपरिटेंडेंट क्लीव लैंड मारा गया.






भागलपुर में अंग्रेजी सरकार ने तिलका मांझी को 1785 में एक पेड़ से लटकाकर फांसी.की सजा दे दी. भागलपुर में लगी तिलका की प्रतिमा




 अंग्रेज सरकार थर्रा गई

ये ऐसी खबर थी, जिसने अंग्रेज़ी सरकार को थर्रा दिया. एकबारगी उन्हें तिलका मांझी से डर लगने लगा. लेकिन अंग्रेज सरकार उन्हें पकड़ने के लिए लगातार जाल फैला रही थी. उन्हीं के कुछ अंग्रेजों की मदद भी कर रहे थे.




बाद में अंग्रेजों ने घेरकर पकड़ लिया

अंग्रेजों का घेराव बढ़ते जाने से दिक्कतें बढ़ने लगीं. उनकी सेना के लोगों को भूखों मरने की नौबत आने लगी. इसके बाद उनके हौसले कम नहीं हुए. जब उन्होंने एक जगह अंग्रेज़ी सेना पर छापामार हमला बोला तो उन्हें घेर लिया गया. वो पकड़े गए.








पेड़ पर लटकाकर फांसी दे दी गई

सन 1785 में पेड़ पर रस्से से बांधकर तिलका मांझी को फांसी दे दी गई. वो पहले शख्स थे, जिन्होंने भारत को ग़ुलामी से मुक्त कराने के लिए अंग्रेज़ों के खिलाफ आवाज़ उठाई. क्रांतिकारी तिलका मांझी की याद में भागलपुर में कचहरी के करीब एक मूर्ति स्थापित है.




महाश्वेता देवी ने तिलका पर लिखा था उपन्यास


समय-समय पर कई लेखकों और इतिहासकारों ने उन्हें ‘प्रथम स्वतंत्रता सेनानी’ होने का सम्मान दिया है. महान लेखिका महाश्वेता देवी ने तिलका मांझी के जीवन और विद्रोह पर बांग्ला भाषा में एक उपन्यास ‘शालगिरर डाके’ की रचना की. एक और हिंदी उपन्यासकार राकेश कुमार सिंह ने अपने उपन्यास ‘हुल पहाड़िया’ में तिलका मांझी के संघर्ष पर लिखा है.



अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज