भारत में आज पहली बार: ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश के दो इलाकों को खरीदा

ब्रिटेन की ईस्ट इंडिया कंपनी के आने से डच कंपनी को बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ा

ब्रिटेन की ईस्ट इंडिया कंपनी के आने से डच कंपनी को बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ा

डेनिश कंपनी (Danish company) भारत में आने वाली पहली यूरोपियन कंपनी थी, लेकिन ब्रिटेन की ईस्ट इंडिया कंपनी (East India Company) के आने से डच कंपनी को बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ा. आज ही के रोज डच कंपनी ने भारत के दो इलाके ईस्ट इंडिया को बेचे थे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 22, 2021, 6:50 AM IST
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देश में ईस्ट इंडिया कंपनी के आने और उसके बाद की कहानी बहुतों को पता है लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस ब्रिटिश कंपनी से पहले भी कई देश भारत में सेंध लगा चुके थे. इनमें सबसे पहली थी नीदरलैंड्स की कंपनी. इसका नाम था यूनाइटेड ईस्ट इंडिया कंपनी, जो भारत पहुंचने वाली सबसे पहली यूरोपियन कंपनी थी. आज ही के दिन साल 1845 में इस डच कंपनी ने अपना साम्राज्य ईस्ट इंडिया कंपनी को देना शुरू किया था.

इसी शुरुआत हुई बालासोर और सेरामपोर को ईस्ट इंडिया कंपनी को बेचने से. जी हां, देश के ये दो हिस्से डच ईस्ट इंडिया कंपनी ने 22 फरवरी को ब्रितानिया हुकूमत को बेच दिए थे. इन दो शहरों के बारे में जानने से पहले एक बार डच कंपनी के बारे में जान लेते हैं. नीदरलैंड की ये व्यापारिक कंपनी सोलहवीं सदी में व्यापार के लिए भारत पहुंची. वे यहां मसाले के व्यापार में सेंध लगाना चाहते थे.

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जल्द ही डच लोगों ने पुर्तगालियों से मसाला व्यापार छीन लिया और भारत के मसाला उद्योग के बादशाह बन गए. साल 1639 में वे गोवा पर कब्जा कर चुके थे. इसके अलावा गुजरात के कोरोमंडल बंदरगाह, बंगाल और बिहार से लेकर उड़ीसा के सभी समुद्री तटों पर डच लोगों का कब्जा हो चुका था.
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डच लोगों ने पुर्तगालियों से मसाला व्यापार छीन लिया और भारत के मसाला उद्योग के बादशाह बन गए


वे आमतौर पर मसालों, नीम, कच्चे रेशम, शीशा, चावल व अफीम का व्यापार भारत से किया करते थे. इस दौरान ही ईस्ट इंडिया कंपनी भारत पहुंची. वे भी पहले व्यापारियों के तौर पर पहुंचे थे. तब भारत काफी धनी देश था और तमाम दुनिया के ताकतवर देश इसे हथियाना चाहते थे. भारत पहुंचने पर कंपनी ने पाया कि देश में कई विदेशी ताकतें पहले से मौजूद थीं और भारत के राजा-महाराजा भी ताकतवर थे.

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इनसे लड़ाई के जरिए पार नहीं पाया जा सकता था. ये देखते हुए ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यापार की इजाजत मांगी. साथ में वो राजाओं को तोड़ने का काम भी करने लगी. इसके लिए वो उन्हें बहुमूल्य उपहार आदि दिया करती थी. बड़ी मुश्किल से कंपनी को भारत में व्यापार की इजाजत मिल सकी. वे यहां से नील, पोटैशियम नाइट्रेट और चाय खरीदकर विदेशों में भारी कीमत पर बेचते. इस तरह से कंपनी का रुतबा बढ़ता ही चला गया.

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तब बंदरगाह व्यापार का सबसे मजबूत जरिया हुआ करते थे- सांकेतिक फोटो (pxhere)


इस तरह से ताकत बढ़ाते हुए ब्रिटिश कंपनी ने डच कंपनी को हरा दिया. साल 1759 में वेदरा के युद्ध में नीदरलैंड्स की इस कंपनी की हार के बाद उसने भारत से अपना बोरिया-बिस्तर समेटना शुरू कर दिया. इसी दौर में कंपनी ने ईस्ट इंडिया कंपनी को उड़ीसा का बालासोर बेहद कम कीमत पर बेच दिया. ये ब्रिटिश हुकूमत का दबाव था और बेचने-खरीदने की रस्म महज रस्म ही थी. इससे अंग्रेजों को बंदरगाह के साथ-साथ उड़ीसा की राजधानी के पास ही एक प्रशासनिक कार्यालय मिल गया.

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इसके अलावा पश्चिम बंगाल में स्थित सेरामपोर को भी ईस्ट इंडिया कंपनी को बेच दिया गया. वैसे सेरामपोर को श्रीरामपुर भी कहते हैं. हुगली जिले का ये शहर कोलकाता महानगर का ही हिस्सा है. हुगली नदी भी तब इंटरनेशनल और राष्ट्रीय व्यापारिक केंद्रों को जोड़ने का बड़ा जरिया हुआ करती थी. साल 1755 से 1845 की फरवरी तक ये डेनिश भारत का हिस्सा था, जिसे 22 फरवरी को ईस्ट इंडिया कंपनी ने हथिया लिया. हालांकि अब भी सेरामपोर में डेनिश विरासत बेहद खूबसूरती से संजोई हुई है, जिसे देखने काफी सैलानी आते रहते हैं.
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