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Tokyo Olympics: क्या ट्रांस एथलीटों को मिलता है खेलों में फायदा

यह पहली बार हो रहा है कि कोई ट्रांस महिला (Trans Women) खुले तौर ओलंपिक में भाग ले रही है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

यह पहली बार हो रहा है कि कोई ट्रांस महिला (Trans Women) खुले तौर ओलंपिक में भाग ले रही है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

Tokyo Olympics: इस साल ट्रांस एथलोटों (Trans Athlete) को विशिष्ठ खेलों (Elite sports) में खुले तौर पर भाग लेने से सवाल उठा है कि क्या उन्हें बड़े खेलों में फायदा होता है.

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    इस साल टोक्यो ओलंपिक (Tokyo Olympics) पर कोविड-19 का साया है.  इस महामारी के कारण एक साल बाद हो रहे इन खेलों में दर्शकों को तो प्रवेश मिल ही नहीं रहा है, लेकिन खिलाड़ियों को भी एक अलग ही महौल में रखा जा रहा है. अब इन खेलों के साथ एक और विवाद सामने आया है. वह है ट्रांस जेंडर (Transgender) खिलाड़ियों के भाग लेने का. यह विवाद टोक्यो ओलंपिक में इस बार कुछ खिलाड़ियों के भाग लेने  पर है. कई लोगों का कहना है कि इससे खेल की पारदर्शिता को खतरा है तो कई मानते हैं कि अगर ट्रांस एथलीटों (Trans athlete) को कोई फायदा नहीं होता है तो इनके भाग लेने को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए.

    यह मामला सबसे पहले न्यूजीलैंड को वेटलिफ्टर लॉरेल हब्बार्ड के भाग लेने पर हुआ जो एक ट्रांस एथलीट के तौर पर भाग ले रही हैं. यह पहली बार है जब किसी भी ट्रांस एथलीट के खुले तौर पर भाग लिया है. विशिष्ठ खेलों यानि उच्च परदर्शन वाले खेलों में ट्रांस खिलाड़ों के भाग लेने पर कई अध्ययन किए गए हैं. लेकिन ट्रांस एथलीटों के विशिष्ठ खेलों म भाग लेने पर कोई अध्ययन प्रकाशित नहीं किया गया है.

    अमेरिकी सेना पर हुआ था इस विषय पर अध्ययन
    ओलंपिक खेलों से पहले कुछ लेख जरूर इस विषय पर प्रकाशित हुए हैं. अमेरिकी सेना में कुछ लोगों के सर्विस में होने के दौरान हुए बदलाव पर एक अध्ययन हुआ था जिस पर लेख में बताया गया है कि ट्रांस महिलाएं फेमिनाइजिंग हार्मोन थेरेपी के एक साल बाद भी अपने न्यूनतम कार्यनिष्पादनता को कायम रख सकीं थी. इस थेरेपी में टेस्टेस्टोरोन लेवल कम किया जाता है और एस्ट्रोजन को बढ़ाया जाता है.

    यह अंतर पाया गया था
    इस शोध में डीडब्ल्यू की रिपोर्ट के मुताबिक उस अध्ययन में पाया गया है कि एक साल तक हारमोन थेरेपी से गुजरने वाली ट्रांस महिलाएं लगातार अन्य महिलाओं से बहतर प्रदर्शन करती रहीं. इन महिलाओं यानी आम महिलाओं को सिसजेंडर (Cisgender) महिला कहा जाता है. लेकिन यह अंतर दो साल बाद काफी कम हो गया फिर ट्रांस महिलाएं बाद में भी 12 प्रतिशत तेजी से भागती पाई गईं.

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    ट्रांस महिलाओं को (Trans Women) को फिलहाल ताकत के लिहाज से फायदे मिलते दिखते हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


    क्या काफी है अंतर
    शोधकर्ताओं का सुझाव है कि शीर्ष दस प्रतिश महिलाओं में आने के लिए एक महिला धावक को औसत महिला धावक से 29 प्रतिशत ज्यादा तेज भागना होता है. और विशिष्ठ धावक होने के लिए उसे औसत से 59 प्रतिशत ज्यादा तेज भागना होता है. स्पोर्ट्स साइंटिस्ट टोमी लुंडबर्ग ने एक अन्य अध्ययन में पाया है कि फेमेनाइजिंग थेरेपी से गुजरने वाली ट्रांस महिलाएं अपना सामर्थ्य स्तर एक साल के बाद भी कायम रखती पाई गई थीं.

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    क्या हो सकता है फायदा
    अब सवाल यही उठता है कि क्या इसका फायदा ट्रांस महिलाओं को खेलों में मिलता है. अनुभवों के आधार पर माना गया है कि बिना हार्मोन थेरेपी के तो फायदा मिलता है, लेकिन हारमोन थेरेपी के बाद भी कई ट्रांस महिलाएँ आपना सामर्थ्य कायम रख पाती हैं. ब्रिटेन का लोगबोरो यूनिवर्सिटी का चिकित्सीय भौतिकविद जुआना हार्पर का कहना है कि कैसे भी देख लें, ट्रांस महिलाओं को ताकत के मामले में हारमोन थेरेपी के बाद भी फायदा तो मिलता ही है.

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    ताकत वाले में खेलों में माना जाता है कि ट्रांस महिला (Trans woman) को फायदा हो सकता है (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


    लेकिन यह निर्णायक नहीं
    एक एथलीट के बेहतर होने के लिए ताकत या सामर्त्य के अलावा, कम शरीर-भार, सहन शक्ति या स्थायित्व, और जोश जैसे कारकों की भी जरूरत होती है. इसके अलावा कई और भी कारक होते हैं जिनकी भूमिका है. जिनमें से एक हीमोग्लोबिन स्तर अहम है. देखा गया है कि टेस्टोस्टेरोन दबाने वाली दवा आदि ट्रांस महिलाओं में सिसजेंडर महिलाओं की तुलना में हीमोग्लोबिन स्तर कम कर देते हैं.

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    एक तरफ हारमोन थेरेपी खेलों में पारदर्शिता लाने के लिए काफी नहीं मानी जा सकती है. क्योंकि मांसपेशियों की बढ़ी ताकत का लाभ थेरेपी के बाद भी कम नहीं होता है. आमतौर पर सिस महिलाओं या आम मिहलाओं का टेस्टोस्टेरोन का स्तर 0,3  और 2 नौनो मोल प्रति लीटर होना जाहिए. यह अलग लैब के लिए अलग हो जाता है. वहीं पुरुषों में यह स्तर 9.3 से 32.2 नौनोमोल प्रतिलीटर होता है. आईओसी के मुताबिक  एक ट्रांस महिला भाग ले सकती है अगर टेस्टोस्टेरोन स्तर 10 नौनेमोल्स प्रतिलीटर एक साल तक हो वह भी भाग लेने से एक साल पहले तक. अब बदलाव की वकालत तो हो रही है. लेकिन जरूरत आंकड़ों की ज्यादा है जो फिलहाल बहुत कम हैं.

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