कौन है वो शाही परिवार, जो बना देश के सबसे दौलतमंद मंदिर का रखवाला

कौन है वो शाही परिवार, जो बना देश के सबसे दौलतमंद मंदिर का रखवाला
राजाओं के वंशज राम वर्मा को अब भी महाराज ऑफ त्रावणकोर कहा जाता है

आजादी के बाद देश के कई राजपरिवारों ने अपने महलों को होटल या फिर म्यूजियम में बदल दिया, वहीं त्रावणकोर के शाही परिवार ने (travancore royal family) इसे संभालकर रखा हुआ है. कोडिआर पैलेस (Kowdiar Palace) नामक इनके महल में डेढ़ सौ कमरे हैं.

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देश के सबसे रईस मंदिरों में शुमार श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर (Sree Padmanabhaswamy Temple) के खजाने की देखरेख का अधिकार सुप्रीम कोर्ट ने केरल के त्रावणकोर शाही परिवार को दे दिया. सोमवार को आए इस बड़े फैसले से त्रावणकोर शाही खानदान काफी चर्चा में है. जानिए, कौन है वो शाही परिवार जो दो लाख करोड़ के आसपास की प्रॉपर्टी वाले इस मंदिर को संभालने जा रहा है?

जैसा कि नाम से समझ आता है, त्रावणकोर राजवंश त्रावणकोर राज्य को चलाता था. ये पहले एक काफी समृद्ध रियासत थी, जिसे पहले पद्मनाभपुरम और फिर तिरुवनन्तपुरम से संभाला जाता रहा. एक वक्त पर रियासत का विस्तार आधुनिक केरल के कई हिस्सों के अलावा तमिलनाडु के कन्याकुमारी तक था. इनका एक अलग झंडा भी था, जिसमें लाल रंग के बैकग्राउंड पर चांदी की तरह चमकने वाले शंख बना हुआ था. बाद में ब्रिटिश राज के दौरान भी रियायत में काफी समृद्धि रही और यहां के राजा जनकल्याण के काम करवाते रहे. साल 1949 में आजाद भारत के तहत रिसायत देश से मिल गई और साल 1971 में शाही परिवार को मिलने वाले पर्क्स भी बंद हो गए. हालांकि तब भी शाही परिवार के पास काफी संपत्ति है, जो कोर्ट के हालिया फैसले के बाद से और भी ज्यादा हो चुकी है.

त्रावणकोर राज परिवार को केरल के श्री स्वामीपद्मनाभ मंदिर के प्रबंधन का अधिकार मिल चुका है




त्रावणकोर राजपरिवार के बारे में कई किवदंतियां हैं. जैसे कहा जाता है कि वे मध्यप्रदेश की नर्मदा नदी के पास से केरल आए थे और यहीं के होकर रह गए. एक और कहानी के मुताबिक शिव के अवतार परशुराम ने खुद इस परिवार को त्रावणकोर का राज सौंपा था. हालांकि ये नहीं पता कि परशुराम माइथोलॉजी का कोई चरित्र हैं या सच्चाई. ये भी कहा जाता है कि चेर परिवार ने अपने एक हिस्से को केरल भेज दिया था ताकि वे यहां राज करें. इसके बाद रिसायतों की लड़ाइयों और उतार-चढ़ाव के दौरान कई राजा हुए. त्रावणकोर के आखिरी राजा चितिरा तिरुनल बलराम वर्मा थे. इन्होंने सबसे लंबे वक्त तक रियासत पर राज किया. इन्हीं के वक्त में रियासत को देश से मिलाया गया. शादी न करने की वजह से उनके बाद रियासत की बागडोर इनके भाई के पुत्र मूलम तिरुनल राम वर्मा को मिली.
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फिलहाल यही पुत्र राजपरिवार के मुखिया हैं. इन्हें अब भी महाराज ऑफ त्रावणकोर कहा जाता है. राम वर्मा की पढ़ाई और काम की शुरुआत भी लंदन में हुई. साल 1972 में वे वापस लौटे और केरल के बेहतरीन मसालों की एक निजी कंपनी Aspinwall Ltd नाम से मैंगलोर में शुरु कर दी. इनकी दो शादियां हैं. पहली पत्नी से तलाक के बाद दूसरी शादी लंदन की ही एक रेडियोलॉजिस्ट से की, जो शादी के बाद मैंगलोर आ गईं. वेबसाइट Royalark.net के मुताबिक दोनों ही शादियों से राम वर्मा की कोई संतान नहीं है.

अवस्थी तिरुनल राम वर्मा कर्नाटक संगीत के जानकार और महिलाओं के हक में काम करने वाले माने जाते हैं


इसी राज परिवार के एक सदस्य शास्त्रीय संगीत का जाना-माना नाम हैं. अवस्थी तिरुनल राम वर्मा कर्नाटक संगीत के जानकार हैं, साथ ही उन्हें वीणा बजाने में भी महारत है. वे लगातार देश-विदेश में प्रोग्राम देते रहते हैं. हर साल नवरात्रि में ये त्रावणकोर में नवरात्रि मंडपम का आयोजन करते हैं. साल 2006 में इसमें पहली बार एक महिला वीणा वादक को राम वर्मा ने मंच पर आमंत्रित किया. इससे बड़े तबके ने इनकी आलोचना की तो बहुतों ने सराहना भी की. बता दें कि त्रावणकोर में लगभग 300 सालों से इस वीणा उत्सव का आयोजन होता आया है लेकिन इसमें महिलाओं को स्टेज पर नहीं बुलाया जाता था.

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वैसे राजशाही खत्म होने के बाद भी त्रावणकोर के इस परिवार का खासा रुतबा है. राजमहल को लोग कोडिआर पैलेस के नाम से जानते हैं. रिसायत खत्म होने के बाद एक तरफ देश के कई राजपरिवारों ने अपने महलों को होटल में बदल लिया या फिर म्यूजियम के लिए दे दिया, वहीं त्रावणकोर के शाही परिवार ने इसे संभालकर रखा हुआ है. यहां अब भी शाही परिवार के सदस्य रहते हैं. 150 कमरों वाले इस महल को उसकी महीन वास्तुकला के लिए जाना जाता है लेकिन यहां प्रवेश तभी मिल सकता है, जब राजपरिवार से आपको कोई आमंत्रण हो. पहले राजाओं और रानियों के अलग-अलग महल थे, जिनके बड़े ही अलग तरह के नाम हुआ करते थे जैसे कि रंगाविलासम पैलेस, कुतिरमालिका पैलेस और तुलसी हिल पैलेस.

इसके राजमहल को लोग कोडिआर पैलेस के नाम से जानते हैं


वैसे तो कई शाखाओं में बंटे इस राज परिवार के बहुत से युवा सदस्य विदेशों में रहने लगे हैं, वहीं कोडिआर पैलेस में अब कई सदस्य रहते हैं. बताया जाता है कि वे शाही परिवार होने के बाद भी केरल की संस्कृति से जुड़े हुए हैं. खाने के दौरान परिवार के लोग जमीन पर चटाई बिछाकर बैठते हैं और केले के पत्तों पर भोजन परोसा जाता है.

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साल 1971 के संवैधानिक संशोधन के बाद, शाही परिवार की संपत्तियों का बंटवारा हुआ. लेकिन अब भी परिवार के भीतर इसे लेकर काफी सारे विवाद और मुकदमे चलते रहे. अब दोबारा से त्रावणकोर राज परिवार का नाम चर्चा में तब आया, जब उसने केरल के श्री स्वामीपद्मनाभ मंदिर के प्रबंधन के लिए दावा किया. बता दें कि इससे पहले केरल हाई कोर्ट ने मंदिर के प्रबंधन और खजाने की देखरेख का जिम्मा स्टेट को दे दिया था. इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. इसपर सोमवार की सुबह ही फैसला आया है कि अब मंदिर का सारा कामकाज त्रावणकोर राजपरिवार ही देखेगा. इतिहासकारों के अनुसार इस परिवार का मंदिर से जुड़ाव काफी पुराना है. साल 1750 में हुए एक भव्य समारोह में त्रावणकोर के राजा ने अपना राज्य भगवान पद्मनाभ स्वामी को समर्पित कर दिया, जिसके बाद पद्मनाभ स्वामी के दास के रूप में त्रावणकोर का शासक किया. इसके बाद से त्रावणकोर के शासक भगवान पद्मनाभ स्वामी के दास (पद्मनाभदासों) कहलाए.
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