तुर्की और सऊदी अरब के बीच तनाव का मतलब खाड़ी देशों के लिए क्या है?

तुर्की  के राष्ट्रपति  रेचेप तैय्यप एर्दोआन- फोटो (pikist)
तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोआन- फोटो (pikist)

सऊदी अरब और तुर्की दोनों में नेतृत्व की लड़ाई (Turkey and Saudi Arabia tension towards leadership) चल रही है. दोनों देशों के बीच शीतयुद्ध का असर दूसरे अरब देशों पर पड़ रहा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 18, 2020, 1:44 PM IST
  • Share this:
तुर्की और सऊदी अरब दोनों के बीच ही फिलहाल इस्लामिक देशों का खलीफा बनने की जंग चल रही है. तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोआन (Recep Tayyip Erdoğan, President of Turkey) लगातार इस मोर्चे पर तेजी से आगे जा रहे हैं. ये देखते हुए सऊदी ने अपने नागरिकों से तुर्की में बने सामानों का बहिष्कार करने की अपील कर डाली. वैसे दोनों ताकतवर देशों के आमने-सामने आने से कई खाड़ी में कई चीजें बदल सकती हैं. समझिए, क्या है दोनों मुल्कों की दुश्मनी के मायने.

इसके लिए सबसे पहले ये समझना होगा कि आखिर क्यों दोनों देशों में ठनी हुई है. इतिहास में जाएं तो दिखता है कि दुश्मनी आज की नहीं, बल्कि18वीं सदी से चली आ रही है. साल 1818 में सऊदी किंग अब्दुल्लाह बिन सऊद का सिर तुर्की के इस्तांबुल में काट दिया गया था. किंग के सिर को लोगों के देखने के लिए रखा गया और तुर्क जनता उसे देखने के बाद पटाखे चलाते हुए खुशियां मनाती रही.

हगिया सोफिया म्यूजियम का मस्जिद में बदलना बड़ा कदम माना जा रहा है- सांकेतिक फोटो (Pixabay)




बता दें कि तब तुर्की काफी ताकतवर था और उसे ऑटोमन साम्राज्य के नाम से जाना जाता था. वो खुद को इस्लामिक दुनिया में सबसे बड़ा मानता था और सऊदी में मक्का-मदीना होने के बाद भी उस देश को नीची नजर से देखता था. पहले विश्व युद्ध के बाद ऑटोमन साम्राज्य खत्म हो गया और उसी से आधुनिक तुर्की बना.
इसके बाद से तुर्की सऊदी की अपेक्षा कमजोर पड़ गया था. खासकर सऊदी को अमेरिका का साथ मिला था, इससे उसकी स्थिति खाड़ी देशों में काफी मजबूत हो गई थी. अब राष्ट्रपति एर्दोआन वापस से तुर्की को सबसे ताकतवर इस्लामिक देश बनाने में जुटे हैं. वे समय-समय पर ऐसे बयान देते हैं, जिससे वे खुद को दुनियाभर के मुसलमानों की आवाज बता सकें.

हगिया सोफिया म्यूजियम का मस्जिद में बदलना ऐसा ही एक कदम माना जा रहा है. बता दें कि ये म्यूजियम पहले चर्च था, जिसे बाद में मस्जिद और फिर संग्रहालय में बदला गया. अब इसे वापस मस्जिद बनाया जा चुका है. ये तुर्की के नेता का आक्रामक रवैया है. साथ ही वो अमेरिका का साथ देने के लिए सऊदी अरब को बुरा-भला कह रहा है. इसके बाद से दोनों देश कई मोर्चों पर आमने-सामने आ गए हैं. इसका असर दोनों देशों के साथी मुल्कों पर भी दिख रहा है.

लीबिया के मोर्चे पर भी तुर्की और सऊदी आमने-सामने हैं- सांकेतिक फोटो (CNBC)


सबसे पहले साल 2009 में अरब स्प्रिंग की शुरुआत पर तुर्की ने इस्लामिक देशों को साथ आने की अपील की. वहीं सऊदी अरब धर्म के नाम पर बंटवारे के विरोध में था. इससे दोनों के बीच तनाव बढ़ा. नतीजा ये हुआ कि वे अपनी विचारधारा के आधार पर देशों से दोस्ती-दुश्मनी करने लगे. मिसाल के तौर पर सऊदी ने कतर से सारे नाते तोड़ दिए क्योंकि वो तुर्की के साथ था.

लीबिया के मोर्चे पर भी तुर्की और सऊदी आमने-सामने हैं. लीबिया में जारी संकट में तुर्की संयुक्त राष्ट्र की मान्यता वाली सरकार का समर्थन करता है जबकि सऊदी और यूईए इस सरकार के खिलाफ लड़ रहे पूर्वी कमांडर खलीफा हफ्तार का समर्थन करते हैं. लीबिया के तीन चौथाई हिस्से पर हफ्तार का ही नियंत्रण है. इसको लेकर दोनों ही देश एक दूसरे पर आरोप लगाते रहते हैं.

जेरुशलम को इजरायल की राजधानी मानने या न मानने पर तनाव है- सांकेतिक फोटो (Pixabay)


इसी तरह से इजरायल भी दोनों देशों के बीच तनाव की बड़ी वजह है. जेरुशलम को इजरायल की राजधानी मानने या न मानने पर तनाव है. अमेरिका जेरुशलम को पहले ही इजरायल की राजधानी के तौर पर मान्यता दे चुका था. जिसके बाद से सऊदी भी इसके साथ आ गया.

माना जा रहा है कि सऊदी और तुर्की की आपसी लड़ाई से खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था भी कमजोर होगी. जो देश तुर्की के झंडे के नीचे जाना चाहेगा, वो सऊदी से खुद-बखुद अलग हो जाएगा. इससे सऊदी, तुर्की और खुद उस देश का व्यापार प्रभावित होगा. इसी तरह से सऊदी गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) में अरब देशों को इकट्ठा करने की कोशिश में है लेकिन तुर्की इससे देशों को तोड़ने की फिराक में है. तो इन दोनों देशों की दुश्मनी से हो सकता है कि अगर किसी देश को फायदा हो तो वो ईरान को हो. हालांकि शिया मुस्लिम देशों की कमी के कारण उसे भी अरब दुनिया की लीडरशिप हाथ नहीं लगेगी.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज