तुर्की की डील पर भड़का अमेरिका, क्या NATO के बीच ही छिड़ जाएगी जंग?

तुर्की की डील पर भड़का अमेरिका, क्या NATO के बीच ही छिड़ जाएगी जंग?
तुर्की ने भी एक हथियारों की बड़ी डील के बाद रूस से एक और डील की बात की (Photo-cnbc)

नाटो का सदस्य होने के बाद भी तुर्की हथियारों की खरीद-फरोख्त में रूस की मदद (NATO member Turkey arms deal with Russia) ले रहा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 1, 2020, 7:55 AM IST
  • Share this:
कोरोना महामारी के बीच लगभग सारे ही देश खुद को सैन्य मोर्चे पर मजबूत करने में जुट गए हैं. हाल ही में तुर्की ने भी एक हथियारों की बड़ी डील के बाद रूस से एक और डील की बात की. असल में अमेरिका की लगातार आपत्ति के बाद भी तुर्की ने रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम खरीदने का फैसला किया. इसकी आपूर्ति के बाद अब वो सुखोई Su-57 लड़ाकू विमानों की खरीदी भी करना चाहता है. माना जा रहा है कि तुर्की का ये कदम एक तरह से नाटो संधि के लिए खतरा बन सकता है. खासकर अगर अमेरिका अपने हाथ खींच ले. जानिए क्या है नाटो संधि और तुर्की की डील से इसका क्या संबंध है.

क्या है नाटो के मायने
नाटो या उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन को साल 1949 में अमेरिका में बनाया गया था. फिलहाल इसका हेड ऑफिस बेल्जियम में है. ये संगठन अमेरिका और यूरोप के बीच एक तरह का सैन्य करार है, जो सामूहिक रक्षा के सिद्धांत पर काम करता है. यानी इसके सदस्य देशों में एक या अधिक पर बाहरी या गैर-सदस्य देश हमला करें तो इसे पूरे समूह पर हमला माना जाता है और उसी तरह से जवाब दिया जाता है.

तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन इससे आगे भी कई रक्षा सौदे इनिशिएट कर रहे हैं- सांकेतिक फोटो (Photo-cnbc)

12 सदस्यों से हुई शुरुआत के बाद अब नाटो में 29 देश शामिल हो चुके हैं. भारत इनमें से एक तो नहीं है लेकिन उसे भी इसके सहयोगी देश का दर्जा मिलने की बात लगातार हो रही है. यहां तक कि भारत को ये दर्जा मिले, इसके लिए अमेरिकी सीनेट ने हथियार निर्यात नियंत्रण अधिनियम में बदलाव की भी बात की. इससे भारत भी अमेरिका का मुख्य रक्षा साझेदार बन सकेगा.



ये भी पढ़ें: South China Sea Dispute: समुद्र को हथियाने की चीनी चाल, ऐसे बना रहा है नकली द्वीप  

नाटो के सदस्य देशों में तुर्की भी एक है
डील के तहत सदस्य देश खुद को अलग से हथियार-संपन्न एक क्षमता तक ही कर सकते हैं. इसकी वजह ये है कि अगर किसी भी सदस्य पर खतरा हो तो सारे देश मिलकर मुकाबला करेंगे. ऐसे में किसी एक देश को सामरिक मोर्चे पर बड़ी तैयारी की जरूरत नहीं मानी जा रही. बल्कि इसका सीधा मतलब ये भी लगाया जा सकता है कि वो देश या तो नाटो की सदस्यता नहीं चाहता या फिर वो खुद किसी लड़ाई को उकसाना चाहता है. यही वजह है कि तुर्की की पिछली डील पर भी नाटो के कई सदस्यों ने आवाज उठाई, अमेरिका जिनमें से एक था.

तुर्की की रूस से डील नाटो संगठन के खात्मे की ओर जा सकती है- सांकेतिक फोटो (Photo-cnbc)


रूस से कर रहा सौदा
तुर्की ने लेकिन न केवल एस-400 मिसाइल सिस्टम खरीदे, बल्कि अब तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन इससे आगे भी कई रक्षा सौदे इनिशिएट कर रहे हैं. इन्हीं में से एक है सुखोई के लिए सौदा. यूरेशियन टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक तुर्की Su-57 लड़ाकू विमानों की खरीदी में भारी दिलचस्पी दिखा रहा है. पिछले साल ही राष्ट्रपति एर्दोआन ने इसके संकेत दे दिए थे.

ये भी पढ़ें: दोस्त इजरायल भारत को देगा अत्याधुनिक तकनीक, चीन को किया इनकार      

अमेरिका का ऑफर ठुकराकर किया सौदा
तुर्की की खरीदी में सबसे दिलचस्प बात ये है कि उसने ये डील अमेरिका के F-35 लड़ाकू विमानों की खरीदी के लिए इनकार करते हुए की. कुल मिलाकर मामला यही है कि नाटो का सदस्य देश होने के बाद भी दुश्मन की तरह देखे जाने वाले राष्ट्र रूस से तुर्की हथियार खरीद रहा है. अमेरिका को इसी बात पर आपत्ति है कि जिस रूस का कथित विस्तारवाद रोकने के लिए नाटो का गठन हुआ था, उसी का मेंबर रूस से जुड़ा हुआ है.

हालांकि अमेरिका इसका दूसरा पक्ष भी दे रहा है. उसके मुताबिक एस-400 मिसाइल सिस्टम उतना दमदार नहीं है. ऐसे में अगर नाटो का सदस्य देश घटिया सैन्य साजो-सामान रखेगा तो किसी हमले या चुनौती के मुकाबले के लिए वो फिट नहीं हो पाएगा.

अमेरिका के मुताबिक एस-400 मिसाइल सिस्टम उतना दमदार नहीं है


फ्रांस से राफेल लेने में आड़े आ रहा तनाव 
दूसरी तरफ तुर्की खुद को लगातार अपनी तरह से मजबूत करना चाह रहा है. विशेषज्ञों का अनुमान है कि वो फ्रांस से राफेल लेकर खुद को ज्यादा मजबूत मान पाता लेकिन फ्रांस और तुर्की में काफी तनाव रहता है. ऐसे में न तो फ्रांस तुर्की को राफेल देना चाहेगा और न ही तुर्की फ्रांस से इसकी बात कर सकेगा. यही देखते हुए वो रूस से ही डील के लिए चला गया.

ये भी पढ़ें: यूरोप का वो मुल्क, जहां इंटरनेट फ्री होने के बाद भी नहीं है साइबर क्राइम   

तुर्की की रूस से डील नाटो संगठन के खात्मे की ओर जा सकती है. वैसे इसका संकेत पहले फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों भी दे चुके हैं. साल 2019 में ही उन्होंने कहा था कि नाटो एक तरह से brain death की तरफ जा रहा है. इसपर काफी बवाल भी हुआ था. इसके बाद भी मैक्रों ने अपने शब्द वापस नहीं लिए, बल्कि चेताते हुए कहा कि नाटो को बनाए रखने के लिए ये एक तरह का 'वेक-अप कॉल' है.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज