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यही है मेरी कॉम की जिंदगी का टर्निंग पॉइंट, जिसने बदल दिया सबकुछ

यही है मेरी कॉम की जिंदगी का टर्निंग पॉइंट, जिसने बदल दिया सबकुछ

चैंपियन महिला बॉक्सर की कहानी..जहां से उठकर वो यहां तक पहुंचीं, वो तो कोई सोच ही नहीं सकता

    मेरी कॉम ने गोल्ड कोस्ट कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतकर साबित कर दिया कि वो वाकई सुपर वूमन हैं. सुपर मॉम, सुपर बॉक्सर और सुपर आयकन. अब तक उनके खाते में कॉमनवेल्थ गेम्स का गोल्ड मेडल ही नहीं था..अन्यथा खेलों के हर बड़े प्लेटफॉर्म पर वह मेडल जीत चुकी हैं. वो कई भूमिकाएं एक साथ संभालती हैं. सुबह प्रैक्टिस करती हैं, राज्यसभा की कार्यवाही में हिस्सा लेती हैं..तीन बेटों की देखभाल करती हैं..महिलाओं के अधिकारों के लिए भी लड़ती नजर आती हैं. सुपर मेरी कॉम ने जिंदगी में लंबा सफर तय किया है. उनकी जिंदगी और सफलता की कहानी को हम कई कड़ियों में शुरू कर रहे हैं. उसकी पहली कड़ी-

    कहानी शुरू करने से पहले कुछ बातें

    छोटे कद की मेरी कॉम देखने में बेशक आम उत्तर पूर्वी भारतीयों की लगती हों लेकिन हैं असाधारण. एक मजदूर परिवार में जन्म लेने के बाद शिखर तक सफर आसान नहीं होता. उनका सफर तो बहुत मुश्किल था. जबरदस्त इच्छाशक्ति से श्रेष्ठता का झंडा गाड़ा. वह एक ऐसे खेल में आईं,जिसमें कोई भविष्य नहीं था, जोखिम बेहिसाब.

    घरवालों ने मना किया, खेल राजनीति ने रास्ता रोका, गरीबी और अभावों ने मुश्किलों में डाला-लेकिन क्या मजाल कि ये मुश्किलें इस लौह महिला को झुका पाएं. पांच बार की विश्व चैंपियन, ओलंपिक और एशियाई खेलों की पदक विजेता...और कामनवेल्थ चैंपियन. 

    बहुत मुश्किल था बचपन
    मेरी कॉम का जन्म 24 नवंबर 1982 को मणिपुर के चुरचांदपुर जिले के सगांग गांव में हुआ. वह कॉम आदिवासी जनजाति से ताल्लुक रखती हैं. ये उनका पैतृक गांव है. उनके जन्म के पांच महीने बाद ही पिता ने गांव छोड़ दिया. फिर यहां नहीं लौटे. पिता के तीन भाई थे. छोटी सी जमीन. गरीबी बहुत ज्यादा थी. लिहाजा जीवनयापन के लिए भाइयों के बीच कलह का वातावरण बना रहता था. एक दिन आजिज आकर उनके पिता मंगते तोंपा कॉम ने पैतृक गांव छोड़ ही दिया. फिर कभी वहां नहीं लौटे.

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    मणिपुर के मोइरंग कस्बे का गांव ( साभारःविकीकॉमंस)


    चुंगनेईजंग..यानि ऊंचा, समृद्ध और फुर्तीला
    मंगते तोंपा पढ़े लिखे नहीं थे, मजदूरी कर पेट पालना पड़ता था. जब मेरी का जन्म हुआ तो मां उदास हुईं, क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि बेटा पैदा होगा. बेटी का मतलब था और बोझ. बेटा होता तो वो पिता के साथ खेतों के काम में हाथ बंटाता. मेरी का नाम उनकी नानी ने रखा, ये था चुंगनेईजंग, चुंग यानि ऊंचा, नेई यानि समृद्ध और जंग यानि फुर्तीला. मेरी बिल्कुल अपने नाम की तरह ही निकलीं.

    खेतों में पिता के साथ काम 
    जब मेरी के जन्म के बाद पिता ने गांव छोड़ा तो उन्हें नहीं मालूम था कि अब क्या होगा. वो कांगथेई नाम के गांव में पहुंचे. वहां के मुखिया से जान-पहचान थी. उसने उन्हें छोटी सी जमीन दी, जिस पर उन्होंने और मेरी की मां ने मिलकर मिट्टी की एक झोंपड़ी बनाई. पिता दिनभर की कड़ी मेहनत के बाद भी बमुश्किल परिवार के लिए एक दिन के खाने लायक चावल खरीद पाते थे. मेरी कुछ बड़ी हुई तो पिता के साथ खेतों में हाथ बंटाने लगी. जीवन बहुत मुश्किल था. अभाव बहुत ज्यादा.

    फीस नहीं भरने पर बाहर खड़ा कर दिया जाता था
    पिता ने गांव से ढाई किलोमीटर दूर मोइरंग कस्बे के एक स्कूल में अपनी जमापूंजी का एक बड़ा हिस्सा खर्च करके मेरी का एडमिशन कराया. ये कस्बे के सबसे अच्छे स्कूलों में था. इसी स्कूल में उनके दो भाई-बहन और पढ़ते थे. अक्सर ऐसा होता था कि वो लोग जब फीस नहीं जमा कर पाते थे तो उन्हें क्लास से बाहर खड़ा कर दिया जाता था, ये उनके लिए सबसे ज्यादा शर्मिंदगी के क्षण होते थे, जिसका सामना वो कभी नहीं करना चाहते थे. फिर माता-पिता किसी तरह पैसे का इंतजाम करते.

    दोस्त खेलते थे और वो देखती थीं..
    मेरी ने अपनी आत्मकथा अनब्रेकेबल में लिखा है, गांव में शायद सभी बच्चे उतनी मेहनत नहीं करते थे,जितनी हम लोग. हमारे ज्यादातर दोस्त खाते, खेलते और पढते. मैं खेतों में पिता के साथ काम में मदद करती रहती थी. अपने साथियों को दुूर से खेलते हुए देखती थी. अक्सर मुझे बैलों को लेकर बुआई का काम करना पड़ता. ये बहुत मुश्किल होता था क्योंकि बैलों को नियंत्रित करते हुए चलाना होता था. साथ साथ बुआई करनी होती थी.
    पैड़ी लगाने के समय चावल के खेतों में पानी भरा होता था और उनमें जोंक के साथ सांप भी होते थे. खेतों में काम करने के साथ वो गायों को चरातीं, दूध दूहतीं. कभी मायूस भी होतीं कि वह बच्चों के साथ खेल क्यों नहीं पा रहीं, लेकिन अक्सर समय निकालकर खेल भी आतीं.

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    बचपन में मेरी कॉम (साभारः नेशनल स्किल इंडिया मिशन)


    स्कूल के खेलों में रहती थी धाक
    मेरी का जीवन ऐसा था कि कुछ सोचने का समय ही नहीं था. मां सुबह अंधेरा होने से पहले ही जगा देती थीं. क्योंकि स्कूल जाने से पहले उन्हें मां के साथ रसोईं के भी काम निपटाने होते थे. इसके बाद वो भाई-बहन के साथ तैयार होकर स्कूल निकल पडतीं. स्कूल में खेलों में खासकर ट्रैक-फील्ड इवेंट्स में वो बहुत आगे रहती थीं. यों कह लीजिए कि सारी स्पर्धाएं वही जीतती थीं. चपन से ही मेरी के हाथ बहुत तेज चलते थे. खासकर उनके मुक्कों में बहुत ताकत थी. एक बार उनके भाई को किसी साथी बच्चे ने परेशान किया तो मेरी ने इतने तेज मुक्के मारे कि उसने कभी दोबारा ऐसा करने की हिम्मत नहीं की.

    रातों में टिमटिमाते लैंप में पढना
    उत्तर पूर्व में रातें जल्दी हो जाती हैं. रात में खाने के बाद उनका समय पढऩे का होता था. किसी बोतल में कैरोसिन आयल भरकर उसके ढक्कन में छेदकर कपड़े की एक पट्टी उसमें डाली जाती थी. इसको जलाया जाता था. यही उनका लैंप था. घर में रात में उनकी पढाई इसी लैंप में होती थी. इस लैंप में धुंआ ज्यादा होता था. रोशनी कम. जाड़े बहुत खराब बीतते थे. नाममात्र के कपड़े होते थे.रात में ठंड कंपकंपाती रहती थी.

    ..और अब यहां से बदलना था जीवन
    जब वो नौवीं क्लास में आईं तो पढ़ने के लिए इंफाल भेजा गया. वर्ष 1999 में जब वह मां के साथ गांव के बगल से गुजरने वाली सडक़ से इंफाल की बस में बैठीं तो उदास हो गईं, अहसास हो गया कि जिस गांव में बचपन बिताया है वो अब छूटने वाला है, जिंदगी अब कहीं और ले जाने वाली है. यहीं उन्होंने साई के कोचिंग सेंटर भी जाना शुरू किया. दिन में स्कूल जातीं. और सुबह - शाम प्रैक्टिस करतीं. लौटकर खाना बनातीं. उन्होंने साई सेंटर में कई खेल आजमाए लेकिन ये लगता रहा कि ये खेल उनके लिए नहीं है.
    उसी समय इंफाल में साई ने महिला बाक्सिंग की कोचिंग शुरू की. उन्हें न जाने क्यों इस खतरनाक खेल ने रोमांचित किया. तय कर लिया कि बॉक्सर ही बनना है. जब वह कोच एल इबोमचा सिंह के पास पहुंचीं. तो उसने उन्हें देखकर कहा- लगता नहीं कि तुम जैसी पतली दुबली और छोटी सी लडक़ी बॉक्सर बन सकेगी. कुछ दिन प्रैक्टिस करो फिर देखते हैं. बस यही क्षण मेरी कॉम की जिंदगी का टर्निंग पाइंट था..जहां से सबकुछ 360 डिग्री बदल जाने वाला था.

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    मेरी कॉम अपने गांव में (फोटोः गेटी इमेज)


    पहला गोल्ड इस तरह मिला
    वह इतनी जल्दी में थीं कि पंद्रह दिनों में ही बहुत कुछ सीख लिया. इसी बीच बाक्सिंग की एक राज्य स्तरीय प्रतियोगिता होनी थी. उनका सेलेक्शन 48 किलोवर्ग में हुआ. लेकिन खुशी तब निराशा में बदल गई जब आयोजकों ने उनसे वेट कैटेगरी बदलने को कहा. मेरी ने साफ मना कर दिया. न जाने कैसे आयोजकों का दिमाग बदला. और उन्हें मौका मिल गया. रिंग में उन्होंने प्रतिद्वंद्वियों को बुरी तरह हराया. मुक्कों में इतना दम था कि कोई सामने टिक नहीं पाया. उन्होंने न केवल गोल्ड जीता बल्कि प्रतियोगिता की श्रेष्ठ बाक्सर भी चुनी गईं.

    घर में नहीं मालूम था कि बॉक्सिंग करने लगी हैं
    मेरी ने ये बात घर में नहीं बताई थी कि उन्होंने बॉक्सिंग शुरू कर दी है. लगा कि सही समय आने पर घर में बता देंगी, ये भी अंदाज था कि पिता कभी तैयार नहीं होंगे. इसी बीच इंफाल के एक अखबार ने उनकी फोटो के साथ खबर छाप दी. न जाने कैसे अखबार पिता के हाथ लग गया, पढऩा वह जानते नहीं थे लेकिन अखबार में छपी फोटो बेटी की लग रही थी. गांव में एक पढ़ेलिखे आदमी ने खबर पढ़कर बताया कि ये तो उनकी बेटी ही है. पिता की समझ में नहीं आ रहा था कि उनकी बेटी बॉक्सिंग कैसे कर सकती है.

    Tags: Boxing, CWG 2018, Mary kom

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