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पहली बार खगोलविदों ने देखा दो ग्रहों के ऐसा टकराव, एक का उड़ गया था वायुमंडल

पहली बार खगोलविदों ने देखा दो ग्रहों के ऐसा टकराव, एक का उड़ गया था वायुमंडल

ग्रहों के टकराव (collision of Planets) की घटना तो असामान्य नहीं है, लेकिन इसका दिखाई देना असामान्य जरूर है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

ग्रहों के टकराव (collision of Planets) की घटना तो असामान्य नहीं है, लेकिन इसका दिखाई देना असामान्य जरूर है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

खगोलविदों (Astronomers) ने पहली बार दो ग्रहों को ऐसा टकराव (Collision of Two Planets) देखा जिसमें एक ग्रह का वायुमंडल (Atmosphere) टकराव के कारण खत्म ही हो गया.

    ग्रह निर्माण (Planet formation) की प्रक्रिया बहुत जटिल होती है. एक तारे के बनने के बाद उसके आसपास बहुत सारा पादर्थ एक साथ आना शुरू हो जाता है जिससे ग्रह निर्माण की नींव बनती है. ग्रह बनने के बात ये पिंड जरूरी नहीं है कि अपने सौरमंडल (Solar System) के साथ ही चिपके रहे हैं. इनमें बदलाव जारी रहता है और कई बार तो अपने तंत्र से भी बाहर निकल जाते हैं. अब खगोलविदों ने एक बहुत कम दिखने वाली घटना के तहत दो ग्रहों के टकराव (Collision of Two Planets)  को देखा है. जिससे एक ग्रह ने तो अपना पूरा वायुमडंल ही गंवा दिया है.

    कहां और कितना पुराने तारे की है यह घटना
    यह घटना पृथ्वी से 95 प्रकाशवर्ष दूर घटी है. शोधकर्ताओं के विश्लेषण के अनुसार 2.3 करोड़ साल पुराने HD 172555 तारे के आस पास दिख रही असामान्य धूल दो ग्रहों के टकराने का नतीजा है. यह टकारवा इतना ज्वलंत रहा कि इस टकराव के कारण एक ग्रह का वायुमंडल खत्म ही हो गया.

    पहली बार देखा गया इस तरह का टकराव
    एमआईटी की खगोलविद टनाया श्नाइडरमैन का कहना है कि यह पहली बार है जब हमने इस परिघटना का पता लगाया है जिसमें एक ग्रह बनने जा रहे पिंड का वायुमंडल विशाल टकराव से खत्म हो गया. सभी इस विशाल टकराव में दिलचस्पी ले रहे हैं. क्योंकि हम इस तरह की घटना की उम्मीद तो करते हैं, लेकिन इसके प्रमाण नहीं मिलते हैं.

    पहले डिस्क का निर्माण
    शोधकर्ताओं का कहना है कि ग्रह निर्माण की प्रक्रिया  बहुत जटिल होती होती है और हमें अपने सौरमंडल की जानकारी के साथ हमारी गैलेक्सी मिल्कीवे के दूसरे तंत्रों की जानकारी भी जोड़नी पड़ती है जो अपने विकास क्रम के अलग अलग चरण में हैं. जब एक तारा बनता है तो धूल और गैस का आणविक बादल का पदार्थ समूह एक बड़ी डिस्क का रूप ले लेता है. जो उस बढ़ते तारे की खुराक बनने लगता है.

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    शोधकर्ताओं का इस सिस्मट के तारे (Star) के पास असामान्य संकेत मिले जिससे इस घटना की जानकारी मिली. प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

    पदार्थ का एक साथ आते जाना
    यह डिस्क कई बदलाव के चरणों से गुजरती है.संभवतः इसकी शुरुआत तारे का निर्माण पूरा होने से पहले ही हो जाती है. इसमें पदार्थ के महीन टुकड़े एक दूसरे से चिपकने शुरू हो जाते हैं. ऐसा पहले विद्युतस्थैतिकी के कारण होता है और उसके बाद इनका भार गुरुत्वाकर्षण के कारण बढ़ने लगता है. और बढ़ते हुए  गुच्छे टकराकर मिलते जाते हैं और इनका इतना भार हो जाता है कि इन्हें ग्रह कहा जा सकता है.

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    स्वाभाविक नहीं होता है टकराव
    लेकिन हर शिशु बचा नहीं रह पाता है. वैज्ञानिकों को लगता है कि ऐसा ही मंगल के आकार एक ग्रह हमारे सौरमंडल में भी था, लेकिन उसके और पृथ्वी से टकराने से चंद्रमा का निर्माण हुआ था. खगोलविदों का मानना है कि बहुत सारे ग्रह वैसे बनते नहीं हैं जिस अवस्था में वे अंततः पहुंचे हुए होते हैं. इसकी जगह वे कहीं और बनते हैं और बाद में कहीं और पहुंच जाते हैं. इसी वजह से कई बार इन्हें टकराव की स्थिति देखनी पड़ती है. ग्रहों का टकराव ना केवल एक सामान्य घटना है बल्कि ग्रहों के विकास में अहम भूमिका भी निभाता है.

    बहुत असामान्य दिखा यह तंत्र
    HD 172555 एक अजीब सा गोला माना जाता था, इसके आसपास की धूल और कणों के आकार की असामान्य संरचना देते थे. उसमें सिलिका और ठोस सिलिकॉनमोनोऑक्साइड का मात्रा भी असामान्य होने के साथ उसके धूल के कण भी औसत आकार से छोटे ही थे. आमतौर पर ऐसी जगहों पर कार्बन मोनोऑक्साइड बहुत चमकीली होती है. इसी लिए खगोलविदों ने for HD 172555  में इसी की खोज भी की.

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    शोधकर्ताओं का कहना है कि ग्रहों (Planets) इस तरह के टकराव बहुत प्रचंड ही होते हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

    कब हुई थी यह घटना
    खगोलविदों ने पाया कि कार्बन मोनोऑक्साइड की बहुत सी मात्रा तारे के पास, 10 एस्ट्रोनॉमिकल यूनिट की दूरी पर चक्कर लगा रही थी. इस दूरी पर गैस सौर विकिरण से विखंडित हो जानी चाहिए थी. लेकिन ऐसा नहीं था. टीम की मॉडलिंग अवलोकन से पता चला कि इसकी सबसे अच्छी व्याख्या यही थी कि इसके पास दो लाख साल पहले ग्रहों का टकराव हुआ होगा जिससे कार्बन मोनोऑक्साइड को विखंडित होने का समय नहीं मिल सका होगा.

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    शोधकर्ताओं ने अपने विश्लेषण में पाय कि एक पृथ्वी के ग्रह का टकराव 10 किलोमीटर प्रति सेकेंड की गति आने वाले उससे छोटे पिंड से हुआ होगा. टकराव इतना प्रचंड रहा होगा कि इससे  पथरीले ग्रह के वायुमंडल का अधिकांश हिस्सा उड़ गया होगा. जो कार्बन मोनोऑक्साइड और सिलिका वाली धूल का कारण बना. नेचर में प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक इस टकराव के संकेत आज भी साफ तौर पर दिखते हैं.

    Tags: Research, Science, Solar system, Space

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