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रिक्शे से सफर करता था दो बार बिहार का मुख्यमंत्री रहा ये नेता

News18Hindi
Updated: February 20, 2020, 5:31 PM IST
रिक्शे से सफर करता था दो बार बिहार का मुख्यमंत्री रहा ये नेता
कर्परी ठाकुर का सन् 1988 में असामयिक निधन हो गया. उनके निधन के बाद शरद यादव की मदद से लालू प्रसाद उनके उत्तराधिकारी बने

एक बार उप मुख्यमंत्री और दो बार मुख्यमंत्री रहने के बावजूद कर्पूरी ठाकुर (Karpoori Thakur) रिक्शे से ही चलते थे. क्योंकि उनकी जायज आय कार खरीदने और उसका खर्च वहन करने की अनुमति नहीं देती थी.

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  • Last Updated: February 20, 2020, 5:31 PM IST
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अस्सी के दशक की बात है. बिहार विधान सभा की बैठक चल रही थी. कर्पूरी ठाकुर (Karpoori Thakur) विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता थे. उन्होंने एक नोट भिजवा कर अपने ही दल के एक विधायक से थोड़ी देर के लिए उनकी जीप मांगी. उन्हें लंच के लिए आवास जाना था.

उस विधायक ने उसी नोट पर लिख दिया, ‘मेरी जीप में तेल नहीं है. कर्पूरी जी दो बार मुख्यमंत्री रहे. कार क्यों नहीं खरीदते?’ यह संयोग नहीं था कि संपत्ति के प्रति अगाध प्रेम के चलते वह विधायक बाद के वर्षों में अनेक कानूनी परेशानियों में पड़े, पर कर्पूरी ठाकुर का जीवन बेदाग रहा.

याद रहे कि एक बार उप मुख्यमंत्री और दो बार मुख्यमंत्री रहने के बावजूद कर्पूरी ठाकुर रिक्शे से ही चलते थे. क्योंकि उनकी जायज आय कार खरीदने और उसका खर्च वहन करने की अनुमति नहीं देती थी.

कर्परी ठाकुर का 17 फरवरी 1988 को असामयिक निधन हो गया था. उनके निधन के बाद शरद यादव की मदद से लालू प्रसाद उनके उत्तराधिकारी बने, पर कर्पूरी ठाकुर और लालू यादव की जीवन शैलियों में कोई समानता नहीं रही.



हेमवती नंदन बहुगुणा


बहुगुणा कर्पूरी ठाकुर की झोपड़ी देखकर रो पड़े थे
कर्पूरी ठाकुर के निधन के बाद हेमवंती नंदन बहुगुणा उनके गांव गए थे. बहुगुणा जी कर्पूरी ठाकुर की पुश्तैनी झोपड़ी देख कर रो पड़े थे. स्वतंत्रता सेनानी कर्पूरी ठाकुर 1952 से लगातार विधायक रहे, पर अपने लिए उन्होंने कहीं एक मकान तक नहीं बनवाया.

सत्तर के दशक में पटना में विधायकों और पूर्व विधायकों के निजी आवास के लिए सरकार सस्ती दर पर जमीन दे रही थी. खुद कर्पूरी ठाकुर के दल के कुछ विधायकों ने कर्पूरी ठाकुर से कहा कि आप भी अपने आवास के लिए जमीन ले लीजिए.

कर्पूरी ठाकुर ने साफ मना कर दिया. तब के एक विधायक ने उनसे यह भी कहा था कि जमीन ले लीजिए.अन्यथा आप नहीं रहिएगा तो आपका बाल-बच्चा कहां रहेगा? कर्पूरी ठाकुर ने कहा कि अपने गांव में रहेगा. आरंभ से ही बाल-बच्चों की आर्थिक बेहतरी की चिंता करने वाले तब के उस नेता को बाद के वर्षों में जायज आय से अत्यधिक धनोपार्जन के कारण कानूनी परेशानियां और बदनामी झेलनी पड़ीं.

कुछ यूं की थी बेटी की शादी
इन दिनों कर्पूरी ठाकुर के दल के भी कुछ नेता अपने यहां की शादियों में करोड़ों रुपए खर्च कर रहे हैं.पर जब कर्पूरी ठाकुर को अपनी बेटी की शादी करनी हुई तो उन्होंने क्या किया था? उन्होंने इस मामले में भी आदर्श उपस्थित किया.

1970-71 में कर्पूरी ठाकुर बिहार के मुख्यमंत्री थे. रांची के एक गांव में उन्हें वर देखने जाना था. तब तक बिहार का विभाजन नहीं हुआ था. कर्पूरी ठाकुर सरकारी गाड़ी से नहीं जाकर वहां टैक्सी से गये थे. शादी समस्तीपुर जिला स्थित उनके पुश्तैनी गांव पितौंजिया में हुई.

कर्पूरी ठाकुर चाहते थे कि शादी देवघर मंदिर में हो, पर उनकी पत्नी की जिद पर गांव में शादी हुई. कर्पूरी ठाकुर ने अपने मंत्रिमंडल के किसी सदस्य को भी उस शादी में आमंत्रित नहीं किया था.

यहां तक कि उन्होंने संबंधित अफसर को यह निर्देश दे दिया था कि बिहार सरकार का कोई भी विमान मेरी यानी मुख्य मंत्री की अनुमति के बिना उस दिन दरभंगा या सहरसा हवाई अड्डे पर नहीं उतरेगा. पितौंजिया के पास के हवाई अड्डे वहीं थे.आज के कुछ तथाकथित समाजवादी नेता तो शादी को भी ‘सम्मेलन’ बना देते हैं.

भ्रष्ट अफसर और व्यापारीगण सत्ताधारी नेताओं के यहां की शादियों के अवसरों पर करोड़ों का खर्च जुटाते हैं. कर्पूरी ठाकुर के जमाने में भी थोड़ा बहुत यह सब होता था, पर कर्पूरी ठाकुर तो अपवाद थे.

पीलू मोदी


जब पीलू मोदी से मांगा चुनाव प्रचार के लिए हेलिकॉप्टर
एक अन्य प्रकरण पीलू मोदी को लेकर है. पटना के सालिमपुर अहरा स्थित उनकी पार्टी के दफ्तर में एक आराम कुर्सी पर पीलू मोदी पसरे हुए थे. बगल की कुर्सी पर कर्पूरी ठाकुर थे. पीलू मोदी और कर्पूरी ठाकुर उन दिनों एक ही दल में थे.

संयोग से मैं भी वहीं था. कर्पूरी ठाकुर ने पीलू मोदी से कहा कि ‘मोदी साहब, यदि आप बिहार पार्टी के लिए एक हेलिकाॅप्टर का प्रबंध कर दें तो हम यहां की विधानसभा की आधी सीट जीत जाएंगे.’

इस पर हंसोड़ मोदी ने कहा कि ‘दो का प्रबंध कर देता हूं, पूरी सीटें जीत जाओ. अरे भई चुनाव हेलिकाॅप्टर से नहीं बल्कि जन समर्थन से जीता जाता है.’

दरअसल कर्पूरी ठाकुर अपनी ईमानदारी और विनम्रता के कारण पूरे राज्य में लोकप्रिय थे, पर वे चुनावों के समय सब जगह पहुंच नहीं पाते थे. पर उन्होंने किसी व्यापारी से सौदेबाजी करके हेलिकाॅप्टर के लिए पैसे नहीं जुटाए. इसीलिए उन पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप कभी सट नहीं सका.

कर्पूरी के कुर्ते के लिए चंद्रशेखर ने किया चंदा
हालांकि उनकी साधनहीनता भी उन्हें दो बार मुख्यमंत्री बनने से रोक भी नहीं सकी. 1977 में जेपी आवास पर जयप्रकाश नारायण का जन्म दिन मनाया जा रहा था. पटना के कदम कुआं स्थित चरखा समिति भवन में, जहां जेपी रहते थे,देश भर से जनता पार्टी के बड़े नेता जुटे हुए थे. उन नेताओं में चंद्रशेखर, नानाजी देशमुख शामिल थे.

मुख्यमंत्री पद पर रहने बावजूद फटा कुर्ता, टूटी चप्पल और बिखरे बाल कर्पूरी ठाकुर की पहचान थे. उनकी दशा देखकर एक नेता ने टिप्पणी की, ‘किसी मुख्यमंत्री के ठीक ढंग से गुजारे के लिए कितना वेतन मिलना चाहिए?’ सब निहितार्थ समझ गए. हंसे.

फिर चंद्रशेखर अपनी सीट से उठे. उन्होंने अपने लंबे कुर्ते को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर सामने की ओर फैलाया. वह बारी-बारी से वहां बैठे नेताओं के पास जाकर कहने लगे कि आप कर्पूरी जी के कुर्ता फंड में दान कीजिए. तुरंत कुछ सौ रुपए एकत्र हो गए.

पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के साथ लालू यादव


उसे समेट कर चंद्रशेखर जी ने कर्पूरी जी को थमाया और कहा कि इससे अपना कुर्ता-धोती ही खरीदिए. कोई दूसरा काम मत कीजिएगा. चेहरे पर बिना कोई भाव लाए कर्पूरी ठाकुर ने कहा, ‘इसे मैं मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा करा दूंगा.’

यानी तब समाजवादी आंदोलन के कर्पूरी ठाकुर को उनकी सादगी और ईमानदारी के लिए जाना जाता था, पर आज के कुछ समाजवादी नेताओं को? कम कहना और अधिक समझना !

कुछ अपवादों को छोड़ दें तो इस बात के लिए जाना जाता है कि किस नेता ने अपने बाल- बच्चों के लिए कितनी अधिक संपत्ति एकत्र की ! कुछ मामलों में तो अब संपत्ति करोड़ों में नहीं बल्कि अरबों में जुटाई जाती है.

(न्यूज18 समूह के लिए लिखे गए सुरेंद्र किशोर के लेख से साभार)

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First published: February 17, 2020, 9:16 AM IST
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