कितनी ताकतवर है वो अदालत, जहां China के खिलाफ चलेगा मुकदमा

कितनी ताकतवर है वो अदालत, जहां China के खिलाफ चलेगा मुकदमा
कोरोना के बीच चीन से गुस्साए सारे देश मुस्लिमों पर चीन की बर्बरता पर बात कर रहे हैं

चीन में उइगर मुसलमानों पर हिंसा (violence and human rights violation against Uighur Muslims in China) का मामला अब जोर पकड़ चुका है और इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (International Criminal Court) तक जा पहुंचा है.

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कोरोना के बीच चीन से गुस्साए सारे देश मुस्लिमों पर चीन की बर्बरता पर बात कर रहे हैं. यहां तक कि मामला अब इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट जा चुका है. इस मामले में चीनी प्रेसिडेंट शी जिनपिंग के साथ 30 दूसरे चीनी अधिकारियों पर केस दर्ज हुआ है. लंदन के वकीलों ने चीन में इस अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ मानवाधिकार हनन के हवालों के साथ लंबा-चौड़ा दस्तावेज क्रिमिनल कोर्ट में जमा किया. उम्मीद की जा रही है कि कोर्ट के फैसले से चीन के उइगरों के प्रति बर्ताव में नरमी आएगी. जानिए, क्या है इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट और कैसे काम करता है.

कहां है कोर्ट
ये कोर्ट नीदरलैंड्स के पश्चिमी हिस्से में हेग प्रांत में बना है. यानी अदालत की ऑफिशियल बैठक यहीं पर होती है लेकिन कार्वाई कहीं भी हो सकती है. कुल 123 देश साल 2002 में बने इस कोर्ट के सदस्य हैं. इसकी स्थापना का उद्देश्य सदस्य देशों में हो रहे मानवाधिकार हनन, जन-संहार, और किसी भी तरह की मास हिंसा का विरोध और उसका निपटारा करना है.

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इंटरनेशनल स्तर पर कई सारे कोर्ट क्यों हैं?


सारे ही कोर्ट्स अलग-अलग उद्देश्यों के लिए हैं. जैसे इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस के तहत दो देशों के बीच मामलों को सुलझाया जाता है. इसी तरह से इंटरनेशनल क्रिमिनल ट्रिब्यूनल में मानवता के खिलाफ क्राइम को सुलझाने की कोशिश की गई थी लेकिन ये केवल एक खास क्षेत्र में किसी खास पीरियड के दौरान हुई हिंसा के लिए रहा. सारे ही इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल से अलग इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट स्थायी स्ट्रक्चर है.

चीन में उइगर मुसलमानों पर हिंसा का मामला अब जोर पकड़ चुका है- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)


हैं कई लिमिटेशन्स
आमतौर पर कोर्ट अपने न्यायाधिकार का प्रयोग सिर्फ उन्हीं मुकदमों के लिए कर सकता है जहां अभियुक्त, सदस्य देश का नागरिक हो, या फिर अपराध सदस्य देश में हुआ हो, या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा भेजा गया कोई मामला हो. एक और मामले में भी क्रिमिनल कोर्ट बीच में आ सकती है, तब जबकि नेशनल कोर्ट किसी भी वजह से किसी खास मामले का निपटारा न कर सके या न करना चाहे. ऐसे में जांच की जिम्मेदारी सदस्य देश की होती है लेकिन सारी कार्रवाई इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट में चलती है.

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भारत नहीं है साथ
वैसे इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट की व्यवस्था पर भारत को काफी आपत्ति रही है. दरअसल दूसरे विश्व युद्ध के बाद इंटरनेशनल स्तर पर ऐसे किसी कोर्ट की जरूरत समझी गई, जो देशों में आंतरिक तौर पर हो रही हिंसा को देखें और उनपर रोक लगा सकें. रोम संधि के तहत सबसे पहले यूरोपीय देशों ने इसके लिए सहमित दी. देशों के जुड़ते-जुड़ते इसे तैयार होने में कई साल बीते. साल 2002 में ये तैयार हुआ तो इसके कुछ तीन-चार उद्देश्य बताए गए- देशों में मानवाधिकार हनन के मामले, नरसंहार और युद्ध अपराधों पर ये काम करता है.

अमेरिका भी अलग-थलग
भारत ने काफी कोशिश की कि परमाणु हथियारों समेत कई दूसरे हथियारों के इस्तेमाल के मामले को भी कोर्ट देखे. इसके लिए उसने काफी पैरवी की लेकिन असफल रहा. इसपर भारत ने गुस्से में कहा कि अगर कोर्ट युद्ध अपराधों पर काम करता है तो उसे परमाणु हथियारों पर रोक को भी अपने काम में शामिल करना चाहिए. इसे अलग रखना ठीक नहीं. अमेरिका का भी कहना है कि इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट अपराधों की बहुत छोटी श्रेणी पर काम करता है. इस कारण अमेरिका भी इसपर भड़का रहा.

कोर्ट में चीनी प्रेसिडेंट शी जिनपिंग के साथ 30 दूसरे चीनी अधिकारियों पर केस दर्ज हुआ है


कई दूसरे कारणों से भी इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट घेरे में रहा. जैसे शुरुआती 11 सालों में उसने केवल अफ्रीकन मामलों पर फोकस किया और उन्हें ही सजा सुनाई. हालांकि आईसीसी इनसे इनकार करता है. उसका कहना है कि अगर सदस्य देश खुद या फिर यूएन उसके पास मामला लाए, वो तभी काम कर सकता है.

कैसे काम करता है कोर्ट
नीदरलैंड्स में इसका मुख्य दफ्तर है. सारी बैठकें वहीं होती हैं. साथ ही कोर्ट की अपनी कोई पुलिस फोर्स नहीं है, बल्कि ये सदस्य देशों की पुलिस फोर्स पर निर्भर करती है ताकि आरोपी को अरेस्ट करके नीदरलैंड्स पहुंचाया जा सके. कई बार सदस्य देश जांच तो करवाना चाहते हैं लेकिन किसी भी तरह के सहयोग से मना कर देते हैं. ऐसे में दूसरे इंटरनेशनल कोर्ट्स की बजाए बेहद अहम होने के बाद भी आईसीसी का काम मुश्किल रहता है.

सुपर पावर अमेरिका का सहयोग न होने के कारण आईसीसी उतनी प्रभावी बॉडी नहीं लगती है- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)


क्यों लगता है कमजोर
सुपर पावर अमेरिका का सहयोग न होने के कारण आईसीसी उतनी प्रभावी बॉडी नहीं लगती है. तो क्या वजह है कि अमेरिका ने इससे सहयोग के लिए मना कर दिया? असल में अमेरिका को डर है कि सदस्य देशों में सुरक्षा के लिहाज से तैनात उसके सैनिकों पर कोर्ट में कोई अभियोग बेवजह चल सकता है. राष्ट्रपति रहने के दौरान बिल क्लिंटन आखिरकार इस कोर्ट से सहयोग के लिए मान गए थे लेकिन कांग्रेस ने इसकी पुष्टि नहीं की. बुश प्रशासन के दौरान भी अमेरिका ने डर जताया कि कोर्ट में उसे किसी राजनैतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए घसीटा जा सकता है. इससे बचने के लिए अमेरिका ने अपनी सेना बोस्निया से हटाने की धमकी दी, जब तक कि ये पक्का न हो जाए कि उसके सैनिकों को आईसीसी के दायरे से हमेशा अलग रखा जाएगा.

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दिलचस्प बात ये है कि चीन और पाकिस्तान ने भी खुद को कोर्ट से अलग रखा हुआ है, यानी ये सदस्य देश नहीं बने. ऐसे में चीन के खिलाफ मुकदमा चलने पर भी ज्यादा उम्मीद नहीं की जा रही कि यहां पर उसके खिलाफ मुकदमे से खास फायदा होगा. अगर चीन पर भड़का हुआ यूएस इस समय कोर्ट से जुड़ने जैसा कदम ले, तब कोर्ट की ताकत काफी बढ़ सकती है.
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