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भोपाल गैस कांड: असली गुनहगार कुरैशी कौन था, कैसा था-कोई आजतक नहीं जान पाया

36 साल पहले भोपाल गैस त्रासदी में जहरीली methyl isocyanate गैस रिसने से देखते ही देखते हजारों लोग मर गए थे.
36 साल पहले भोपाल गैस त्रासदी में जहरीली methyl isocyanate गैस रिसने से देखते ही देखते हजारों लोग मर गए थे.

36 साल पहले भोपाल (Bhopal) में 02 दिसंबर की आधी रात से 03 दिसंबर (3 December) तक यूनियन कार्बाइड कारखाने से अचानक जहरीली गैस रिसने लगी, जिसने एक शहर के एक बड़े हिस्से को आगोश में ले लिया. इसमें हजारों लोग मरे लेकिन आजतक दोषियों के खिलाफ सही मायनों में कार्रवाई नहीं हो सकी है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 3, 2020, 9:46 PM IST
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भोपाल गैस कांड (Bhopal Gas Tragedy) को 36 साल हो चुके हैं. 03 दिसंबर की रात भोपाल में यूनियन कार्बाइड के कारखाने से जहरीली गैस का रिसाव हुआ. इसने भोपाल के एक हिस्से को चपेट में ले लिया. सैकड़ों-हजारों लोग इससे मर गए. लोगों का दम घुटने लगा. सांस रुकने लगी. लोगों ने जब खुली हवा में निकलने की कोशिश की तो बिखरी गैस ने उनके लिए और काल का काम किया. अगले दिन शहर में सड़कों पर जगह जगह लाशें पड़ी हुईं थीं. दुर्भाग्य ये कि इस जघन्य कांड के आरोपी बच निकले. उन पर कार्रवाई ही नहीं हो सकी.

मुख्य आरोपी वारेन एंडरसन (Warren Anderson) की मौत 06 साल पहले ही हो चुकी है. चर्चा ये भी रही कि गैस कांड के मुख्य आरोपी को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के इशारे पर राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने सुरक्षित निकाल दिया.

हादसे से हिल गई थी दुनिया
02 और 03 दिसंबर की मध्य रात्रि पुराने भोपाल के सघन इलाके छोला में स्थित यूनियन कार्बाइड के कारखाने से मिथाइल आइसोसाइनेट (methyl isocyanate) जैसी जहरीली गैस का रिसाव हुआ.  3 दिसंबर की सुबह पुराने भोपाल और नए भोपाल की सड़कों पर जगह-जगह लाशें पड़ी हुईं थीं. पूरी दुनिया को इस रासायनिक त्रासदी ने हिला कर रखा दिया था.
घटना की तीन साल तक जांच करने के बाद सीबीआई ने वारेन एंडरसन सहित यूनियन कार्बाइड के 11 अधिकारियों के खिलाफ अदालत में चार्जशीट दाखिल की थी. एंडरसन को कभी भारत नहीं लाया जा सका. उसकी अनुपस्थिति में ही पूरा केस चला.





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जून 2010 में इस मामले में कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया. फैसले में कार्बाइड के अधिकारियों को जेल और जुर्माने की सजा सुनाई. अधिकारियों ने जुर्माना भरा और सेशन कोर्ट में अपील दायर कर दी.

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भोपाल का यूनियन कार्बाइड संयत्र, जो अब बंद है (फाइल फोटो)


कौन था इस हादसे का सबसे बड़ा गुनहगार
इस पूरे हादसे का अहम गुनहगार शकील अहमद कुरेशी था. शकील अहमद को भी कोर्ट ने दो साल की सजा सुनाई थी. शकील अहमद कौन है, कैसा दिखता है, यह आज भी रहस्य है. शकील अहमद को 36 साल बाद भी सीबीआई तलाश नहीं कर पाई. उसकी फोटो भी सीबीआई के पास नहीं है. एक तरह से देखा जाए तो विश्व की इस भीषण गैस त्रासदी के गुनाहगारों के जेल जाने की संभावनाएं लगभग समाप्त हो चुकी हैं.

शकील अहमद कुरेशी के बारे में कोई नहीं जानता. कुरेशी एमआईसी प्रोडक्शन यूनिट में ऑपरेटर था. कुरेशी के सामने न आने से पूरी घटना का खुलासा नहीं हो सका है.

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अमेरिका तक लड़ी गई लड़ाई
भोपाल में 3 दिसंबर को गैस कांड की बसरी मनाई जाती है. सेंट्रल लाइब्रेरी में सर्वधर्म सभा होती है. भोपाल के सभी सरकारी कार्यालय भी बंद रहते हैं. 36 साल से यह परंपरा चल रही है. इन सालों में कई गैर सरकारी संगठनों ने मुआवजे की लड़ाई अमेरिका तक में जाकर लड़ी. एंडरसन को भारत लाए जाने की मांग पर अदालती कार्यवाही हुई. लेकिन, कोई भी सरकार एंडरसन को भारत नहीं ला सकी. वारेन एंडरसन की मौत 06 साल पहले ही अमेरिका में हो चुकी है.

निचली अदालत ने जिन्हें सजा सुनाई है, उन्होंने अपील कर खुद को जेल जाने से बचा लिया. अपील का फैसला 09 साल में भी नहीं आ पाया. सीबीआई ने इस मामले में गुनाहगारों की सजा बढ़ाने की अपील सेशन कोर्ट में दायर की है.

कितने लोग मरे थे
सरकारी आकंड़ों के अनुसार इस घटना में पंद्रह हजार से अधिक लोग मारे गए थे. गैर सरकारी आंकड़े इससे काफी अधिक बताया जाता है. इतनी बड़ी संख्या में हुईं मौतों के जिम्मेदार लोगों को कानून कोई बड़ी सजा नहीं दे पाया. इसकी मुख्य वजह मामूली धाराओं में केस दर्ज करना रहा है.

तत्कालीन डीएम ने किताब में लिखा पूरा विवरण
भोपाल गैस कांड के समय कलेक्टर रहे मोती सिंह ने अपनी किताब "भोपाल गैस त्रासदी का सच"  में उस सच को उजागर किया, जिसके चलते वारेन एंडरसन को भोपाल से जमानत देकर भगाया गया. मोती सिंह ने लिखा, "वारेन एंडरसन को अर्जुन सिंह के आदेश पर छोड़ा गया. उनके खिलाफ पहली FIR गैर जमानती धाराओं में दर्ज की गई थी. फिर भी जमानत देकर छोड़ा गया.

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घटना के जिम्मेदार कार्बाइड के अधिकारी ज्यादा से ज्यादा 14 दिन ही जेल में रहे हैं. जबकि घटना से प्रभावित हजारों लोग आज भी तिलतिल कर मर रहे हैं.

मुआवजे पर ही रहा सरकारी फोकस
भोपाल गैस दुर्घटना के आरोपियों को सजा दिलाने के बजाए सरकार की दिलचस्पी पीड़ितों के लिए कार्बाइड कंपनी से मुआवजा वसूल करने में ज्यादा रही. जब भी भोपाल में आरोपियों को कानून से बचाने को लेकर हल्ला मचा सरकार बचाव में मुआवजे की बात करने लगती है. वर्ष 1989 में हुए समझौते के तहत यूनियन कार्बाइड ने 705 करोड़ रुपये का मुआवजा पीड़ितों के लिए मध्यप्रदेश सरकार को दिया था. इस समझौते के लगभग 21 साल बाद केंद्र सरकार ने एक विशेष अनुमति याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर कर 7728 करोड़ रुपये के मुआवजे का दावा किया. याचिका मंजूर हो गई पर सुनवाई शुरू नहीं हुई.

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भोपाल में इस त्रासदी के आरोपियों को पकड़ने के लिए अब भी प्रदर्शन किए जाते हैं.


क्या हुआ फिर यूनियन कार्बाइड कंपनी का
यूनियन कार्बाइड एक बहुराष्ट्रीय कंपनी थी. बाद में इसका विलय डाव केमिकल कंपनी, (यू.एस.ए.) में हो गया. अगस्त 2017 से डाव केमिकल कंपनी, (यू.एस.ए.) का ई.आई डुपोंट डी नीमोर एंड कंपनी के साथ विलय हो जाने के बाद यह अब डाव-डुपोंट के अधीन है.

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मौजूदा हालात में मुआवजा भी बढ़ सकेगा इसकी भी संभावना कम है. आरोपियों के खिलाफ फौजदारी मुकदमे दो स्तरों पर चल रहे हैं. पहला तीन भगोड़े आरोपियों के खिलाफ और दूसरा उन 9 आरोपियों के खिलाफ जो भोपाल के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सी.जे.एम.) के समक्ष हाजिर हुए थे.

जून 2010 के आदेश और फैसले के तहत सी.जे.एम. ने इन 8 आरोपियों (एक अब मृत है) पर भारतीय दंड संहिता की धारा 304-ए, 336, 337 और 338 के तहत सजा सुनाई है. अदालत में चल रहे मामलों की गति काफी धीमी है. भोपाल गैस त्रासदी पीड़ित महिला उद्योग संगठन, भोपाल ग्रुप फॉर इंफॉरमेशन एंड एक्शन गैस त्रासदी प्रभावितों की कानूनी लड़ाई लगातार लड़ रहे हैं.
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