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AI का उपयोग कर जापानी खगोलविदों ने खोजा ब्रह्माण्ड का सही आकार जानने का तरीका

अभी तक अतरिक्ष से मिल रहे आंकड़ों में शोरगुल (Noise) के कारण ब्रह्माण्ड की स्पष्ट तस्वीर नहीं पा रही थी. (तस्वीर:  NASA ESA and S Casertano)

अभी तक अतरिक्ष से मिल रहे आंकड़ों में शोरगुल (Noise) के कारण ब्रह्माण्ड की स्पष्ट तस्वीर नहीं पा रही थी. (तस्वीर: NASA ESA and S Casertano)

जापानी खगोलविदों ने खगोल Supercomputer में Artificial Intelligence का उपयोग कर ऐसी तकनीक विकसित की है जिससे ब्रह्माण्ड (Universe) का सही आकार जानने में सफलता मिल सकेगी.

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    हमारे खगोलविद ब्रह्माण की उत्पत्ति के साथ उसके कई रहस्यों को जानने का प्रयास कर रहे हैं. यह एक बहुत ही विशाल और विस्तृत पिंड है जिसकी गहराई नापना संभव ही नहीं लगता है. लेकिन फिर भी अंतरिक्ष के अन्वेषण में जितनी गहराई तक जाना संभव हो सकता है वैज्ञानिक ना केवल वहां का अवलोकन कर रहे हैं बल्कि उसे उपकरण भी विकसित करने में लगे हैं जिनसे और अधिक गहराई की स्पष्ट जानकारी हासिल की जा सके. अब जापानी खगोलविदों ने आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence) की ऐसे अनोखी तकनीक विकसित की है जिससे वे ब्रह्माण्ड को नाप सकें.

    शोरगुल हटाने की जरूरत
    जापानी खगोलविदों ने अपने खगोलीय आंकड़ों से वह शोर हटाने में सफलता पाई जिससे ग्लैक्सी के आकार में बेतरतीब विविधता आ रही थी. वैज्ञानिकों ने इसके लिए सुपरकम्प्यूटर सिम्यूलेशनस का उपोयग किया और विशाल कृत्रिम आंकड़ों का परीक्षण किया और उसके बाद उसी परीक्षण को अंतरिक्ष के वास्तविक आंकड़ों पर किया.

    नतीजों की सटीकता
    इन परीक्षणों के बाद वैज्ञानिकों ने जापान के सुबारू टेलीस्कोप से मिला आंकड़ों पर इस उपकरण का उपयोग किया. वैज्ञानिक यह जानकार हैरान थे उनके उपकरण और परीक्षणों ने सटीकता से काम किया और पाया कि उनके नतीजे बड़े पैमाने पर ब्रह्माण्ड के वर्तमान स्वीकृत मॉडल से संगत करते दिखे.

    बहुत उपयोगी हो सकता है यह उपकरण
    यदि इस उपकरण को बड़े पैमाने पर लागू किया जाए तो यह वैज्ञानिकों को विस्तृत आंकड़ों के विश्लेषण में उपयोग में लाया जा सकता है जो खगोलीय सर्वेक्षण से मिले हैं. फिलहाल जो पद्धतियां  अंतरिक्ष से मिले आंकड़ों में शामिल शोह को हटाने के लिए उपयोग में लाए जाते हैं वह कारगर नहीं हैं.

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    आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence) का अब अंतरिक्ष के क्षेत्र में बहुत उपयोग होने लगा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


    सुपरकम्प्यूटर का उपयोग
    आंकड़ों से शोर के व्यवधान को हटाने के लिए टीम ने दुनिया के सबसे विकसित खगोल सुपरकम्प्यूटर ATERUI-2 का उपयोग किया. शोधकर्ताओं ने सुबारू टेलीस्कोप के वास्तविक आंकड़ों के आधार पर 25 हजार कृत्रिम गैलेक्सी कैटेलॉग बनाए और उसके बाद आंकड़ों में हुई गड़बड़ियों के लिए विश्लेषण किया.

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    ग्रेविटेशनल लेंसिंग
    अंतरिक्ष से मिले आंकड़ों में आगे के दिखने वाले दृश्य गुरुत्व के कारण पीछे के दृश्य पर ग्रहण सा लगा देते हैं. इस प्रक्रिया को ग्रेविटेशनल लेंसिंग कहा जाता है. इस लेंसिंग को मापने से ब्रह्माण्ड को बेहतर तरीके समझने में मदद मिलती है. जो गैलेक्सी हमें सीधे दिखाई देती हैं उससे हमें उसके पीछे मौजूद पिंडों के गलत आंकड़े मिल सकते हैं.

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    ग्रेविटेशलन लेंसिंग से छिपी हुई गैलेक्सी (Galaxies) के बारे में जानकारी मिलती है. (तस्वीर: @NASAHubble)


    विकृत गैलेक्सी को छांटना
    अजीब सी दिखने वाली गैलेक्सी में से विकृत हो चुकी गैलेक्सी को छांटना बहुत मुश्किल काम है. यह विकृतियां ही आंकड़ों में गड़बड़ियां करती हैं. इसे आकार कोलाहल (Shape Noise) कहा जाता है. और यही ब्रह्माण्ड को ठीक तरह से समझने में बाधा बना रहता है. वैज्ञानिकों कोलाहल या शोर को कृत्रिम आंकड़ों में डाला और आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस को से लेंसिंग आंकड़ो को कत्रिम आंकड़ों से खोज निकाला. एआई इस आंकड़े में से उन आंकड़ों को भी छांटने में सफल रहा जो पिछली बार अवलोकित नहीं किए जा सके थे.

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    वैज्ञानिकों ने इस एआई मॉडल का उपयोग आसामान के 12 वर्ग डिग्री क्षेत्र में किया और उन्होंने बहुत सारी छिपी हुई गैलेक्सी की जानकारी हासिल की, लेकिन उससे भी अहम बात यह थी उन्हें उनके नतीजे ब्रह्माण्ड के वास्तिवक जानकारी से काफी मेल खाते खाते हैं. यह अध्ययन मंथली नोटेसिस ऑफ द रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी में प्रकाशित हुआ है.

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