Anna Hazare: मुंबई में फूल बेचते अन्ना हज़ारे ने कैसे तय किया भ्रष्टाचार विरोधी एक्टिविस्ट तक का सफर

माजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने करप्शन के खिलाफ आम लोगों को जोड़ा

महाराष्ट्र के एक गरीब किसान परिवार में जन्मे किसान बाबूराव हजारे (Kisan Baburao Hazare) ने फूल बेचने वाले से लेकर सैनिक और फिर भ्रष्टाचार विरोधी एक्टिविस्ट का सफर तय किया. आज दुनिया उन्हें अन्ना हजारे (Anna Hazare) के नाम से जानती है.

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    Anna Hazare Birthday: भ्रष्टाचार को सबसे बड़ा मुद्दा बनाकर युवाओं को बांधने वाले और भूख हड़ताल से सबको महात्मा गांधी की याद दिलाने वाले अन्ना ने दिल्ली की राजनीति में तूफान ला दिया था. अन्ना खुद भले ही सक्रिय राजनीति में नहीं, लेकिन आज दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल उसी दौर का चेहरा (Arvind Kejriwal with Anna Hazare) हैं. 84 बरस के हुए अन्ना आज वापस महाराष्ट्र में हैं और समाजसेवा में जुटे रहते हैं.

    परिवार को गरीबी से बचाने शुरू किया काम
    हरदम खादी कपड़े और सिर पर गांधी टोपी पहनने वाले अन्ना का जन्म 15 जून, 1938 को महाराष्ट्र के भिंगारी गांव के एक किसान परिवार में हुआ. छह भाई-बहनों वाले अन्ना के परिवार ने काफी गरीबी देखी. बाद में गरीबी से लड़ने के लिए अन्ना मुंबई (तब बॉम्बे) पहुंचे और पढ़ाई छोड़कर काम की शुरुआत की. वे एक फूलवाले की दुकान पर बैठ फूल बेचते, जिसके उन्हें 40 रुपए महीने मिलते. इस बारे में बीबीसी ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था.

    साठ के दशक में जॉइन कर ली सेना 
    काम चलने लगा लेकिन अन्ना के भीतर देशसेवा का जज्बा जब-तब उफनता था. ये साठ के शुरुआत दशक की बात है. भारत-चीन युद्ध के बाद सरकार ने युवाओं से ज्यादा से ज्यादा सेना में आने की अपील की. तब क्या था! अन्ना फूल की दुकान छोड़कर सीधे सेना की मराठा रेजीमेंट पहुंच गए. यहां वे बतौर ड्राइवर काम करने लगे.

    anna hazare birthday
    हरदम खादी कपड़े और सिर पर गांधी टोपी भी अन्ना की शख्सियत का हिस्सा है


    मिला दूसरा जीवन 
    नवंबर 1965 में उनकी खेमकरण सीमा पर तैनाती थी. तभी नवंबर में चौकी पर पाकिस्तानी हवाई हमला हुआ. वहां तैनात सभी लोग मारे गए. अन्ना बच गए. इस घटना ने सैनिक अन्ना का जीवन बदल दिया. वे लगातार लोगों की सेवा के बारे में सोचने लगे ताकि उन्हें जीने को मिला दूसरा मौका बेकार न जाए.

    बिजली-पानी से जूझते गांव का चेहरा बदल दिया 
    सेना से रिटायर होने के बाद अन्ना अपने पैतृक गांव के पास ही रालेगांव सिद्धि में रहने लगे. ये गांव काफी गरीब था, जहां न तो पानी था और न ही बिजली. हर साल गर्मी में रालेगांव में त्राहि-त्राहि मच जाती. अन्ना ने बदलाव का जिम्मा लिया. वे गड्ढे खोदकर बारिश का पानी जमा करने लगे.

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    पहले तो लोगों ने ध्यान नहीं दिया लेकिन फिर युवा अन्ना की लगन से सबको खींचा. गांववाले मिलकर पानी की बचत, पेड़ लगाने से लेकर कई काम करने लगे. वहां सौर ऊर्जा और गोबर गैस के जरिए बिजली की सप्लाई हुई. इससे गांव की सूरत ही बदल गई.

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    करप्शन खत्म करने का जिम्मा लिया 
    रालेगांव सिद्धि का कायाकल्प सरकार की नजरों से बचा नहीं रहा. इसके लिए अन्ना को पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित किया गया. अन्ना का समाज सेवा का जज्बा यहीं नहीं रुका, बल्कि ये शुरुआत थी. वे गांवों में गरीबी के लिए भ्रष्टाचार को जिम्मेदार मानते थे और इसके खिलाफ आंदोलन करने लगे. महाराष्ट्र की सत्ता हिलने लगी थी. ये नब्बे के शुरुआती दौर की बात है.

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    रालेगांव सिद्धि के कायाकल्प के लिए अन्ना हजारे को पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित किया गया


    सूचना के अधिकार कानून का श्रेय 
    अन्ना को सूचना के अधिकार कानून के लिए लड़ने के लिए भी जाना जाता है. साल 1997 में उन्होंने इस कानून के सपोर्ट में जमकर आंदोलन किया और साल 2003 में महाराष्ट्र की तत्कालीन सरकार ने इस कानून को ज्यादा सख्त और पारदर्शी बनाया. अगले दो सालों बाद संसद ने सूचना का अधिकार कानून पास कर दिया, जो आज भी लोगों के काफी काम आ रहा है.

    दिल्ली की राजनीति में ये नाम साल 2011 में चमका
    तब जनलोकपाल बिल के लिए अन्ना अड़ गए थे ताकि सरकारी भ्रष्टाचार जड़ से खत्म हो सके. जंतर-मंतर से शुरु हुए आंदोलन में शुरुआत में अन्ना या फिर अरविंद केजरीवाल को खास अहमियत नहीं मिली लेकिन जल्द ही अपने गांधवादी तौर-तरीकों के साथ अन्ना अलग दिखने लगे. इसके बाद तो पूरा आंदोलन ही उनके नाम हो गया. आज भी जंतर-मंतर या रामलीला मैदान जैसे शब्द सुनाई पड़ने लोग अन्ना हजारे का जिक्र कर बैठते हैं. युवाओं से लेकर परिवार पालने में जुटे आम आदमी को इसी अन्ना ने भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा किया.

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