अयोध्या के अनसुने किस्सेः मुलायम ने कैसे रोका जिला जज पांडे का प्रमोशन?

अयोध्या में विवादित स्थल का फैसला देने के करीब 6 महीने बाद फैजाबाद के तत्कालीन जिला जज के एम पांडे को यह एहसास होने लगा था कि आखिर क्यों पिछले कई जिला जज इस मामले पर फैसला देने से बचते रहे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 26, 2018, 8:20 AM IST
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अयोध्या को भगवान राम के नाम से जाना जाता है. ऐसे में यहां भक्ति की बात होनी चाहिए, पर अब भक्ति से ज्यादा अयोध्या विवाद के कारण मशहूर है. इस शहर में आमतौर पर सब कुछ शांत रहता है. साल भर श्रद्धालु आते रहते हैं, राम की बात होती है, लेकिन 6 दिसंबर आते-आते शहर का माहौल गर्म होने लगता है, श्रद्धालु कम होने लगते हैं और नेता बढ़ने लगते हैं. धर्म से ज्यादा चर्चा विवाद की होने लगती है. इस साल तादाद और चर्चा दोनों में तेजी आई है. हो भी क्यों नहीं, आखिर यह चुनावी साल जो है.

न्यूज़18 हिंदी एक सीरीज़ की शक्ल में अयोध्या की अनसुनी कहानियां लेकर आ रहा है. इसमें 6 दिसंबर तक हम आपको रोज एक ऐसी नई कहानी सुनाएंगे, जो आपने पहले कहीं पढ़ी या सुनी नहीं होगी. हम इन कहानियों के अहम किरदारों के बारे में भी बताएंगे.

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अयोध्या के इतिहास को देखें तो आजादी के बाद तीन अहम पड़ाव हैं. पहला, 1949 जब विवादित स्थल पर मूर्तियां रखी गईं, दूसरा, 1986 जब विवादित स्थल का ताला खोला गया और तीसरा 1992 जब विवादित स्थल गिरा दिया गया. 1992 के बाद की कहानी सबको पता है, लेकिन 1949 से लेकर अब तक ऐसा काफी कुछ हुआ है जो आपको जानना चाहिए.
इस सीरीज़ की पांचवीं कहानी जुड़ी हुई है अयोध्या में विवादित स्थल का ताला खोलने का फैसला देने वाले जिला जज के एम पांडे से. इस फैसले का उनके करियर पर क्या असर हुआ, पढ़िए इस कहानी में...

अयोध्या में विवादित स्थल का फैसला देने के करीब 6 महीने बाद फैजाबाद के तत्कालीन जिला जज के एम पांडे को यह एहसास होने लगा था कि आखिर क्यों पिछले कई जिला जज इस मामले पर फैसला देने से बचते रहे.

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पांडे जी के हाईकोर्ट जज के प्रमोशन की फाइल इधर से उधर धूल फांकने लगी. कोई भी ये बताने को तैयार नहीं था कि आखिर उनका प्रमोशन कब होगा और यह क्यों नहीं हो रहा है. फाइल तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के कार्यलाय में सालों तक धूल फांकती रही. अपनी किताब VOICE OF CONSCEINCE में जस्टिस पांडे ने लिखा है कि 1987 में कई जजों के नाम के साथ उनके नाम को भी हाईकोर्ट जज बनाने की सिफारिश इलाहाबाद हाईकोर्ट ने की, लेकिन 5 दिसंबर 1989 तक सीएम रहे नारायण दत्त तिवारी ने उनके नाम की सिफारिश केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट को नहीं भेजी.



करीब-करीब तीन साल तक जिला जज के एम पांडे की फाइल राज्य सरकार के लॉ विभाग और मुख्यमंत्री कार्यायल में धूल फांकती रही और उस पर कोई फैसला नहीं लिया गया. जिला जज के एम पांडे के साथ काम करने वाले तत्कालीन सीजेएम सी डी राय बताते हैं कि इतने सालों तक फाइल दबी रहने के बाद पांडे जी परेशान रहने लगे उन्हें लगने लगा कि उनका करियर खत्म हो गया.

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5 दिसंबर 1989 को मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद जस्टिस पांडे को लगा कि अब शायद उनकी फाइल आगे बढ़ जाएगी, लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा. कुछ दिनों बाद उनकी फाइल को रिजेक्ट कर दिया गया. यानी जो उम्मीद बची थी वो भी खत्म हो गई. सी डी राय बताते हैं कि तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने विवादित स्थल का ताला खुलवाने की सजा जिला जज पांडे की दी.

के एम पांडे ने अपनी किताब में उस समय के समाचार पत्रों के हवाले से लिखा है कि मुलायम सिंह यादव ने उनकी फाइल रिजेक्ट करते हुए लिखा, “श्री पांडे एक सुलझे हुए, कर्मठ, योग्य और ईमानदार न्यायधीश हैं, लेकिन 1986 में बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाकर इन्होंने एक साम्प्रदायिक तनाव पैदा कर दिया. इसलिए मैं नहीं चाहता हूं कि इन्हें हाईकोर्ट का जज बनाया जाए."


केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह की भेजी गई इस टिप्पणी के बाद फाइल वापस लौट आई और जिला जज के एम पांडे की हाईकोर्ट जज बनने की उम्मीद खत्म हो गई और वह जिला जज के पद से ही रिटायर हो गए.
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