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नेहरू को अयोध्या आने से किसने रोका?

इस सीरीज़ की नौवीं कहानी में पढ़िए कि अयोध्या में चल रहे घटनाक्रम से चिंतित तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू वहां का दौरा करना चाहते थे, लेकिन उन्हें वहां जाने से रोक दिया गया. आखिर नेहरू क्यों नहीं जा पाए अयोध्या, पढ़िए इस कहानी में...

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अयोध्या को भगवान राम के नाम से जाना जाता है. ऐसे में यहां भक्ति की बात होनी चाहिए, पर अब भक्ति से ज्यादा अयोध्या विवाद के कारण मशहूर है. इस शहर में आमतौर पर सब कुछ शांत रहता है. साल भर श्रद्धालु आते रहते हैं, राम की बात होती है, लेकिन 6 दिसंबर आते-आते शहर का माहौल गर्म होने लगता है, श्रद्धालु कम होने लगते हैं और नेता बढ़ने लगते हैं. धर्म से ज्यादा चर्चा विवाद की होने लगती है. इस साल इस तादाद और चर्चा दोनों में तेजी आई है. हो भी क्यों नहीं, आखिर यह चुनावी साल जो है.

न्यूज़18 हिंदी एक सीरीज़ की शक्ल में अयोध्या की अनसुनी कहानियां लेकर आ रहा है. इसमें 6 दिसंबर तक हम आपको रोज एक ऐसी नई कहानी सुनाएंगे, जो आपने पहले कहीं पढ़ी या सुनी नहीं होगी. हम इन कहानियों के अहम किरदारों के बारे में भी बताएंगे.

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अयोध्या के इतिहास को देखें तो आजादी के बाद तीन अहम पड़ाव हैं. पहला, 1949 जब विवादित स्थल पर मूर्तियां रखी गईं, दूसरा, 1986 जब विवादित स्थल का ताला खोला गया और तीसरा 1992 जब विवादित स्थल गिरा दिया गया. 1992 के बाद की कहानी सबको पता है, लेकिन 1949 से लेकर अब तक ऐसा काफी कुछ हुआ है जो आपको जानना चाहिए.

इस सीरीज़ की नौवीं कहानी में पढ़िए कि अयोध्या में चल रहे घटनाक्रम से चिंतित तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू वहां का दौरा करना चाहते थे, लेकिन उन्हें वहां जाने से रोक दिया गया. आखिर नेहरू क्यों नहीं जा पाए अयोध्या, पढ़िए इस कहानी में...

देश की आजादी के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू अयोध्या आना चाहते थे, लेकिन उन्हें अयोध्या आने की इजाजत नहीं मिली. यह बात हैरत में डालने वाली है कि क्या देश के प्रधानमंत्री को उसी देश के किसी हिस्से में आने से रोका जा सकता है? ये सच है, दरअसल 22-23 दिसंबर 1949 की रात अयोध्या के विवादित स्थल के भीतर रामलला की मूर्तियां रख दिए जाने के बाद से हालात तनावपूर्ण बने हुए थे.

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1947 में बंटवारे के दौरान हुए सांप्रदायिक तनाव से देश उबर भी नहीं पाया था कि अयोध्या में इस नए घटनाक्रम ने प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को परेशान कर दिया. नेहरू दिल्ली में बैठे घटना पर नजर रखे हुए थे, लेकिन फैजाबाद की प्रशासनिक मशीनरी की रिपोर्ट पर उनको भरोसा नहीं हो रहा था. ऐसे में प्रधानमंत्री नेहरू ने अयोध्या जाने का फैसला किया.



जवाहर लाल नेहरू के अयोध्या आने की खबर के बाद प्रदेश सरकार के साथ फैजाबाद के तत्कालीन जिलाधिकारी के के नायर ने प्रधानमंत्री नेहरू को हालात के मद्देनजर फैजाबाद न आने की सलाह दी. कुछ लोगों का मानना है कि जिलाधिकारी नायर हिंदू महासभा की तरफ अपना झुकाव रखते थे और अयोध्या में हो रही घटनाओं की सूचना लखनऊ और दिल्ली को अपने हिसाब से देते थे. यहां तक की 22-23 दिसंबर की रात घटनास्थल पर सुबह 4 बजे पहुंचने के बाद भी उन्होंने लखनऊ में बैठे अफसरों को इसकी सूचना सुबह 10.30 बजे दी.

इसके बाद 26 दिसंबर,1949 को प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने गोविंद वल्लभ पंत को टेलीग्राम भेजकर अपनी नाराजगी जाहिर की और लिखा कि “वहां एक बुरा उदाहरण स्थापित किया जा रहा है जिसके भयानक परिणाम होंगे.”

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इस चिठ्ठी का कोई संतोषजनक जबाब न पाकर 5 फरवरी, 1950 को उन्होंने पंत को एक और चिट्ठी लिखी और उनसे पूछा कि क्या उन्हें अयोध्या आना चाहिए. उसके बाद लखनऊ गृह विभाग के अधिकारियों ने प्रधानमंत्री नेहरू की सुरक्षा को लेकर फैजाबाद के जिलधिकारी से रिपोर्ट मांगी.

लेकिन, तत्कालीन जिलाधिकारी के के नायर ने कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए उन्हें अयोध्या आने से मना कर दिया. नेहरू जी ने बाद में गोविद बल्लभ पंत को एक चिठ्ठी लिखकर जिलाधिकारी के आचरण पर नाराजगी भी जाहिर की.

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