आइसलैंड में हफ्तेभर में भूकंप के 18000 से ज्यादा झटके क्या किसी बड़े खतरे का संकेत है?

आइसलैंड में सालभर में आमतौर पर भूकंप के 1000 झटके तो आ ही जाते हैं

आइसलैंड में सालभर में आमतौर पर भूकंप के 1000 झटके तो आ ही जाते हैं

आइसलैंड में सालभर में आमतौर पर भूकंप के 1000 झटके (Iceland earthquake tremors in a week) तो आ ही जाते हैं. यही कारण है कि देश इसके लिए हमेशा तैयार रहता है लेकिन हफ्तेभर में इतने ज्यादा झटके लगना उनके लिए भी असामान्य घटना है.

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उत्तर अटलांटिक देश आइसलैंड में बीते सप्ताहभर में 18,000 से भी ज्यादा भूकंप आ गए. यहां तक कि आमतौर पर भूकंप से सुरक्षित रहने वाली देश की राजधानी रेक्यावीक में भी झटके महसूस किए, जिसकी तीव्रता 5.7 थी. हालांकि भूकंप के इन झटकों से किसी खास नुकसान की बात सामने नहीं आई लेकिन विशेषज्ञ डर जता रहे हैं कि लगातार भूकंप आना ज्वालामुखी के फटने से पहले का संकेत है.

आइसलैंड वैसे भी भूकंप के लिए संवेदनशील जोन में माना जाता है, जहां सालभर में अमूमन 1000 झटके तो आते ही हैं. साथ ही इस देश को ज्वालामुखी फटने की घटना के लिए भी पूरे यूरोप में सबसे ज्यादा संवेदनशील मानते हैं. यहां हर पांच साल में वॉल्केनिक इरप्शन की छोटी-मोटी घटनाएं होती ही हैं. हालांकि अच्छा ये है कि यहां के लोग पहले से ही भूकंप और ज्वालामुखी फटने के लिए तैयार रहते आए हैं. यहां के घरों में भारी सामान ऊंचाई पर नहीं रखा जाता है ताकि अगर कंपन हो तो सामान गिरने से कोई घायल न हो.

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आइसलैंड की राजधानी रेक्यावीक (Photo- pixabay)




इसके साथ ही आइसलैंड में भूकंप के लिए संवेदनशील जगह के आसपास रिहाइश नहीं के बराबर है. बता दें कि देश में 30 ज्वालामुखी हैं, जो लगातार सक्रिय हैं. इनमें से दो ज्वालामुखी सबसे ज्यादा खतरनाक हैं, जिन्हें दैत्य ज्वालामुखी भी कहा जाता है. इनमें से एक ज्वालामुखी ग्लेशियर के नीचे दबा हुआ है, जिसे Katla ज्वालामुखी कहते हैं. वहीं दूसरे ज्वालामुखी का नाम Bárðarbunga है. ये भी दूसरे ग्लेशियर के नीचे दबा है.
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ये दोनों ही ज्वालामुखी साल 2010 में एकाएक सक्रिय हुए. इनसे सबसे बड़ा खतरा ये है कि न केवल ज्लालामुखी नुकसान करेगा, बल्कि ग्लेशियर फटने के कारण बाढ़ जैसे हादसे भी हो सकते हैं. इसके अलावा आइसलैंड में ज्वालामुखी की सक्रियता के कारण गर्म रहने वाले 600 हॉट स्प्रिंग भी हैं.

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अब ये समझते हैं कि भूकंप का ज्वालामुखी से क्या संबंध है, जो वैज्ञानिक आने वाले खतरे की बात कर रहे हैं. दरअसल भूकंप दो तरह का होता है, एक तो वो जो धरती की टैक्टॉनिक प्लेट में बदलाव के कारण आता है. धरती के ज्यादातर हिस्सों में यही भूकंप दिखता है.

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आइसलैंड में भूकंप के लिए संवेदनशील जगह के आसपास रिहाइश नहीं के बराबर है- सांकेतिक फोटो


भूकंप का दूसरा प्रकार ज्वालमुखीय घटना से जुड़ा हुआ है. भूकंप से भू-पृष्ठ में विकार उत्पन्न होता है और भ्रंश पड़ जाते हैं. इन भ्रंशों से पृथ्वी के आन्तरिक भाग में उपस्थित मैग्मा धरातल पर आ जाता है और ज्वालामुखी विस्फोट होता है. ये तो हुआ भूकंप के कारण विस्फोट होना. इसी तरह से जमीन की अंदरुनी सतह में तापमान बढ़ने जैसी ज्वालामुखीय घटना के कारण भी धरती डोलती है.

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अब विशेषज्ञ संदेह जता रहे हैं कि लगातार भूकंप का आना किसी ज्वालामुखीय खतरे का संकेत हो सकता है. जैसे साल 1784 में वहां रिक्टर स्केल पर 7.1 तीव्रता का भूकंप आया था, जिसके साथ ही ज्वालामुखीय परिवर्तन भी देखे गए थे. इसके बाद साल 1912 में 7 तीव्रता का भूकंप आया था, जिस दौरान कई ज्वालामुखी सक्रिय पाए गए. ट्रेंड को देखें तो पता चलता है कि यहां हर 100 साल के अंतराल पर ज्वालामुखी और भूकंप से जुड़ूी कोई बड़ी घटना होती है. लिहाजा यही देखते हुए अब आइसलैंड को किसी बड़ी आपदा का डर सता रहा है.

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भूकंप का एक प्रकार ज्वालमुखीय घटना से जुड़ा हुआ है


आइसलैंडिक मेटेरोलॉजिकल ऑफिस (Icelandic Meteorological Office) दक्षिणी आइसलैंड में किसी बड़ी आपदा की आशंका जता रहा है. इस बारे में लगातार स्टडी की जा रही है ताकि समय रहते लोगों को सावधान किया जा सके. हालांकि परेशानी ये है कि भूकंप या ज्वालामुखी फटने जैसी घटनाओं पर या तो कोई क्लू मिलता नहीं है, या फिर बहुत एडवांस तकनीक रहे और लगातार नजर रखी जाए तो भी ज्यादा से ज्यादा घंटेभर पहले इस बारे में पता लगता है.

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यही बातें ध्यान में रखते हुए आइसलैंड के लोग पहले से ही ऐसी प्राकृतिक आपदा के लिए तैयार रहते हैं. वहां घरों की संरचना इस तरह की होती है जो मामूली झटके आसानी से झेल ले. ऊंची इमारतें किसी हाल में नहीं बनाई जाती हैं. ऊंचाई पर वजनी सामान नहीं रखा जाता है. रिहाइशी इलाकों के आसपास खाली जगहें ताकि किसी भारी झटके के बीच लोग बाहर खुले में आ जाएं. इसके अलावा बच्चों को स्कूलों में ही भूकंप आने पर क्या करें, जैसे सबक दिए जाते हैं.
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