यूपी सरकार ने OBC को हक दिलाने के लिए अनुसूचित जाति से नाइंसाफी की है

यूपी में 17 ओबीसी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल किया जा रहा है. इसकी वजह से अनुसूचित जाति के भीतर नई तरह की समस्या पैदा होगी.

Vivek Anand | News18Hindi
Updated: July 5, 2019, 5:01 PM IST
यूपी सरकार ने OBC को हक दिलाने के लिए अनुसूचित जाति से नाइंसाफी की है
यूपी की योगी सरकार ने 17 ओबीसी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल किया है
Vivek Anand | News18Hindi
Updated: July 5, 2019, 5:01 PM IST
यूपी की 17 ओबीसी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने बीजेपी ने बड़ा दांव तो चल दिया है. सरकार के फैसले के बाद कुछ दिनों में इन 17 ओबीसी जातियों को अनुसूचित जाति का सर्टिफिकेट भी मिलना शुरू हो जाएगा. लेकिन इस एक फैसले की वजह से कई समीकरण बदलने वाले हैं. सबसे बड़ी बात है कि अनुसूचित जाति और जनजाति को उनकी जनसंख्या के आधार पर आरक्षण मिल रहा था. पूरे देश में अनुसूचित जाति की आबादी 15 से 16 फीसदी है. एससी के साथ हुए सामाजिक भेदभाव को दूर करने के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में ही सरकारी नौकरियों और शिक्षा में 15 फीसदी आरक्षण देने का प्रावधान रखा गया. लेकिन यूपी में 17 ओबीसी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने की वजह से एससी की जनसंख्या काफी बढ़ जाएगी. जबकि उन्हें आरक्षण 15 फीसदी ही मिलेगा.

2011 की जनगणना के मुताबिक पूरे देश में अनुसूचित जाति की आबादी 16.6 फीसदी है. इसमें यूपी में इनकी आबादी सबसे ज्यादा है. यूपी की कुल आबादी में अनुसूचित जाति की हिस्सेदारी 20.5 फीसदी है. पहले से ही ज्यादा जनसंख्या वाले इस वर्ग में 17 ओबीसी जातियों के शामिल होने के बाद इनकी जनसंख्या और बढ़ जाएगी. अनुमान के मुताबिक जिन 17 ओबीसी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल किया जा रहा है, वो यूपी की कुल आबादी में 15 फीसदी की हिस्सेदारी रखते हैं. यानी इस आधार पर आकलन करें तो इन ओबीसी जातियों को अनुसूचित जाति में सम्मिलित कर लेने के बाद यूपी में एससी की कुल आबादी 35.5 फीसदी ( 20.5+15= 35.5 ) हो जाएगी. लेकिन उनके लिए आरक्षण की सीमा 15 फीसदी ही रहेगी.

समाजशास्त्री और दिल्ली यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर सुबोध कुमार का कहना है कि 'ये अनुसूचित जाति के लिए दोहरी चोट है. उनका आरक्षण बढ़ाया नहीं जा रहा है लेकिन ओबीसी के शामिल होने की वजह से उनकी आबादी बढ़ जा रही है. ओबीसी को हक दिलाने के लिए अनुसूचित जाति के साथ नाइंसाफी क्यों?' केंद्र सरकार के सामाजिक न्याय और आधिकारिता मंत्री थावरचंद्र गहलोत भी इस बारे में राज्यसभा में जवाब देते हुए बोल चुके हैं कि ये ठीक नहीं है.

क्या यूपी में अनुसूचित जाति के भीतर असंतोष पैदा होगा?

इस लिहाज से सोचें तो पहले 16.6 फीसदी अनुसूचित जाति को 15 फीसदी आरक्षण मिल रहा था. और अब यूपी सरकार के ताजा फैसले के बाद 35.5 फीसदी अनुसूचित जाति की आबादी को 15 फीसदी आरक्षण ही मिलेगा. ये भी सवाल है कि 35.5 फीसदी अनुसूचित जाति की आबादी के लिए 15 फीसदी रिजर्वेशन का फायदा इस समुदाय की कौन सी जातियां उठाकर ले जाएंगे?

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यूपी की जिन 17 ओबीसी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल किया जा रहा है, उनमें से 13 जातियां मछुआरा ( फिशरमैन ) समुदाय या उससे संबंधित उपजातियों से आती हैं. इन 17 जातियों में- कश्यप, कहार, केवट, मल्लाह, निषाद, धीवर, बिंद, धीमर, बाथम, तुरहा, गोदिया, मांझी और मचुआ वो 13 जातियां हैं, जो मछुआरा समुदाय से आती है. बीजेपी का फोकस मुख्य तौर पर इन्हीं जातियों को अपने करीब लाने का है. इस तरह की कोशिश समाजवादी पार्टी के दो कार्यकाल में मुलायम सिंह से लेकर अखिलेश यादव ने भी की थी. लेकिन संवैधानिक व्यवस्था के आड़े आने की वजह से उनकी मंशा पूरी नहीं हो सकी.
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इस बार बीजेपी की मजबूत सरकार इस मकसद में कामयाब हो सकती है. यूपी में फिलहाल अनुसूचित जाति के अंतर्गत 66 जातियां आती हैं. अब 17 ओबीसी जातियों को शामिल करने से अनुसूचित जाति के अंतर्गत आने वाली जातियों की संख्या बढ़कर 83 ( 66+17= 83 ) हो जाएंगी.

17 ओबीसी जातियों का बड़ा राजनीतिक आधार है

मछुआरा समुदाय से संबंध रखने वाली इन जातियों को करीब लाने के पीछे बड़ा राजनीतिक गणित है. ये जातियां यूपी की कुल 403 विधानसभा सीटों में से करीब 100 सीटों पर अपना असर रखती हैं. उसमें भी अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 80 सीटों में से 60 पर इनका प्रभाव है. ज्यादातर विधानसभा सीटें गंगा किनारे से लगती हैं. लेकिन सवाल है कि ज्यादा जातियों के शामिल करने से इन 83 जातियों में असल फायदा किसे मिलेगा?

ये सवाल इसलिए भी जरूरी हो जाता है क्योंकि इसी आधार पर ओबीसी के वर्गीकरण की बात चल रही है. ओबीसी के 27 फीसदी आरक्षण का लाभ पिछड़ों में कुछ अगड़ी जातियां ही उठा रही हैं. यादव, कुर्मी, कोइरी जैसी जातियों ने ओबीसी आरक्षण का सबसे ज्यादा लाभ लिया है. जबकि ओबीसी में आने वाली बाकी जातियों को उतना फायदा नहीं मिला है. इसलिए बीजेपी सरकार ने ज्यादा पिछड़ी जातियों को लाभ दिलाने के लिए ओबीसी के बंटवारे के लिए जस्टिस रोहिणी कमिटी का गठन किया है. ओबीसी को तीन वर्गों में बांटकर 27 फीसदी आरक्षण का सबसे ज्यादा फायदा अति पिछड़ी जातियों को देने की तैयारी चल रही है. यूपी में क्या यही मुश्किल अनुसूचित जाति के साथ नहीं होगी? 83 अनुसूचित जातियों के नए गठजोड़ में जो जाति ज्यादा दबंग होगी, वो आरक्षण का ज्यादा फायदा उठा ले जाएंगी.

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जाटव और निषाद जातियां आमने-सामने आएंगी

2011 की जनगणना के मुताबिक यूपी की अऩुसूचित जातियों में जाटवों की जनसंख्या सबसे ज्यादा है. एससी की कुल आबादी में जाटव की हिस्सेदारी 54.23 फीसदी की है. दूसरे नंबर पर पासी समुदाय आता है, अनुसूचित जाति के भीतर इनकी आबादी 15.77 फीसदी है. जाटवों को मायावती का वोटर्स कहा जाता है. और ये कई इलाकों में अपना अच्छा खासा दखल रखते हैं.

अनुसूचित जाति में 17 नए ओबीसी जातियों के शामिल हो जाने के बाद ज्यादा संभावना है कि जाटवों और निषादों के बीच तनातनी होगी. बीजेपी निषादों पर अपना दांव आजमा रही है. बताया जा रहा है कि बीजेपी ने गोरखपुर उपचुनाव में हार के बाद निषाद समुदाय को अपने पाले में लाने की कोशिश में लगी हुई थी. गोरखपुर उपचुनाव में निषाद पार्टी ने एसपी-बीएसपी के साथ गठबंधन किया था और बीजेपी को शिकस्त दी थी.

इसके बाद लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने निषाद पार्टी को अपने पाले में ले आई थी. लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान इलाहाबाद में अमित शाह ने इस समुदाय को लक्ष्य कर वादा भी किया था कि उनकी पार्टी निषादराज की 80 फीट की प्रतिमा लगवाएगी. यूपी में जाट, जाटव, यादव और कुर्मी-पटेल के बाद अब निषादों ने संख्याबल के आधार पर अपनी आवाज बुलंद की है. अब अगर वो अनुसूचित जाति में शामिल हो गए तो जाटवों और निषादों के बीच आरक्षण का ज्यादा बड़ा हिस्सा हथियाने की जंग होगी.

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First published: July 5, 2019, 5:01 PM IST
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