17 OBC जातियों को SC में शामिल करने के पीछे क्या है बीजेपी की रणनीति?

17 ओबीसी जातियों को अनुसूचित जाति की लिस्ट में डालने के राजनीतिक नफा नुकसान दोनों है. बीजेपी ने बड़ा दांव चला है.

Vivek Anand | News18Hindi
Updated: July 3, 2019, 5:44 PM IST
17 OBC जातियों को SC में शामिल करने के पीछे क्या है बीजेपी की रणनीति?
17 ओबीसी जातियों को अनुसूचित जाति की लिस्ट में डालने के राजनीतिक नफा नुकसान दोनों है. बीजेपी ने बड़ा दांव चला है.
Vivek Anand | News18Hindi
Updated: July 3, 2019, 5:44 PM IST
केंद्रीय सामाजिक न्याय और आधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने भी मंगलवार को कह दिया है कि योगी सरकार ने जो किया है, वो ठीक नहीं है. यूपी में जिन 17 ओबीसी जातियों को अनुसूचित जाति (SC) में शामिल किया गया है वो किसी संवैधानिक तरीके से नहीं हुआ है. थावरचंद गहलोत ने राज्यसभा में जवाब देते हुए कहा है कि ये उचित नहीं है और राज्य सरकार को ऐसा नहीं करना चाहिए. राज्यसभा में इस मसले को बीएसपी के सतीशचंद्र मिश्रा ने उठाया था.

बीएसपी पहले ही यूपी सरकार के इस फैसले का विरोध कर रही है. सवाल है कि यूपी की बीजेपी सरकार ने ऐसा फैसला क्यों लिया? अब तक बीजेपी की स्ट्रैटजी ओबीसी जातियों में बंटवारे की थी. अब 17 ओबीसी जातियों को अनुसूचित जाति में डालने से बीजेपी को कितना फायदा मिल रहा है? कहीं यूपी सरकार इस फैसले से कुछ खास जातियों की नाराजगी मोल लेने का जोखिम तो नहीं ले रही हैं? इस बात को गंभीरता से समझने की जरूरत है.

पहला सवाल- ओबीसी की किन जातियों को अनुसूचित जाति की लिस्ट में डाला गया है?
जवाब- ये यूपी की अतिपिछड़ी जातियां हैं, जिनमें कश्यप, राजभर, धीवर, बिंद, कुम्हार, कहार, केवट, निषाद, भार, मल्लाह, प्रजापति, धीमर, बठाम, तुरहा, गोड़िया, मांझी और मचुआ जैसी जातियां शामिल हैं.

दूसरा सवाल- इससे बीजेपी को क्या फायदा मिलेगा?
जवाब- इन जातियों की यूपी में कुल आबादी करीब 15 फीसदी है. एससी की लिस्ट में आने से इन जातियों को सरकारी नौकरियों और शिक्षा में ओबीसी से ज्यादा फायदा मिलेगा. इन्हें टफ कंपीटिशन का सामना नहीं करना पड़ेगा. क्योंकि एससी जातियों की आबादी कम है. बीजेपी ने इन जातियों का दिल जीतने के लिए ये कदम उठाया है. यूपी में 12 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने वाले हैं. इन उप चुनावों में उसे सीधा फायदा मिलेगा. गैर यादव वोट बैंक पहले से ही बीजेपी के साथ है. 17 जातियों का नया गठबंधन बीजेपी को और मजबूती देगा.

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केंद्रीय सामाजिक न्याय और आधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत

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तीसरा सवाल- इससे बीजेपी को नुकसान क्या होगा?
जवाब- जो दलित बीजेपी के साथ आए हैं. वो इस फैसले से नाराज हो सकते हैं. बिना एससी आरक्षण का आधार बढ़ाए ओबीसी जातियों को जोड़ने से पहले से शामिल अनुसूचित जातियां बीजेपी से नाराज होंगी. खासकर गैर जाटव अनुसूचित जातियां जो बीजेपी के साथ गई थीं. वो अपना मूड बदल सकती हैं. इन 17 ओबीसी जातियों के बाहर की ओबीसी जातियां बीजेपी से नाराज होंगी. बीजेपी ने यादव वोटबैंक में भी सेंध लगाई थी. अब वो भी बीजेपी से मुंह मोड़ सकते हैं.

चौथा सवाल- जिस तरह से इस मसले की संवैधानिकता पर सवाल उठाया जा रहा है. क्या इन 17 ओबीसी जातियों का अनुसूचित जाति में शामिल होना मुमकिन भी है?
जवाब- इसके जवाब में समाजशास्त्री और डीयू के एसोसिएट प्रोफेसर सुबोध कुमार कहते हैं कि इस मसले में गंभीरता कम है. दरअसल बीजेपी ने चुनावी फायदे के लिए अचानक ये फैसला लिया है. अगर वो सचमुच में इस मसले पर गंभीर होते तो पहले केंद्र की समाज कल्याण और अधिकारिता मंत्रालय से संपर्क किया जाता. कितनी अजीब बात है कि योगी सरकार ऐसा फैसला लेती है और केंद्र सरकार के समाज और कल्याण मंत्री कहते हैं कि ये ठीक और संवैधानिक नहीं है. ये सिर्फ चुनावी फायदे के लिए किया जा रहा है. उसमें भी फायदा और नुकसान दोनों की संभावना है.

दूसरी बात ये भी है कि सरकार ने इसके पहले ओबीसी जातियों में बंटवारे के लिए जस्टिस रोहिणी कमीशन का गठन किया था. इस कमीशन को रिपोर्ट देनी थी कि आरक्षण की व्यवस्था के बाद किन जातियों ने कितना विकास किया है ताकि इन जातियों को दोबारा वर्गीकरण करके ओबीसी आरक्षण का सही तरीके से बंटवारा हो. बीजेपी की कोशिश ओबीसी को तीन वर्गों में बांटने की थी. अब ये अचानक 17 ओबीसी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने की मुहिम में लग गए. ये कंफ्यूजन की स्थिति है.

पांचवां सवाल- जैसे महाराष्ट्र में फडणवीस सरकार ने पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट को आधार बनाकर और हाईकोर्ट में तथ्यों पर बातकर मराठा आरक्षण को मंजूरी दिलवा ली. क्या संविधान की धारा 341 (1) का प्रयोग करके संवैधानिक तरीके से इन 17 जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल नहीं करवाया जा सकता.

जवाब- इसके जवाब में समाजशास्त्री सुबोध कुमार कहते हैं कि बिल्कुल ऐसा मुमकिन है. केंद्र और राज्य के समाज कल्याण मंत्रालय सलाह मशविरा करके और राज्यपाल के अनुमोदन के बाद अगर राष्ट्रपति मुहर लगवा दें तो ऐसा बिल्कुल हो सकता है. लेकिन सवाल है कि यूपी की बीजेपी सरकार ने ऐसा किया तो नहीं है. अगर सरकार गंभीर होती तो ऐसा ही करती. वहीं समाजशास्त्री और जेएनयू के एसोसिएट प्रोफेसर गंगा सहाय मीणा कहते हैं कि अनुसूचित जातियों का वर्गीकरण उनके सामाजिक पिछड़ेपन और छुआछूत जैसी सामाजिक बुराइयों की वजह से हुआ था. इसी आधार पर उन्हें आरक्षण जैसी सुविधा मिल रही है.

लेकिन अब ये सब चुनावी राजनीति का हिस्सा बन गया है. किसी भी जाति को जोड़ देना या निकाल देना. अब किसी समुदाय के पिछड़ेपन से इसका संबंध नहीं रह गया है. अगर किसी समुदाय के पिछड़ेपन के लिए अध्ययन होता है, कमीशन बैठता है, फिर रिपोर्ट आती है, उसके बाद इस तरह का फैसला आता है, तब तो बात समझ में आती है. लेकिन ऐसा तो हो नहीं रहा है. चुनावी राजनीति के फायदे के लिए ये सब किया जा रहा है.
First published: July 3, 2019, 5:15 PM IST
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