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क्यों शपथ लेने के चंद घंटों के भीतर US राष्ट्रपति ने जलवायु समझौते में वापसी पर दस्तखत किए?

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने वाइट हाउस में आते ही सबसे पहले पेरिस समझौते में वापसी की कार्रवाई की
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने वाइट हाउस में आते ही सबसे पहले पेरिस समझौते में वापसी की कार्रवाई की

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने वाइट हाउस में आते ही सबसे पहले पेरिस समझौते में वापसी (Joe Biden rejoins Paris climate agreement) की कार्रवाई की. समझें, क्या है ये समझौता, जो नए राष्ट्रपति के लिए इतना अहम है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 23, 2021, 11:09 AM IST
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बुधवार को राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के साथ ही जो बाइडन ने ट्रंप प्रशासन के दौरान हुए कई फैसलों की वापसी की बात की. इसी शुरुआत अंतर्राष्ट्रीय पेरिस जलवायु समझौते से हुई. बाइडन ने न केवल इस समझौते पर वापसी के लिए कार्यकारी आदेश पर दस्तखत किए, बल्कि साल 2050 तक अमेरिका का कार्बन उत्सर्जन शून्य करने की बात कह डाली.

पहले से ही लोगों में था आक्रोश
पहले से ही पेरिस समझौते से अमेरिका के अलग होने को लेकर तत्कालीन राष्ट्रपति कटघरे में थे. यहां तक कि ट्रंप के खिलाफ चुनावी प्रचार कर रहे बड़े खेमे का मानना था कि ट्रंप से पेरिस समझौते से अलग होकर बड़ी भूल की है, जिसका नतीजा वो चुनाव परिणामों में देखेंगे. अब ट्रंप की हार के बाद ये समझौता दोबारा सुर्खियों में है क्योंकि मुस्लिम देशों से ट्रैवल बैन हटाने के अलावा बाइडन ने जो काम सबसे पहले किया, वो इसी समझौते में दोबारा शामिल होना है.

joe biden
बाइडन की हामी के साथ अमेरिका दोबारा पेरिस समझौते का हिस्सा बन चुका

क्या है पेरिस समझौता


क्लाइमेट चेंज पर लगातार बढ़ती चिंता के बीच साल 2015 के नवंबर-दिसंबर में पेरिस में 195 देश जमा हुए. वहां ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के मकसद से ग्लोबल समझौता हुआ. इसे ही पेरिस समझौते के नाम से जाना जाता है. इसके तहत तय हुआ कि ग्लोबल तापमान में बढ़ोत्तरी 2 डिग्री सेल्सियस के भीतर सीमित रहे. जमा हुए ज्यादातर देशों ने इसके लिए लिखित अनुमति दे दी. बता दें कि पेरिस संधि पर शुरुआत में ही 177 सदस्यों ने हस्ताक्षर कर दिए थे.

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काफी ढील बरती गई
ये पहली बार हुआ जब किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते के पहले ही दिन इतनी बड़ी संख्या में सदस्यों ने सहमति जताई थी. हालांकि पेरिस समझौता उतने प्रभावी तरीके से लागू नहीं हो सका क्योंकि इसमें सदस्य देशों पर निर्भर था कि वे कार्बन कटौती के लिए क्या तरीके अपनाते हैं. साथ ही टारगेट पूरा न हो पाने पर यानी जरूरत से ज्यादा कार्बन उत्सर्जन पर किसी तरह के जुर्माने का भी कोई प्रावधान नहीं था. सभी देशों द्वारा स्वेच्छा से इस ओर ध्यान देने की बात की गई. यही वजह है कि सभी देशों ने अपने-अपने तरीके से ये किया. सभी देश आर्थिक उन्नति के लिए लगातार उद्योग बढ़ाते गए और उत्सर्जन बढ़ता ही गया.

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खुद अमेरिका भी प्रदूषण के मामले में ग्लोबल स्तर पर दूसरे नंबर पर रहा - सांकेतिक फोटो (pixabay)


दूसरों पर लगाए आरोप 
ऐसे में जब ट्रंप ने भी पेरिस समझौते से अलगाव किया तो इसे पर्यावरण के साथ खिलवाड़ माना गया. बता दें कि उन्होंने साल 2019 में आधिकारिक तौर पर पेरिस समझौता तोड़ दिया था. इतना ही नहीं, समझौता तोड़ते हुए ट्रंप ने दूसरे देशों को आरोपों के घेरे में भी खड़ा कर दिया.

क्यों अलग हुआ था अमेरिका
ट्रंप का कहना था कि अमेरिका अकेला ही जलवायु परिवर्तन को कंट्रोल करने की कोशिश करता रहा, जिसके कारण उद्योग घाटे में जाने के कारण बंद हो गए, लोग बेरोजगार हो गए.इसके उलट समझौते से जुड़े ज्यादातर देश कोयले से अपने उद्योग चलाते रहे, इससे उनके धन की बचत भी हुई और वे आगे भी निकले.

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ट्रंप ने आरोप लगाया कि चीन और भारत तक अरबों डॉलर मदद लेकर समझौते में आए और वैसे रिजल्ट नहीं दे रहे. दोनों देशों में कोयले से बिजली कारखाने चल रहे हैं और इसी तरह से वे अमेरिका से आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं.

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ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के मकसद से ग्लोबल समझौता हुआ- सांकेतिक फोटो (needpix)


अमेरिका प्रदूषण में दूसरे स्थान पर
वैसे चीन पर तो ट्रंप का आरोप कुछ हद तक सही भी था लेकिन खुद अमेरिका भी प्रदूषण के मामले में ग्लोबल स्तर पर दूसरे नंबर पर रहा. ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक चीन प्रदूषण के मामले में 26 प्रतिशत के साथ सबसे ऊपर है. वहीं अमेरिका भी 15 प्रतिशत के साथ दूसरे नंबर पर है. तीसरे नंबर पर यूरोपियन यूनियन आता है. कुल मिलाकर पूरी दुनिया के प्रदूषण में इन्हीं तीन हिस्सों की लगभग 58 फीसदी हिस्सेदारी है.

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बाइडन की हामी के साथ अमेरिका दोबारा पेरिस समझौते का हिस्सा बन चुका है. साइंटिफिक अमेरिकन के मुताबिक 19 फरवरी को देश आधिकारिक रूप से इससे जुड़ जाएगा. यानी ट्रंप के समझौते से अलग होने के पूरे 107 दिनों बाद. अब बाइडन ने अगले 30 सालों के लिए क्लाइमेट पर अमेरिकी नीति तैयार करने की बात की है. इसके तहत 2030 तक कार्बन एमिशन 1.5 और 2050 तक शून्य करने की  बात है.
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