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COVID-19: ठीक हुए मरीजों का खून बचाएगा जान, 100 साल पुरानी पद्धति ने दिखाई राह

Vikas Sharma | News18Hindi
Updated: March 25, 2020, 8:17 PM IST
COVID-19: ठीक हुए मरीजों का खून बचाएगा जान, 100 साल पुरानी पद्धति ने दिखाई राह
Coronavirus के कहर के बीच अमेरिका में शोधकर्ता एंटीबॉटी प्लाज्मा पद्धति से कोविड-19 के इलाज की तैयारी कर रहे हैं. इससे उन्हें अच्छे नतीजे मिलने की उम्मीद है.

 Coronavirus के कहर के बीच अमेरिका में शोधकर्ता एंटीबॉटी प्लाज्मा पद्धति से कोविड-19 के इलाज की तैयारी कर रहे हैं. इससे उन्हें अच्छे नतीजे मिलने की उम्मीद है.

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  • Last Updated: March 25, 2020, 8:17 PM IST
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नई दिल्ली. अमेरिका में कोरोना वायरस के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. आलम यह है कि विश्व स्वाथ्य संगठन को डर है कि वहां हालात यूरोप से भी गंभीर न हो जाएं. ऐसे में अमरीकी शोधकर्तों के लिए एक आस बंधी है जिससे वे दवा और टीके का इंतजार किए बिना ही लोगों को अस्पताल से जल्दी छुट्टी दे सकते हैं.

न्यूयार्क में हो रही है तैयारी
साइंस वेबसाइट नेचर में प्रकाशित एक लेख के मुताबिक न्यूयार्क के अस्पताल इस बात की तैयारी कर रहे हैं कि कोविड-19 बीमारी से बचे हुए लोगों के खून में से वे संभावित एंटीडोट से अन्य मरीजों को ठीक कर सकें.

कैसे ठीक हो सकता है इससे मरीज



यह एक सौ साल पुरानी पद्धति है जिसमें मरीज को एंटीबॉडी वाला वह खून दिया जाता है जो उस  व्यक्ति का होता है जो उस बीमारी से अपनी प्रतिरोधक क्षमता से बच गया हो. शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि जिस तरह अमरिकी शहरों में तेजी से कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं. वे अपने शहरों में इटली जैसे हालात पैदा नहीं होने देना चाहते जहां के अस्पतालों के आईसीयू में क्षमता से ज्यादा लोग हो रहे हैं. इटली में डॉक्टर उन मरीजों को लौटाने लगे हैं, जिन्हें  वेंटीलेटर की जरूरत है.

चीन में भी हो चुकी हैं इस तरह की कोशिशें
चीन में भी इस तरह की कोशिशें हुई हैं.  कॉन्वलेसेंट प्लाज्मा नाम की प्रक्रिया में ठीक हो चुके मरीजों के खून में से वह हिस्सा निकाला जाता है जिसमें एंटीबॉडी तो होती है, लेकिन रेड ब्लड सेल्स नहीं होते. इस तकनीक के निर्णायक नतीजे सामने नहीं आए हैं.  इस तकनीक का उपयोग सार्स और इबोला जैसी महामारियों के दौरान भी किया गया था. तब भी इसमें बहुत ज्यादा सफलता नहीं मिली थी, फिर भी  इससे अमरीकी शोधकर्ता उपचार के और ज्यादा कारगर होने की उम्मीद कर रहे हैं.

कॉन्वलेसेंट प्लाज्मा का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसके लिए दवाओं और टीके का इंतजार नहीं करना पड़ेगा.
कॉन्वलेसेंट प्लाज्मा का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसके लिए दवाओं और टीके का इंतजार नहीं करना पड़ेगा.


क्या फायदा है कॉन्वलेसेंट प्लाज्मा का
कॉन्वलेसेंट प्लाज्मा का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसके लिए दवाओं और टीके का इंतजार नहीं करना पड़ेगा. अभी तक वैज्ञानिक कोरोना वायरस की कोई सटीक दवा और टीका नहीं ढूंढ सके हैं और इनके विकसित होने और लोगों तक पहुंचने में काफी समय लगेगा.  मरीज के खून में एंटीबॉडी देना तुलनात्मक रूप से सुरक्षित है बशर्ते उसे देने से पहले उसकी पूरी और सही जांचें हो जाएं.

यह फायदा होने की है उम्मीद
मिनेसोटा में रोचेस्टर के मेयो क्लीनिक (Mayo Clinic in Rochester, Minnesota) में एनेस्थेसियोलॉजिस्ट और मनोविज्ञानी माइकल जॉयनर (Michael Joyner) का मानना है कि अगर वे हर मरीज को आईसीयू से बाहर रखने में कामयाब हो गए तो यह एक बड़ी सफलता होगी. उन्होंने कहा, “हमें इसे काम में लेना ही होगा और वह भी जितनी जल्दी हो सके. साथ ही यह दुआ करनी होगी कि न्यूयार्क जैसी जगह में बहुत ज्यादा मरीजों की भीड़ न हो जाए.”

सोमवार को ही न्यूयार्क में कॉन्वलेसेंट प्लाज्मा के उपयोग की योजना को हरी झंडी दे दी गई है जहां 25000 से ज्यादा संक्रमित मरीज हो गए हैं जबकि मरने वालों की संख्या 210 हो गई है. पहले चरण में यह प्रक्रिया उन्हीं लोगों पर आजमाई जाएगी जिनके ठीक होने की संभावना ज्यादा है. उसके बाद शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि यह उन लोगों पर भी आजमाया जा सकता जिन्हें संक्रमण की ज्यादा संभावना है जैसे कि हॉस्पिटल में काम करने वाले डॉक्टर और नर्सें.  इससे लोगों के इलाज में बाधा नहीं आएगी.

अमेरिका इस बात की भी योजना बना रहा है कि इलाज में कितना फायदा मिल रहा है इसकी जानकारी जल्दी से बाकी संबंधित शोधकर्ताओं और इलाज कर रहे अन्य अस्पतालों को भी मिल सके. ऐसे मुश्किल हालातों में  स्वस्थ हो चुके मरीजों का खून मिलना किसी भी दवाई के बजाए आसान और सस्ता होगा.

क्या है यह पद्धति
वैज्ञानिक इस पद्धति को पैसिव एंटीबॉडी थैरेपी कहते हैं.  इसमें मरीज को एंटीबॉडी उसके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता से नहीं बल्कि  बाहर से मिलती है जैसा कि टीके में होता है. इस पद्धति का पहला उपयोग साल 1890 में हुआ था. इसके बाद 1918 में एचवनएवन इन्फ्लूएंजा महामारी के दौरान 1700 मरीजों पर इस आजमाया गया था. लेकिन इसके बाद भी इस पद्धति को लेकर सटीक नतीजे नहीं निकल सके.

साल 2002-03 में फैले सार्स वायरस के प्रसार के दौरान भी हॉन्गकॉन्ग में 80 मरीज पर कॉन्वलेसेंट सिरम का प्रयोग किया गया था जिनमें ठीक होने के बेहतर लक्षण पाए गए थे. इसी तरह अफ्रीका में 1995 में फैले इबोला वायरस के मामले में भी इस पद्धति का उपयोग हुआ था. कांगो के कुछ मरीजों पर इसका सफलतापूर्वक उपयोग किया गया था, लेकिन इन मरीजों की संख्या कम थी.

इस तरीके होता प्रयोग तो बेहतर नतीजे मिलते
बाल्टीमोर की जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी (Johns Hopkins University in Baltimore) के इम्यूनोलॉजिस्ट एट्यूरो कसाडेवाल (Arturo Casadevall) जनवरी से ही इस कोविड-19 पर शोध कर रहे हैं. उनका मानना है कि अगर इस पद्धति का उपयोग उन्हीं लोगों पर होता जो बीमारी के प्रथम चरण में हैं, तो इसके नतीजे शानदार हो सकते थे. इसके लिए वे कई अखबारों, पत्रिकाओं में लेख लिख चुके हैं और अब उनके इस विचार को समर्थन भी मिल रहा है.

कसाडेवाल से करीब 100 शोधकर्ता जुड़ चुके हैं जो अलग-अगल यूनिवर्सिटियों से ताल्लुक रखते हैं. जॉयनर भी उनमें से एक हैं. ठीक हो चुके मरीजों का खून लेने के लिए संबंधित टेस्ट तैयार होने को हैं.  क्लीनिक ट्रायल के लिए सरकारी संस्थाओं को आवेदन भेजा जा चुके हैं.

इन सब प्रयासों का नतीजा यह है कि कॉन्वलेसेंट प्लाज्मा परीक्षण दवाई के तौर पर स्वीकार कर ली गई है.   अब डॉक्टर मरीजों को इसका विकल्प दे सकते हैं.

आगे सकारात्मक नतीजे आ सकते हैं
वैसे तो कॉन्वलेसेंट प्लाज्मा का प्रयोग फरवरी से शुरू हो गया था लेकिन अभी इसके निर्णायक नतीजे आने है.  अब उम्मीद की जा रही है कि इसका बड़े पैमाने पर व्यवस्थित उपयोग भविष्य के लिए नई राह दिखा जाए.

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First published: March 25, 2020, 8:17 PM IST
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