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यूपी चुनाव: हर जाति वर्ग पर खास पार्टी का प्रभाव! प्रियंका के लिए कहां है जगह?

यूपी चुनाव: हर जाति वर्ग पर खास पार्टी का प्रभाव! प्रियंका के लिए कहां है जगह?

Priyanka Gandhi and Congress Future in UP Election: बीते करीब तीन दशक से कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में जमीन की तलाश है. 1990 के दशक में शुरू मंडल-कमंडल की राजनीति में कांग्रेस पार्टी को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ.

Priyanka Gandhi and Congress Future in UP Election: बीते करीब तीन दशक से कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में जमीन की तलाश है. 1990 के दशक में शुरू मंडल-कमंडल की राजनीति में कांग्रेस पार्टी को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ.

Priyanka Gandhi and Congress Future in UP Election: बीते करीब तीन दशक से कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में जमीन की तलाश है. 1990 के दशक में शुरू मंडल-कमंडल की राजनीति में कांग्रेस पार्टी को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ.

उत्तर प्रदेश में बीते कुछ महीनों से कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी की सक्रियता ने राज्य में पार्टी की बदहाली की ओर हर किसी का ध्यान खींचा है. हर किसी की जुबां पर यही सवाल है कि क्या प्रियंका की सक्रियता चुनावी नतीजे में बदलाव ला पाएगी? क्या पार्टी अपने प्रदर्शन में सुधार कर पाएगी? इस सवाल का जवाब जानने के लिए आपको उत्तर प्रदेश की राजनीति में धर्म और जाति के कॉकटेल को समझना पड़ेगा.

जाति और धर्म है उत्तर प्रदेश की राजनीति की सच्चाई
विकास और प्रगति की चाहें कितनी भी बातें कर ली जाए, लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति को जाति और धर्म के बिना समझना मुश्किल है. मौजूदा समय में राज्य की करीब 70-75 फीसदी आबादी किसी न किसी खास पार्टी से प्रभावित है. यह ट्रेंड बीते करीब तीन दशक से बना हुआ है. यही कारण है कि राज्य में बीते तीन दशक से कांग्रेस पार्टी अपनी जमीन तलाश कर रही है, लेकिन उसे कोई ठिकाना नहीं मिल रहा है.

वर्ष 2017 और वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव
साल 2017 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो भाजपा को 39.67 फीसदी, सपा को 22.23 फीसदी, बसपा को 21.82 फीसदी वोट मिले थे. कांग्रेस को 6.25 फीसदी वोट मिले थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़े गए उस चुनाव में 2012 की तुलना में वोट प्रतिशत के मामले में सबसे ज्यादा फायदा भाजपा को (24.7 फीसदी अंक अधिक वोट मिले) और सबसे अधिक नुकसान बसपा को (7.7 फीसदी अंक कम वोट मिले) हुआ था. वहीं कांग्रेस के वोट प्रतिशत में भी काफी कमी आई. पार्टी के वोट प्रतिशत में 5.4 फीसदी अंकों की गिरावट आई. सपा के वोट प्रतिशत में केवल 3.7 फीसदी अंकों की गिरावट आई. इन तीनों पार्टियों के कुल वोट प्रतिशत में करीब 17 फीसदी अंकों की गिरावट दर्ज की गई. इसके अलावा अन्य छोटी-छोटी पार्टियों के भी वोट प्रतिशत गिरे, जिसकी वजह से भाजपा के वोट फीसद में 24 फीसदी से अधिक का इजाफा हुआ.

खास जाति और धर्म पर तीन प्रमुख दलों का कब्जा
राज्य की राजनीति पर नजर रखने वाले इससे इनकार नहीं कर सकते कि राज्य की प्रमुख तीन पार्टियां भाजपा, सपा और बसपा का अपना एक सॉलिड वोट बैंक है. उनके हार्डकोर वोटर्स हैं, जो किसी भी स्थिति में अपनी पार्टी से अलग नहीं होते हैं. यहीं पर कांग्रेस पार्टी मार खा जा रही है. उसके पास कोई सॉलिड वोट बैंक नहीं है.

गैर यादव ओबीसी भाजपा के साथ!
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद सभी चुनावों में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में एक खास वोट बैंक को विकसित किया. वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन भाजपा प्रभारी अमित शाह ने इस समीकरण का इजाद किया और यही समीकरण उसके बाद सभी चुनावों में भाजपा की जीत का आधार रहा है. भाजपा ने राज्य में गैर यादव ओबीसी वोटों पर दांव लगाया. इसके साथ ही उसके पास हिंदुत्व के नाम पर मिलने वाला वोट पहले से था.

सपा का वोट प्रतिशत करीब-करीब बरकरार
उत्तर प्रदेश की राजनीति में सपा भी अपने वोट बैंक पर पकड़ रखती है. 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के वोट प्रतिशत पर बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ा. उसे उस चुनाव में 2012 की तुलना में केवल 3.7 फीसदी कम वोट मिले. राज्य में यादव और मुस्लिम समुदाय को सपा का अहम वोट बैंक माना जाता है.

बसपा को नुकसान
2017 के चुनाव में वोट प्रतिशत में बसपा को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा था. उसे 2012 के चुनाव की तुलना में 7.7 फीसदी कम वोट मिले. लेकिन फिर भी बसपा का वोट प्रतिशत 22 फीसदी के आसपास बना रहा.

30 साल से है कांग्रेस को सॉलिड वोट बैंक की तलाश
5 दिसंबर 1989 को उत्तर प्रदेश में नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व वाली अंतिम कांग्रेस सरकार का पतन हो गया. इसके बाद राज्य में शुरू हुए मंडल और कमंडल की राजनीति में कांग्रेस पार्टी कोसों दूर चली गई. इस राजनीति में उसके कोर वोटर बिखर गए. पिछड़ी और दलित जातियों का सबसे बड़ा वोट बैंक सपा और बसपा के साथ चला गया, तो अगड़ी जातियों खासकर ब्राह्मण समुदाय भाजपा की तरफ हो गया. ऐसा तब हुआ जब कांग्रेस पार्टी ने उत्तर प्रदेश को पांच ब्राह्मण मुख्यमंत्री दिए थे.

कांग्रेस का पतन शुरू
हिदुत्व और जाति की इस राजनीति में कांग्रेस पिछड़ती चली गई. उसके बाद से आज तक यह पार्टी इस समीकरण की कोई काट नहीं ढूंढ पाई है. कांग्रेस जाति और धर्म से परे एक वैकल्पिक वोट बैंक बनाने की लगातार कोशिश करती रही, लेकिन उसमें उसे सफलता नहीं मिली.

प्रियंका का फॉर्मूला होगा कामयाब!
यही कारण है कि जाति और धर्म के नाम पर बंटे उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी अपना नया वोट बैंक बनाने की कोशिश कर रही हैं. इसके लिए वह जाति और धर्म से परे रहते हुए वर्ग और महिला सशक्तीकरण की राजनीति करना चाहती हैं. वह महिलाओं को 40 फीसदी टिकट देने की बात कह रही हैं. वह किसानों के कर्जे माफ करने और लड़कियों को स्कूल और मोबाइल फोन देने की बात कह रही हैं. लेकिन सवाल घूम फिर कर वहीं आ जाता है कि क्या महिलाएं और किसान जाति और धर्म के आधार पर वोट नहीं करते?

Tags: All India Mahila Congress, Congress, Priyanka gandhi

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