Uttarakhand disaster: क्यों देश में नया खतरा बन सकते हैं सैकड़ों पुराने बांध

बड़े बांध (Big Dams) से होने वाले नुकसान का खतरा अब डराने लगा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

बड़े बांध (Big Dams) से होने वाले नुकसान का खतरा अब डराने लगा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

उत्तराखंड हादसे (Uttarakhand disaster) ने देश को कई सबक दिए हैं लेकिन क्या वाकई देश के पुराने बांधों (Old Dams) से खतरा होता है या फिर गड़बड़ी कहीं और है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 11, 2021, 1:54 PM IST
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हाल ही में उत्तराखंड (Uttarakhand) के चमोली जिले में ग्लेशियर टूटने के बात एक बांध टूटा और बाढ़ से एक भयंकर तबाही मची. हिमालय (Himalaya) की गोद में हुई इस हादसे ने देश ही नहीं पूरी दुनिया में हलचल मचा दी. मीडिया, अखबारों में विशेषज्ञों ने इसके कारणों पर अपनी अपनी राय दी, तो बहुत सारे गड़े मुर्दे भी उखड़ने लगे. किसी से 5 साल पहले इन इलाकों में जलपरियोजनाओं और बांध लगाने का अपने विरोध को याद दिलाया तो किसी की जताई आपत्ति का जिक्र सामने आया.अब यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या भारत में सैंकड़ों बड़े बांध वाकई हमारे लिए बहुत बड़ा खतरा बन गए हैं.

किन बातों का ध्यान रखा जाता है नियोजन के समय

आमतौर पर जब भी किसी जल विद्युत परियोजना की परिकल्पना कर उसका नियोजन किया जाता है तो उसमें  इन योजनाओं के प्रभावों का भी अध्ययन शामिल किया जाता है. इसमें स्थानीय जनसमूह, अन्य सामाजिक प्रभाव,  के साथ साथ वन, जैवविविधता, कृषि भूमि  आदि के संभावित  नुकसान को भी शामिल किया जाता है और उसकी तुलना परियोजनाओं से होने वाले फायदे से की जाती है.

इस बात का भी रखा जाता है ध्यान
गौरतलब है कि तकनीकी तौर पर इस बात का भी अध्ययन होता है. जब किसी परियोजना का उम्र पूरी हो जाएगी और उसे खत्म करने या उसके खत्म होने की स्थिति आएगी तब  होने वाले नुकसान को न्यूनतम कैसे किया जा सकेगा और आसपास के इलाकों की सुरक्षा व्यवस्था की भी तैयारी की व्यवास्था पहले से जाती है.

लोगों की शामिल करना

ऐसे में इन बड़ी योजनाओं में स्थानीय लोगों से कितनी बातचीत होती है और उन्हें इसमें किस हद तक शामिल किया जाता है यह अहम सवाल है. भारतीय हिमालयी क्षेत्र पहले ही बहुत संवेदनशील इलाका घोषित हो चुका है. ऐसे में बड़े बांधों के निर्माण के बजाय लघु पनबिजली परियोजनाओं के लिए स्थानीय निवासियों के साथ पर्यावरणविद भी ज्यादा सहमत दिखते हैं.



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बड़े बांध (Big Dams) को लेकर लोगों की आशंकाओं में बदलाव आता रहता है. प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


पहले पहले विरोध फिर फायदे और खतरे पर विरोध?

डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट में हिमायल की कुछ जलविद्युत परियोजनाओं के आंकलन में बताया गया है कि परियोजनाओं  निर्माण के समय लोग उसका विरोध करते हैं.  फिर लोगों का ध्यान परियोजनाओं से होने वाले फायदे की ओर चला जाता है. जिससे लोग परियोजनाओं और उसकी वजह से होने वाले विकास कार्यों से जुड़ने में झिझक महसूस नहीं करते हैं. लेकिन बाद मे जब परियोजनाओं के नुकसान साइड इफेक्ट के तौर पर सामाने आने लगते हैं तो वे इसका विरोध करते हैं.

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बड़े बांधों के प्रति बढ़ता डर

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि बड़े बांध दुनिया भर में अब पर्यावरण के पूरी तरह अनुकूल तो दूर उससे समन्वय करती गतिविधि भी नहीं माने जाते हैं. शायद यही वजह है कि अब जगह जगह लघुपनबिजली परियोजनाओं प्रति लोग और पर्यावरणविदों को उतनी आशंका नहीं रहती है.

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कई इलकों में पानी को जमा करना (Reservoir) बड़े भूकंप (Earthquake) को न्योता देना हो सकता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


ये चुनौतियां भी

बांधों से कई तरह की चुनौतियां हैं. नीचे की जमीन पर दबाव भूकंप का खतरा लाता है. भूकंप संभावित इलाकों में यह बहुत ही खतरनाक मुद्दा बन जाता है. पानी के बहाव का रुकना मछलियों और जीव जंतुओं का आवागमन पर रोक लगाता है. यह गंगा नदी के बहुत सटीक है जहां मछलियां उत्तराखंड से बंगाल तक आवागमन करती हैं. बांध के बाद डूब में आने वाले इलाके का पर्यवरणीय नुकसान एक अहम पहलू है.

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देखा जाए तो यह समस्या प्रबंधन और सही नियोजन की ज्यादा है. नियोजन के समय सभी, खास तौर पर पर्यावरणीय पहलुओं का सही और निष्पक्ष आंकलन, स्थानीय और प्रभावित लोगों को शामिल करने की प्रक्रियाएं और संभावित आपदा से निपटने के लिए एक सक्षम व्यवस्था का निर्माण बांधों के डर को खत्म कर सकते हैं.
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