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Explained: कैसे मिलती है वैक्सीन को मंजूरी, Covaxin को लेकर क्यों उठे सवाल?

कोवैक्सीन अब तक सारे सुरक्षा मानकों पर सही उतरी- सांकेतिक फोटो ( news19 creative)
कोवैक्सीन अब तक सारे सुरक्षा मानकों पर सही उतरी- सांकेतिक फोटो ( news19 creative)

वैक्सीन के ह्यूमन ट्रायल (human trial of vaccine) के दौरान न केवल उसका असरदार होना देखा जाता है, बल्कि साइड इफेक्ट भी देख जाते हैं. ये लंबी प्रोसेस है, वहीं कोवैक्सिन (Covaxin) को लेकर विपक्ष सवाल उठा रहा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 4, 2021, 7:23 PM IST
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अब देश में वैक्सीन को लेकर भी राजनैतिक उठापटक हो रही है. विपक्षी नेताओं ने ड्राई रन जैसी पक्की तैयारी के बीच भारत में बनी कोवैक्सिन को लेकर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि वैक्सीन को लेकर प्रोटोकॉल पूरे करने की बजाए आनन-फानन मंजूरी मिली. जानिए, किन चरणों के बाद किसी वैक्सीन को मंजूरी मिलती है और कोवैक्सिन कहां खड़ी है.

वैक्सीन तैयार करने के बाद क्लिनिकल ट्रायल सबसे अहम है. इसके तहत देखा जाता है कि वैक्सीन का असर कैसा है, साथ ही गंभीर साइड इफेक्ट तो नहीं. यानी इस दौरान सेफ्टी और असर दोनों की जांच होती है. ट्रायल तीन मुख्य चरणों में होता है. हर चरण पहले स्टेप की सफलता या असफलता पर आगे बढ़ता है.

पहला चरण फेज जीरो (phase 0) कहलाता है. इसमें बहुत छोटे समूह को लिया जाता है, जैसे 11 से 15 व्यक्ति. ट्रायल में शामिल लोगों पर दवा या वैक्सीन का डोज काफी कम मात्रा में दिया जाता है, सिर्फ ये जांचने के लिए कि कहीं इसका कोई खतरनाक असर तो नहीं हो रहा. अगर असर ठीक न दिखे तो ट्रायल बंद करके वैज्ञानिक दोबारा रिसर्च करते हैं.



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वैक्सीन तैयार करने के बाद क्लिनिकल ट्रायल सबसे अहम है- सांकेतिक फोटो

दूसरे चरण यानी फेज 1 (phase I) क्लिनिकल परीक्षण के दौरान लगभग 20 से 80 लोगों पर जांचकर्ता कई महीनों तक दवा के प्रभाव को देखते हैं. ये वो लोग होते हैं जो सेहतमंद हों. इस स्टेप का मकसद इस बात की जांच करना है कि दवा या वैक्सीन की ज्यादा खुराक या कितनी ज्यादा खुराक ली जाए, जिसका शरीर पर कोई साइड इफेक्ट न हो. इस दौरान बहुत बारीकी से देखा जाता है कि शरीर दवा पर कैसे प्रतिक्रिया करते हैं.

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ये भी हो सकता है कि प्री रिसर्च और फेज जीरो में जो परिणाम दिखे हों, इस स्टेप के नतीजे उससे एकदम अलग हों. असर खराब होने पर ट्रायल रोकना होता है. यही वो फेज है, जिसमें ये तय होता है कि दवा को कैसे दिया जाए, जिससे वो ज्यादा असर करे यानी सीरप के रूप में, कैप्सूल की तरह या फिर नसों के जरिए.

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तीसरे चरण को फेज 2 (phase II) ट्रायल कहते हैं. इसमें वे मरीज शामिल होते हैं, जिनकी सेहत के लिए दवा या वैक्सीन तैयार की जा रही है. उन्हें आमतौर पर वही डोज दिया जाता है तो इससे पहले वाले चरण में मरीजों को दिया गया था. इस फेज के दौरान शोधकर्ता प्रतिभागियों को कई महीनों से लेकर साल-सालभर भी देखते हैं कि दवा का उनके शरीर पर लंबे समय में क्या असर दिख रहा है. क्रॉनिक बीमारियों जैसे कैंसर की दवा का ट्रायल इसी तरह चलता है. Food and Drug Administration (FDA) के मुताबिक इस चरण में आने के बाद लगभग 33% दवाएं या वैक्सीन अगले फेज में पहुंच पाते हैं.

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तीसरे चरण यानी phase III में सबसे ज्यादा लोगों पर प्रयोग होता है- सांकेतिक फोटो (pixabay)


तीसरे चरण यानी phase III में सबसे ज्यादा लोगों पर प्रयोग होता है. इसके तहत 3 हजार से ज्यादा लोग लिए जाते हैं, जो बीमार हों. ये फेस कई सालों तक चलता है जिसमें बारीकी से असर देखा जाता है. इस फेज का मकसद ये देखना है कि किसी खास बीमारी पर मौजूदा दवाओं की तुलना में नई दवा कैसा असर कर रही है. हालांकि इस ट्रायल तक पहुंचने के लिए शोध करने वालों को ये साबित करना होता है कि दवा सेफ है और उसका असर मौजूदा दवा से ज्यादा नहीं होगा तो कम भी नहीं होगा.

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इसके लिए एक खास प्रक्रिया अपनाई जाती है, जिसे randomization कहते हैं. इसमें दो ग्रुप बनाए जाते हैं. एक समूह को मौजूदा यानी पहले से चली आ रही दवा दी जाती है और दूसरे ग्रुप को नई दवा दी जाती है. हालांकि खुद वैज्ञानिकों को ये नहीं पता होता कि कौन सा समूह कौन सी दवा ले रहा है. इससे नतीजे आने पर वैज्ञानिक बिना किसी पूर्वाग्रह के देख पाते हैं कि असल में किस दवा का असर ज्यादा है.

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मुश्किल से 25 से 30% दवाएं ही तीसरे चरण तक पहंच पाती हैं-सांकेतिक फोटो (pixabay)


इसके बाद वाले चरण तक पहुंचते हुए काफी छंटनी हो जाती है और Food and Drug Administration (FDA) के मुताबिक मुश्किल से 25 से 30% दवाएं ही अगले चरण तक पहंच पाती हैं. चौथे और आखिरी चरण (phase IV) की शुरुआत तब होती है, जब FDA दवा या टीके को अप्रूव कर चुका हो. ये बाजार में भी आ चुकी होती है. लेकिन इसके बाद भी लंबे समय तक चलने वाली दवा के साइड इफेक्ट को समझने के लिए ये चरण होता है. इसमें हजारों प्रतिभागियों पर कई सालों तक दवा के असर की स्टडी होती है और ये देखा जाता है कि इससे उनके शरीर में क्या बदलाव आए.

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यानी कुल मिलाकर अगर टीका तीसरे चरण तक पहुंच चुका है, तो WHO उसके इमरजेंसी इस्तेमाल की मंजूरी दे देता है. अब बात करते हैं देसी वैक्सीन कोवैक्सिन की. तो खुद कंपनी के मुताबिक फिलहाल तीसरे चरण का ट्रायल चल रहा है. इसमें लगभग 6 हफ्ते लग सकते हैं. इधर सरकार ने भी तीसरे चरण के खत्म होने का दावा नहीं किया, बल्कि वो यही कह रही है कि वैक्सीन अब तक सारे सुरक्षा मानकों पर सही उतरी, इसलिए उसके इमरजेंसी इस्तेमाल की इजाजत दी जा रही है.
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