वो जानलेवा बीमारियां, वैक्सीन के कारण जिनके नाम तक भूल चुके हम

वो जानलेवा बीमारियां, वैक्सीन के कारण जिनके नाम तक भूल चुके हम
पोलियो की बीमारी 1950 के दौरान सबसे खतरनाक बीमारी थी

ताकतवर होने के बाद भी तब अमेरिका में पोलियो का खौफ (Terror of Polio) परमाणु बम के बाद सबसे ज्यादा था. तब पोलियो से बचाने के लिए नाक में एसिड स्प्रे होने लगा. इसका नतीजा और खतरनाक हुआ.

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कोरोना की वैक्सीन को लेकर फिलहाल सबसे ज्यादा बात हो रही है. ये कब आएगी और कब तक आम लोगों में पहुंचेगी, इसपर चर्चा हो रही है. बहुतों को ये भी लग रहा है कि सात महीने होने को आए लेकिन अब तक वैक्सीन नहीं बन सकी. ऐसे में ये जानना जरूरी है कि वैक्सीन बनाना महीनों नहीं, बल्कि कई सालों तक चलने वाली प्रक्रिया है. इबोला को ही लें तो इसकी वैक्सीन बनाने में लगभग 14 साल लगे थे. एक बार सफल वैक्सीन तैयार हो जाए, तो बीमार पर नियंत्रण होते वक्त नहीं लगता. कई ऐसी बीमारियां हैं, जिनके बारे में वैक्सीन की वजह से हम लगभग भूल ही चुके हैं. ये बीमारियां एक वक्त पर जानलेवा हुआ करती थीं.

पोलियो का खौफ
ये बीमारी 1950 के दौरान सबसे खतरनाक बीमारी थी. तब अमेरिका तक में पोलियो का खौफ परमाणु बम के बाद सबसे ज्यादा था. इसका जिक्र फिलाडेल्फिया में वैक्सीन सेंटर के वैज्ञानिक Paul A. Offit ने अपनी किताब “The Cutter Incident" में भी किया है. पिट्सबर्ग के वैज्ञानिक जोनास साल्क ने इसका टीका साल 1952 में तैयार किया. जिसके बाद अमेरिका और धीरे-धीरे विकासशील देश भी पोलियो-मुक्त हुए. पाकिस्तान में अब भी हालांकि पोलियो के मामले नजर आते हैं. WHO इसपर काफी चिंता जता चुका है.

पोलियो का जिक्र फिलाडेल्फिया में वैक्सीन सेंटर के वैज्ञानिक Paul A. Offit ने अपनी किताब “The Cutter Incident" में भी किया

टेटनस का इंजेक्शन भी अहम सफलता


चोट लगने पर तुरंत या 24 घंटों के भीतर हर हाल में ये इंजेक्शन लगवाने को कहा जाता है. विशेषज्ञों का मानना है कि हर 10 साल में एक बार ये इंजेक्शन लेना चाहिए. टीका बनने से पहले टेटनस एक जानलेवा बीमारी हुआ करती थी. अब जन्म के कुछ बाद ही बच्चों को DTaP का टीका दिया जाता है, जिससे टेटनस के अलावा डेफ्थिरिया और एक तरह की खांसी का भी नियंत्रण होता है.

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चेचक होता था जानलेवा
चेचक को भी मॉडर्न वक्त की सबसे खतरनाक बीमारियों में गिना जाता था. आज या तो ये होता ही नहीं है या होता भी है तो इसका सबसे माइल्ड रूप दिखाई देता है. वहीं पहले इससे संक्रमित होने वाले 30 फीसदी लोगों की मौत हो जाती थी. 1976 में अंग्रेज चिकित्सक एडवर्ड जेनर ने चेचक के टीके का आविष्कार किया. तब भी इसके खतरे का इसी से अंदाजा लग सकता है कि टीका बनने के बाद भी इसे कम होते-होते खत्म होने में लगभग 200 साल लग गए. सत्तर के दशक में जानलेवा चेचक होना बंद हुआ.

श्वसन तंत्र से जुड़ी बीमारी इंफ्लूएंजा या फ्लू को भी बेहद घातक माना जाता है (photo-pixabay)


क्या है इंफ्लूएंजा या फ्लू 
श्वसन तंत्र से जुड़ी बीमारी इंफ्लूएंजा या फ्लू को भी बेहद घातक माना जाता है. इसे स्पेनिश फ्लू भी कहते थे. साल 1918 में पहले विश्व युद्ध के दौरान सैनिकों से शुरू हुई इस बीमारी ने करोड़ों जानें लीं. आज तक इसपर विवाद है कि असल में कितनी मौतें हुई थीं. कई चरणों में फैली इस बीमारी का टीका भी दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बन सका. अब फ्लू होता तो है लेकिन टीके के कारण माइल्ड ही रहता है.

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जन्म के साथ हेपेटाइटिस का टीका
हेपेटाइटिस बी का टीका भी इसी श्रेणी में आता है. टीका न होने के कारण पहले हर साल लगभग 780,000 मौतें इस बीमारी के कारण होती थीं. खून या शरीर के किसी द्रव्य से फैलने वाली इस घातक बीमारी का सबसे ज्यादा डर जन्म के तुरंत बाद मां से शिशु को होता है. यही वजह है कि अब जन्म के तुरंत बाद ही शिशु को इसका टीका दिया जाता है.

पहले विश्व युद्ध के दौरान सैनिकों से शुरू हुई इस बीमारी ने करोड़ों जानें लीं


इसी तरह से साल 2014 में पश्चिमी अफ्रीका में फैली बीमारी इबोला को टीके के जरिए ही रोका जा सका. दो सालों तक इस बीमारी ने अफ्रीका को परेशान किया, जिस दौरान वहां 11 हजार से भी ज्यादा जानें गईं.

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डिप्थीरिया भी ऐसी ही एक बीमारी है
कोराइन बैक्टीरियम डिपथिरी नामक बैक्टीरिया के कारण होने वाली इस बीमारी से 2 से 10 साल तक के बच्चों को खतरा रहता है. इससे नाक और गले में एक झिल्ली बन जाती है जो सांस लेने में रुकावट पैदा करती है. यहां तक कि बीमारी बढ़ने पर बच्चे में ऑर्गन फेल होने तक की नौबत आ जाती है. इससे बचाव के लिए बच्चों को डीपीटी का टीका लगाया जाता है.
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