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विनायक दामोदर सावरकर को कैसी मिली 'वीर' की लोकप्रिय उपाधि

News18Hindi
Updated: February 26, 2020, 4:32 PM IST
विनायक दामोदर सावरकर को कैसी मिली 'वीर' की लोकप्रिय उपाधि
26 फरवरी 1966 को वीर सावरकर का निधन हो गया था

जब भी देश में विनायक दारोमदार सावरकर का नाम लिया जाता है तो उन्हें ज्यादातर वीर सावरकर के नाम से ही ज्यादा बुलाया जाता है. आखिर उनके नाम के आगे वीर की उपाधि कैसे लगी और फिर वो उनकी पहचान बन गई. 26 फरवरी को उनके निधन की पुण्यतिथि है

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  • Last Updated: February 26, 2020, 4:32 PM IST
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हिंदू राष्ट्रवाद (Hindu Nationalism) के प्रणेता माने जाने वाले विनायक दामोदर सावरकर (V. D. Savarkar) की आज पुण्यतिथि है. वर्ष 1966 में उनका निधन हो गया था. सावरकर को वीर सावरकर के नाम से जाना और पुकारा जाता है, लेकिन क्या आपको पता है कि उनके नाम के साथ 'वीर' शब्द या उपाधि किस तरह जुड़ी?

इस टाइटल के पीछे एक पूरी कहानी है, जो इतिहास (History) के कम सुने अध्यायों से होकर गुज़रती है. इस कहानी में आपको एक और दिलचस्प बात यह जानने को मिलेगी कि जिस कलाकार (Artist) ने सावरकर को 'वीर' नाम दिया, सावरकर ने भी उसे 'आचार्य' कहकर पुकारा. दोनों नामों को इस कदर लोकप्रियता मिली कि अब दोनों का नाम इन उपाधियों के बगैर नहीं लिया जाता. जानिए इतिहास के हवाले से एक कमसुनी लेकिन दिलचस्प दास्तान.

किसने दिया था नाम 'वीर'?
असल में, कांग्रेस के साथ एक बयान को लेकर विवाद में उलझ जाने के बाद सावरकर को कांग्रेस ने ब्लैकलिस्ट कर दिया था और हर जगह उनका विरोध किया जाता था. यह 1936 का समय था. ऐसे में मशहूर पत्रकार, शिक्षाविद, लेखक, कवि और नाटक व फिल्म कलाकार पीके अत्रे ने सावरकर का साथ देने का मन बनाया क्योंकि वह नौजवानी की उम्र से सावरकर के किस्से सुनते रहे थे और उनके बड़े प्रशंसक थे. अत्रे के बारे में आप कहानी में और भी बहुत कुछ जानेंगे.



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पुणे के एक कार्यक्रम में मौजूद सावरकर की यह तस्वीर हिस्ट्रीअंडरयोरफीट ब्लॉग पर सुरक्षित है.कैसे दिया गया ये चर्चित टाइटल?
अत्रे ने पुणे में अपने बालमोहन थिएटर के कार्यक्रम के तहत सावरकर के लिए एक स्वागत कार्यक्रम आयोजित किया. इस कार्यक्रम को लेकर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने सावरकर के खिलाफ पर्चे बांटे और धमकी दी कि वे सावरकर को काले झंडे दिखाएंगे. इस विरोध के बावजूद हज़ारों लोग जुटे और सावरकर का स्वागत कार्यक्रम संपन्न हुआ, जिसमें अत्रे ने वो टाइटल दिया, जो आज तक चर्चित है.

'जो काला पानी से नहीं डरा, काले झंडों से क्या डरेगा?'
सावरकर के विरोध में कांग्रेसी कार्यकर्ता कार्यक्रम के बाहर हंगामा कर रहे थे और अत्रे ने कार्यक्रम में अपने भाषण में सावरकर को निडर करार देते हुए कह दिया कि काले झंडों से वो आदमी नहीं डरेगा, जो काला पानी की सज़ा तक से नहीं डरा. इसके साथ ही, अत्रे ने सावरकर को उपाधि दी 'स्वातंत्र्यवीर'. यही उपाधि बाद में सिर्फ 'वीर' टाइटल हो गई और सावरकर के नाम के साथ जुड़ गई.

'सावरकर ने जीत लिया था पुणे'
अत्रे के भाषण और उपाधि दिए जाने के बाद तालियों से सभागार गूंज उठा और उसके बाद करीब डेढ़ घंटे तक सावरकर ने ऐसा ज़ोरदार भाषण दिया कि अत्रे ने ही बाद में लिखा कि उस भाषण का करिश्मा था कि 'सावरकर ने पुणे फतह कर लिया था'. असल में, यह कांग्रेस के विरोध का जवाब देकर सावरकर की लोकप्रियता को ज़ाहिर करने का कदम था.

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इतिहास, राजनीति और धर्म से जुड़ी कई किताबें सावरकर ने लिखी थीं.


क्यों दिया गया यह टाइटल?
सावरकर ने जेल के दिनों में 1857 की क्रांति पर आधारित चार खंडों में विस्तृत मराठी ग्रंथ लिखा था जिसका नाम '1857 चे स्वातंत्र्य समर' था. यह ग्रंथ बेहद चर्चित हुआ था और इसी ग्रंथ के नाम से अत्रे ने सावरकर को 'स्वातंत्र्यवीर' नाम दिया था. यही नहीं, ये वही अत्रे थे, जिन्होंने बाद में यह घोषणा तक की थी कि 'महाराष्ट्र में ध्यानेश्वर के बाद सावरकर से ज़्यादा मेधावी कोई लेखक नहीं हुआ'.

सावरकर ने कैसे चुकाया नाम का कर्ज़?
अत्रे ने सावरकर के स्वागत में जो कामयाब कार्यक्रम आयोजित किया, उसके बाद पुणे में ही एक और कार्यक्रम हुआ. इस कार्यक्रम में सावरकर ने अत्रे को महान शिक्षाविद, लेखक और कलाकार घोषित करते हुए उन्हें आचार्य कहकर पुकारा. 'आचार्य' कुछ ही समय बाद अत्रे के नाम के साथ उसी तरह जुड़ने लगा जैसे सावरकर के नाम के साथ 'वीर' जुड़ रहा था. 80 साल बाद ये स्थिति है कि दोनों को उपाधियों के साथ ही ज़्यादातर पुकारा या सं​बोधित किया जाता है.

(स्रोत : वैभव पुरंदरे लिखित पुस्तक 'सावरकर: द ट्रू स्टोरी ऑफ फादर ऑफ हिंदुत्व' के अध्याय पर आधारित)

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First published: February 26, 2020, 4:02 PM IST
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