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शुक्र ग्रह में आखिर किस तरह के जीवन होने का चल रहा है पता

शुक्र ग्रह में आखिर किस तरह के जीवन होने का चल रहा है पता

शोध में शुक्र ग्रह (Venus) पर जीवन के अनुकूल हालात होने की संभावनाओं को  बताया है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

शोध में शुक्र ग्रह (Venus) पर जीवन के अनुकूल हालात होने की संभावनाओं को बताया है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

शुक्र ग्रह (Venus) पर हुए अध्ययन के मुताबिक वहां के बादलों (Venusian Clouds) में प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) के लिए दिन ही नहीं बल्कि रात तक में अनुकूल वातावरण हो सकता है.

    पृथ्वी के (Earth) बाहर जीवन कीसंभावनाओं में सबसे ज्यादा अध्ययन मंगल ग्रह के बाद शुक्र ग्रह (Venus) पर ही हुआ है. लंबे समय से यह बहस का ही विषय रहा है कि इन ग्रहों पर जीवन हो सकता है या नहीं. जहां मंगल ग्रह पर जीवन के प्रमाण खारिज ज्यादा किए गए हैं तो शुरू से जीवन के प्रतिकूल माना जाने वाले शुक्र पर उम्मीद की किरण भी बहस को जन्म दे देती है. पिछले साल फॉस्फीन की खोज पर हुई बहस के बाद, एक बार फिर नए अध्ययन ने शुक्र पर जीवन (Possibility of life) की संभावना की उम्मीद जताई है.

    नए अध्ययन में पाया गया है कि शुक्र ग्रह के बादलों में पराबैंगनी किरणें छानने की क्षमता है.  इससे वहां के अन्य बादलों की परतों में पृथ्वी की तह प्रकाश संश्लेषण के लिए अनुकूल माहौल बनने  की संभावना है. इतना ही नहीं शुक्र ग्रह पर बादलों की परतें सूक्ष्मजीवन पनपने के लिए पर्याप्त रूप से सक्षम है.

    इतने स्रोतों से मिले आंकड़े
    इसी सप्ताह एस्ट्रोबायोलॉजी में प्रकाशित अध्ययन में शोधकर्ताओं ने नासा के वनेरा, यूरोपीय स्पेस एजेंसी के वीनस एक्सप्रेस और जापानी स्पेस एजेंसी जाक्सा के अकात्सुकी अभियानों के आंकड़ों का उपयोग कर ये नतीजे निकाले हैं जो बहुत ज्यादा चौंकाने वाले भले ही ना हों, लेकिन पूरी तरह से नए जरूर हैं.

    वायुमंडल की धारणा के बदलने की गुंजाइश
    पिछले साल फॉस्फीन गैस की खोज ने हलचल मचा दी थी. यह गैस पृथ्वी पर केवल बैक्टीरिया ही बना पाते हैं. लेकिन फॉस्फीन की बहस के बीच पिछले साल ही जुलाई में एक अन्य अध्ययन ने बताया था कि शुक्र ग्रह के बादल इतने सूखे हैं कि वहां जीवन संभव ही नहीं है, लकिन नया अध्ययन इस धारणा को बदलने की बात कहता दिख रहा है.

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    शुक्र ग्रह (Venus) पर हुए अभी तक अध्ययन में से अधिकांश में यही माना गया है कि वहां हालात जीवन के बहुत प्रतिकूल हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

    दो अरब साल तक था पानी
    वैज्ञानिक इस बात के बिना किसी मतभेद के मानते हैं कि अपने निर्माण के समय और पृथ्वी और शुक्र ग्रह एक जैसे ही ग्रह थे. निर्माण के दो अरब सालों तक शुक्र की सतह आवासीय थी और वहां उथले महासागर भी मौजूद थे. लेकिन शुक्र के सूर्य के बहुत ही पास होने से सब कुछ बदलता चला गया.

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    सूखा और गर्म शुक्र
    सूर्य के पास होने से सुर्य के प्रकाश ने शुक्र के महासागरों को सोख लिया, वायुमडंल में पानी के वाष्प टूट गए और हाइड्रोजन अंतरिक्ष में चली गई. बिना पानी के कार्बन डाइऑक्साइड केसाथ ग्रीनहाउस गैसें बढ़ी और आज हालात ये हैं कि यहां का तापमान 462 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है और वायुमंडल में पानी की वाष्प भी नहीं है. इस वायुमंडल में 96 प्रतिशत कार्बनडाइऑक्साइड है जो पृथ्वी  तुलना में 90 प्रतिशत ज्यादा मोटी है.

    यह पहली बार है कि शुक्र (Venus) के बादलों में ऐसी अनुकूल संभावनाओं की बात की गई है. (तस्वीर: JAXA )

    बहस को मिला दिलचस्प मोड़
    इस अध्ययन शुक्र ग्रह के बादलों के द्वारा सक्षम वातावरण देने का दावा करके शुक्र ग्रह पर जीवन की संभावनाओं पर बहस को नया और रोचक मोड़ दे दिया है. अध्ययन के मुताबिक यहां प्रकाश संश्लेषण की क्रिया केवल दिन में ही नहीं बल्कि रात में भी हो सकती है क्योंकि यहां की गर्म सतह से इंफ्रारेड किरणें और ऊष्मीय ऊर्जा निकलती रहती है.

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    इसके अलावा वैज्ञानिकों का यह भी दावा है कि यहां के बादलों में ज्यादा अम्लीयता नहीं हैं और इसके साथ पानी की गतिविधि भी सूक्ष्मजीवों के पनपने के लिए प्रतिकूल नहीं है. बादलों की ऊपरी परत पृथ्वी की ओजोन परत की तरह काम करती है. शोधकर्ताओं का मानना है कि आने वाले समय में मंगल और यूरोपा की तरह ही शुक्र के लिए अभियान भेजे जाएंगे.

    Tags: Earth, Research, Science, Space, Venus

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