Babri demolition verdict: कौन हैं वे जज जिन्होंने सुनाया बाबरी मस्जिद पर ऐतिहासिक फैसला

बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले (Babri Masjid Demolition Case Verdict) में सीबीआई की विशेष अदालत आज फैसला सुना रही है (News18 creative by Mir Suhail)
बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले (Babri Masjid Demolition Case Verdict) में सीबीआई की विशेष अदालत आज फैसला सुना रही है (News18 creative by Mir Suhail)

बाबरी मस्जिद विध्वंस (babri masjid demolition) मामले पर सीबीआई के जज सुरेंद्र कुमार यादव (Surendra Kumar Yadav) ने फैसला सुनाते हुए सभी आरोपियों को दोषमुक्त बताया. साल 2019 में ही रिटायर होने जा रहे इस जज को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के लिए रोककर रखा था.

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  • Last Updated: September 30, 2020, 3:04 PM IST
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बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले (Babri Masjid Demolition Case Verdict) में सीबीआई की विशेष अदालत ने आज फैसला सुनाया. इस मामले में भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं सहित कुल 32 आरोपी थे.  मामले की संवेदनशीलता को लेकर पूरे अयोध्या में हाई अलर्ट है. स्पेशल सीबीआई कोर्ट के जज सुरेंद्र कुमार यादव ने फैसला सुनाते हुए सभी 32 आरोपियों को दोषमुक्त करार दिया. बता दें कि आज से ठीक पांच साल पहले उन्हें इस मामले में विशेष न्यायाधीश बनाया गया था. जानिए, कौन हैं ये जज और किस खूबी की वजह से उन्हें इतना अहम मामला सौंपा गया.

सुरेंद्र कुमार यादव मूलतः जौनपुर के पखानपुर गांव से हैं. साल 1959 में पखानपुर में रामकृष्ण यादव की संतान सुरेंद्र कुमार के बचपन के बारे में खास जानकारी नहीं मिलती है. सिवाय इसके कि पढ़ने-लिखने में खास रुचि रखने पवाले यादव लगभग 31 साल की उम्र में राज्य न्यायिक सेवा के लिए चुने गए.

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फैजाबाद में एडिशनल न्यायाधीश के तौर पर उनकी पहली पोस्टिंग हुई. जज यादव के करियर पर नजर डालें तो इसी पहली पोस्टिंग वाले शहर से उनका बार-बार साबका पड़ता दिखता है. एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज के बतौर उनका पहला प्रमोशन फैजाबाद में ही हुआ था, जिसके बाद वे लगातार आगे ही बढ़ते चले गए. यहां से वे गाजीपुर, हरदोई, इटावा जैसे शहरों से होते हुए उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के जिला जज बन गए.
स्पेशल सीबीआई कोर्ट के जज सुरेंद्र कुमार यादव (Photo-allahabadhighcourt)


सुरेंद्र कुमार यादव के बारे में एक खास बात ये है कि उन्हें रिटायरमेंट आगे बढ़ाते हुए बाबरी मस्जिद के स्पेशल जज का मामला दिया गया. बता दें कि वे साल 2019 सितंबर में ही रिटायर होने वाले थे लेकिन इस मामले के चलते उनकी सेवानिवृति को आगे बढ़ाया गया. खुद सुप्रीम कोर्ट ने इसकी पहल करते हुए उन्हें विशेष न्यायालय (अयोध्या प्रकरण) के पीठासीन अधिकारी के पद पर बने रहकर बाबरी मस्जिद विध्वंस केस की सुनवाई के लिए कहा. कुल मिलाकर सुरेंद्र कुमार यादव जिला जज के तौर पर तो रिटायर हो गए लेकिन विशेष जज बने रहे.

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देखा जाए तो जज के मामले में रिटायरमेंट आगे बढ़ा दिया जाना अपने-आप में अहम उपलब्धि है. खासकर तब जब किसी एक ही मामले को ध्यान में रखते हुए ऐसा किया जाए. सुप्रीम कोर्ट ने इस जज के मामले में ऐसा करने के लिए संविधान की धारा 142 का इस्तेमाल किया. इसके तहत किसी खास मामले की सारी जानकारी रखने वाले जज का कार्यकाल फैसला आने तक बढ़ाया जा सकता है.

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ये धारा सुप्रीम कोर्ट को ये अधिकार देती है कि वो किसी खास मामले में जब तक 'कंप्लीट जस्टिस' न मिल जाए, तब तक उसे पूरा करने के लिए कोई भी जरूरी निर्णय ले सकती है. यही वजह है कि स्पेशल जज के तौर पर सुरेंद्र कुमार यादव को मामले की सुनवाई पूरी होने और फैसला आने तक पद पर बनाए रखने की व्यवस्था की गई.

मामले की संवेदनशीलता को लेकर पूरे अयोध्या में हाई अलर्ट है (getty image via news18)


माना जा रहा है कि ऐसा जज सुरेंद्र कुमार यादव के कार्यकाल में लिए गए फैसलों पर ईमानदारी और साहस को देखते हुए किया गया. इनको ईमानदार और फैसलों पर किसी बात का असर न होने देने वाले जज के तौर पर देखा जाता है. साथ ही अयोध्या मामले पर काफी जानकारी भी है. यही देखते हुए उन्हें कार्यकाल बढ़ाते हुए ये ऐतिहासिक मामला सौंपा गया.

क्या रहा फैसला
सीबीआई के स्पेशल जज सुरेंद्र कुमार यादव (Justice Surendra Kumar Yadav) ने सभी 49 आरोपियों को बरी कर दिया. इस मामले में सुनवाई के दौरान 17 आरोपियों की मौत हो चुकी है. बाकी के सभी 32 आरोपी भी दोषमुक्त करार दिए गए. जज ने फैसला पढ़ते हुए कहा कि 6 दिसंबर 1992 को जो कुछ भी हुआ वह पूर्व नियोजित घटना नहीं थी. घटना आकस्मिक थी. साथ ही जज ने कहा कि आरोपियों के खिलाफ कोई साक्ष्य भी नहीं मिला हैं.

घटना पूर्व नियोजित नहीं थी
जज ने अपने फैसले में कहा कि घटना वाले दिन विहिप व उसके तत्कालीन अध्यक्ष स्वर्गीय अशोक सिंघल ने उग्र भीड़ को रोकने की भी कोशिश की. जज ने अशोक सिंघल के एक वीडियो का भी जिक्र अपने फैसले में किया. जज ने कहा कि जो भी आरोपी वहां मौजूद थे सभी ने कारसेवकों को रोकने का प्रयास किया. ऐसा कोई भी साक्ष्य नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि इसके पीछे साजिश रची गई थी.
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