वीजी सिद्धार्थ की खुदकुशी नए स्टार्टअप के किन अंधेरों को दिखाती है

कैफे कॉफी डे चेन के फाउंडर की खुदकुशी के बाद तमाम स्टार्टअप की बिजनेस स्ट्रैटजी भी सवालों के घेरे में है, जो ब्रांड लॉयल बेस बढ़ाने के लिए घाटे पर घाटा बढ़ाते जा रहे हैं. साथ ही इनकम टैक्स जैसी सरकारी एजेंसियों के व्यवहार पर भी गौर करने की जरूरत है

News18Hindi
Updated: August 1, 2019, 3:29 PM IST
वीजी सिद्धार्थ की खुदकुशी नए स्टार्टअप के किन अंधेरों को दिखाती है
कैफे कॉफी डे के फाउंडर वीजी सिद्धार्थ
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Updated: August 1, 2019, 3:29 PM IST
पिछले कुछ सालों से हम सभी आईटी और डिजिटल स्टार्टअप की बड़ी सफलताओं और कम समय में बड़ी छलांगों की कहानियां पढ़ रहे हैं. ये जान रहे हैं कि इस तरह नए स्टार्टअप में किस तरह यंग मिलेनियल्स रातों रात चमक रहे हैं. आमतौर पर स्टार्टअप की दुनिया ऐसे युवाओं की कहानियां कहती हैं, जो 20 से 30 साल के बीच हैं, ब्राइट दिमाग वाले टेक्नोक्रेट हैं और नए आइडियाज के स्टार्टअप बिजनेस के सहारे धूम मचा रहे हैं.

हालांकि इसका दूसरा पहलू ये भी है- जहां कुछ पैसा लगाने वाले लोग हैं, जिन्हें स्टार्टअप का आइडिया और बिजनेस मॉडल समझ में आता है और वो उसमें पैसा लगाते हैं. आमतौर पर स्टार्टअप की वेंचर कैपिटल फंडिंग विदेशी निवेशकों या देश के बड़े पैसे वालों के जरिए हो रही है.

ये सारे बिजनेस ऐसे हैं, जो एक उम्मीद में पैसा झोंके जा रहे हैं. मोटे घाटे में भी ग्राहकों को लुभाने में लगे हैं कि एक दिन लॉयल ग्राहकों का बड़ा आधार उनके बिजनेस को जबरदस्त मुनाफा देना शुरू कर देगा.

भारत में ज्यादातर स्टार्टअप बिजनेस का यही हाल है. ज्यादातर घाटे से और बड़े घाटे की ओर बढ़ते जा रहे हैं. लगातार फंडिंग के नए रास्ते देख रहे हैं और घाटे का चक्रव्यूह उन्हें और फंसाता जा रहा है. इसमें भी कोई शक नहीं कि निवेशक भी उन पर भरोसा करके फंडिंग जारी रखे हुए हैं. हालांकि ये सभी स्टार्टअप अपने डिजिटल प्रॉडक्ट्स की वजह से काफी तेजी से सेवाएं उपलब्ध करा रहे हैं.

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चुनौतियों और जोखिमों के बारे में भी जानिए
जब कोई स्टार्टअप सफल होता है तो उसके साथ उसके मालिक और निवेशकों की संपत्ति बढ़ती है. इस सफलता की चर्चाएं तेजी से होने लगती हैं. लेकिन हममें से ज्यादा लोग कभी नहीं  जान पाते हैं कि एक नवउद्यमी की यात्रा में चुनौतियों और जोखिम के साथ कड़ी मेहनत भी छिपी होती है. वीजी सिद्धार्थ के दुर्भाग्यपूर्ण हादसे के बाद ये सोचने का समय आ गया है कि नए जमाने के बिजनेस की समस्याएं क्या हैं.
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आखिर वो कौन से हालात थे, जिन्होंने एक सफल बिजनेसमैन को इस स्थिति तक पहुंचा दिया


वीजी सिद्धार्थ कैफे कॉफी डे के फाउंडर थे, बेशक उनका परिवार काफी पैसे वाला था और कई पीढ़ियों से कॉफी एस्टेट के लिए जाना जाता था, लेकिन वह अपने परिवार में पहले बिजनेसमैन बने. उन्होंने एक कांसेप्ट और आइडिया पर नई तरह का बिजनेस शुरू किया. देखते ही देखते अपने इस ब्रांड को ना केवल मजबूत करने में सफल रहे बल्कि इसका विस्तार उन्होंने देश से विदेश तक में किया.

सिद्धार्थ ने ऐसा रास्ता क्यों चुना
सिद्धार्थ कर्ज और आयकर छापों के बाद पैदा हुए हालात को बर्दाश्त नहीं कर सके. उन्होंने नदी में कूद कर आत्महत्या कर ली. लेकिन हर किसी के लिए ये हैरानी वाली बात है कि आखिर इतने सफल और पैसे वाले शख्स ने ये रास्ता क्यों चुना.

उन्होंने खुदकुशी से पहले जो लेटर कैफे कॉफी डे के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के नाम लिखा उससे जाहिर होता है कि वह कितने अधिक मानसिक दबाव में थे. खासकर प्राइवेट इक्विटी वाले उन लोगों को लेकर जो उन पर लगातार धन वापसी का दबाव बनाए हुए थे. ऐसे हालातों से गुजरते हुए हम बिजनेस के दूसरे बड़े लोगों को भी देख चुके हैं.

स्टार्टअप बिजनेस बाहर से जितने अच्छे लगते हों लेकिन उन सभी के सामने चुनौतियां और जोखिम होते हैं


क्यों हार गए 
फिर इनकम टैक्स के छापों के बाद जो हालात बने, उसने कंपनी के कामकाज, डील्स और उसके मार्केट वैल्यू पर असर डाला. पत्र उस शख्स की हताशा को जाहिर करता है, जो अपनी मेहनत, सूझबूझ और योजनाओं के बल पर एक बड़ा अंपायर खड़ा करता है लेकिन इस कदर हताश हो जाता है कि उसे लगता है कि अब कुछ नहीं हो सकता, वो हार गया है.

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अगर आप लोगों से पूछिए, जो लोग कैफे कॉफी डे में जाते रहे हैं, वहां बैठते रहे हैं, वे यही कहेंगे ये फर्म सुपरस्टार थी, जिसने कॉफी के बिजनेस को कारपोरेटराइज करके दिखाया. वो भी तब जबकि कोस्टा और स्टारबक्स जैसी विदेशी चेन भारत में नहीं आईं थीं. जब वो भारत में आईं तो कैफे कॉफी डे उनसे मजबूती से मुकाबला करता हुआ भी दिखा.

सिद्धार्थ जिस परिवार से आए थे, उसके पास काफी के बागान थे. ये परिवार कॉफी के बिजनेस को बखूबी समझता था. सिद्धार्थ ने इस तरह इस बिजनेस को जिस तरह बढ़ाया, उसके पीछे उनकी समझबूझ और गतिशीलता ही थी. देखते ही देखते दो दशक में जमीन से शुरू करके छह देशों में 1770 आउटलेट्स तक पहुंचना हंसी खेल नहीं है.

छापे जैसी कार्रवाईयां अच्छी कंपनियों को भी गर्त में पहुंचा देती हैं 
कैफे कॉफी डे (सीसीडी) चार साल पहले नेशनल स्टॉक एक्सचेंज और बाम्बे स्टॉक एक्सचेंज में दर्ज हुई थी. सीसीडी को केकेआर, स्टैंर्ड चार्टर्ड पीई और न्यू सिल्क रूट जैसी प्राइवेट इक्विटी फर्म्स की मदद मिली. लेकिन कंपनी का वैल्यूवेशन पिछले छह महीनों में 42 फीसदी तक खत्म हो गया. सिद्धार्थ माइंडट्री के सबसे बड़े निवेशकों में थे और माइंडट्री और एलएंडटी के बीच हुए सौदे में मुख्य भूमिका में थे, लेकिन इस डील में सिद्धार्थ को इनकम टैक्स विभाग की ओर से जबदस्त दिक्कतों का सामना करना पड़ा.

खराब हालात में बैंकिंग सेक्टर भी अलग तरह से व्यवहार करता है
उन्हें फोर्स किया गया कि वह अपनी एक दशक से ज्यादा पुरानी कंपनी में अपने 70 फीसदी शेयर रखें ताकि घाटे की भरपाई हो सके. कुल मिलाकर जब ऐसी स्थितियां आती हैं बैकिंग सेक्टर और वित्तीय संस्थाएं आपसे अलग तरीके से व्यवहार करने लगती हैं. दूसरी ओर कंपनी के अपने बढ़े हुए खर्चे और दबाव डालते हैं. जब कंपनी करीब दो दशक पुरानी हो और उसके हजारों कर्मचारी हों. ऐसे में कंपनी का घाटा ज्यादा हो तो उसे ब्रेक इवेन में आने में बहुत समय लग जाता है.

भारत में ज्यादातर स्टार्टअप लॉयल कस्टमर बेस बनाने के लिए अभी केवल इनवेस्ट कर रहे हैं, जो घाटे और जोखिम की स्थिति है


ये सवाल इस समय की जरूरत हैं
जब जानेमाने एंटरप्रेन्योर सिद्धार्थ की ऐसी त्रासदीपूर्ण हालत हुई तो ऐसे में घाटे में चल रहे दूसरे नए बिजनेस और स्टार्टअप्स का क्या होगा, ये सवाल इस समय जरूर पूछे जाने चाहिए. इसके हल की ओर भी देखना चाहिए कि ऐसे दबावों से कैसे निपटें.

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साथ ही ये सवाल देश की सरकारी एजेंसियों से है कि आखिर उस बिजनेसमैन से कैसे सलूक होना चाहिए, जिसने अपने बल पर एक बड़ा बिजनेस खड़ा किया, जो हजारों लोगों को नौकरी दे रहा है. क्या उस बिजनेसमैन को बगैर किसी निष्कर्ष पर पहुंचे या जांच बगैर कसूरवार मानकर खराब व्यवहार किया जाना चाहिए. सिद्धार्थ ने अपने लेटर में इनकमटैक्स के बड़े अधिकारियों के बारे में जो शिकायत की हैं क्या उसकी पूरी जांच की जाएगी. क्योंकि इन सारी बातों ने एक शानदार बिजनेसमैन को मौत के मुंह में जाने के लिए मजबूर किया.

अगर टैक्स अधिकारी या सिस्टम ऐसा व्यवहार करेगा तो देश में भला कैसे उम्मीद की जा सकती है कि बिजनेस के लिए बेहतर माहौल और संस्कृति पैदा हो सकेगी. जिस तरह की कार्रवाईयां सरकारी एजेंसी करती हैं, उससे अच्छे खासे ब्रांड्स को धक्का पहुंचता है. उसके मार्केट वैल्यूवेशन पर गहरी आंच आती है. इस तरह की कार्रवाईयों से किसी को नहीं केवल बिजनेसमैन को नुकसान होता है. अगर वो सारी जांच के बाद सही पाया जाता है तब भी उसका बिजनेस गोते लगा चुका होता है, वो भारी घाटे का शिकार हो चुका होता है. मानसिक तौर पर बुरे हाल में जा चुका होता है.

अब बात स्टार्टअप बिजनेस के लिए
- जिस तरह देशभर में तमाम जाने पहचाने ब्रांड्स वाले स्टार्टअप लॉयल कस्टमर्स की आस में इनामी स्कीम्स और मुफ्त में सामान बांट रहे हैं, उनकी बिजनेस स्ट्रेटजी बेशक मैनेजमेंट के बहुत पढ़े-लिखे लोग ही बना रहे होंगे. लेकिन भारत के परिप्रेक्ष्य में क्या किसी स्टार्टअप के लिए ऐसी रणनीतियां अब तक कारगर होती दिखी हैं. 10-15 साल वाले बहुत से स्टार्टअप ऐसे हैं, जो घाटे में ही हैं, उससे उबरने की कोई तस्वीर उन्हें नजर नहीं आती.

ये भी सही है कि तकनीक और रणनीतियों के मामले में तेजी से बदलती इस दुनिया में पांच साल बाद क्या होगा, ये कोई नहीं जानता. तो हम पांच साल और दस साल के निवेश की नीतियां कैसे बना सकते हैं. आमतौर पर सभी तरह के स्टार्टअप कहते हैं वो फिलहाल केवल अच्छे भविष्य की आस में निवेश कर रहे हैं, अपना बेस बढ़ा रहे हैं. लेकिन ये सभी घाटे में हैं और घाटा बढ़ता जा रहा है. इसमें फ्लिपकार्ट से लेकर पेटीएम तक सारे स्टार्टअप के नाम आते हैं.

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First published: August 1, 2019, 2:41 PM IST
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