तब स्टारडम को किनारे रखकर ओशो के आश्रम में माली बन गए थे विनोद खन्ना

80 के दशक में लोग मानते थे कि कोई अगर अमिताभ बच्चन के स्टारडम को चुनौती दे सकता है तो ये विनोद खन्ना हैं लेकिन वो एक दिन अचानक बॉलीवुड को छोड़कर रजनीश के साथ उनके अमेरिका के ओरेगान स्थित आश्रम में चले गए. वहां उनका काम एक माली का था.
80 के दशक में लोग मानते थे कि कोई अगर अमिताभ बच्चन के स्टारडम को चुनौती दे सकता है तो ये विनोद खन्ना हैं लेकिन वो एक दिन अचानक बॉलीवुड को छोड़कर रजनीश के साथ उनके अमेरिका के ओरेगान स्थित आश्रम में चले गए. वहां उनका काम एक माली का था.

एक दिन पहले बॉलीवुड स्टार (Bollywood Star) से सियासत (Politics) में आए और केंद्रीय मंत्री बने विनोद खन्ना (Vinod Khanna) का जन्मदिन था. उनके जीवन में ऐसे मोड़ आए कि चकित करने वाले थे. हालांकि उन्होंने जिंदगी को अपनी तरह से जिया. यहां तक कि जब ओशो (Osho) ने उन्हें अपने आश्रम में माली बनाया तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं थी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 7, 2020, 11:29 AM IST
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एक दिन पहले 06 अक्टूबर को बॉलीवुड स्टार से ओशो यानि रजनीश के शिष्य और फिर राजनीति में आने वाले विनोद खन्ना का जन्मदिन है. अब वो हमारे बीच नहीं हैं. तीन साल पहले उनका निधन हो गया. लेकिन उनकी जिंदगी की कहानियां हर ओर बिखरी हुई हैं.

ये 1982 का समय था, विनोद खन्ना ने जब मुंबई के होटल सेंटूर में प्रेस कांफ्रेंस बुलाई तो मीडिया हैरान था, क्योंकि तब बॉलीवुड स्टार शायद ही कभी प्रेस कांफ्रेंस बुलाते थे. विनोद खन्ना महरून रंग का चोला और ओशो की तस्वीर वाली मनकों की माला पहनकर आए. साथ में थीं उनकी पहली पत्नी गीतांजलि और दोनों बेटे अक्षय और राहुल.

अंदाज सबको था कि विनोद क्या कहने वाले हैं. क्योंकि तब बॉलीवुड में नंबर दो स्टार विनोद खन्ना ने नई फिल्में लेनी बंद कर दी थीं. फिल्म निर्माताओं का साइनिंग अमाउंट लौटाना शुरू कर दिया था. हालांकि उसी साल उनकी दो फिल्में 'द बर्निंग ट्रेन' और 'कुरबानी' सुपरहिट रही थीं. फिल्म सर्किल में लोग कहते थे कि विनोद करियर को लेकर सीरियस हो जाएं तो अमिताभ बच्चन का स्टारडम हिला देंगे. विनोद अपनी नई दुनिया बनाने में लगे थे. फिल्मों से उनकी दिलचस्पी खत्म हो रही थी.



रजनीश के करीब आने लगे थे
विनोद वर्ष 70 के दशक में आचार्य रजनीश से प्रभावित होने लगे थे. 1975 के ठीक आखिरी दिन वह रजनीश आश्रम में संन्यासी बन गए. इससे पहले उन्होंने घंटों रजनीश के वीडियो देखे. उनके साथ समय बिताया. 70 के दशक के आखिरी सालों में वह सोमवार से लेकर शुक्रवार तक बॉलीवुड में काम करते. फिर उनकी मर्सीडिज कार पुणे की ओर भागती नजर आती. सप्ताहांत के दो दिन पुणे के ओशो आश्रम में गुजरते. जहां पहले तो वह होटल में रुकते थे. फिर आश्रम में ही ठहरने लगे.

वो ओशो के पुणे आश्रम में बागीचों की देखभाल करते थे
आश्रम में जैसे ही वह अंदर पैर रखते, उनका स्टार का चोला उतर जाता, वह रजनीश के दूसरे शिष्यों की तरह हो जाते. उन दो दिनों में ध्यान और अन्य आश्रम कार्यक्रमों के बाद उन्हें बगीचों की सफाई के काम में तल्लीन देखा जाता. आश्रम के बाहर उनका ड्राइवर कार के साथ खड़ा होता. वह अंदर जमीन पर गिरे सूखे पत्ते उठाकर कूड़ेदान में डालते देखे जाते. आश्रमवासियों के बीच वह स्वामी विनोद भारती थे, उन्हीं सबकी तरह. सबसे मुस्कुराकर आत्मीयता से मिलने वाले.

Vinod khanna, Osho
बाहर उनका ड्राइवर मर्सीडिज में बैठकर उनका इंतजार करता था और वो दो दिन के लिए पुणे के ओशो आश्रम में आकर रजनीशी चोले में आश्रम के माली का काम करते थे. जो लोग उन्हें ऐसा करते देखते, वो अचरज में आ जाते कि इतना बड़ा स्टार ये काम कर रहा है.


उनकी नजर में रजनीश भगवान थे
बॉलीवुड के पुराने फिल्म पत्रकार याद करते हैं कि किस तरह विनोद शूटिंग पर भी रजनीशी चोले में पहुंचते थे. इसे तभी उतारते जब सेट शॉट के लिए पूरी तरह तैयार हो जाता. मिलने वालों से यही कहते, रजनीश धरती पर इकलौते जीवित भगवान हैं. 80 के दशक की शुरुआत में पुणे के रजनीश आश्रम में दिक्कतों की खबरों आने लगी थीं. स्थानीय प्रशासन का रुख कड़ा था. रातों-रात रजनीश के अमेरिका के ओरेगान जाने की खबर आई. वह प्रिय शिष्यों को वहां साथ रखना चाहते थे. विनोद खन्ना से भी चलने को कहा.

विनोद खन्ना ने बॉलीवुड छोड़कर ओरेगान जाने का ऐलान किया
प्रेस कांफ्रेंस में सभी को जो अंदाज था, वही हुआ. विनोद खन्ना ने बॉलीवुड छोड़कर ओरेगान के रजनीशपुरम जाने की घोषणा कर दी. उन्होंने कहा- मैं फिल्में छोड़ रहा हूं. फिर अपना परिवार भारत में छोड़कर चले गए.

ओरेगान में स्वामी विनोद भारती को माली का काम मिला. वह सुबह जल्दी उठते. पौधों को पानी देते. कांटते-छांटते. गार्डन की देखरेख करते. उस दौरान विनोद खन्ना की खबरें आनी बंद हो गईं. हालांकि जब कोई भारतीय अतिथि ओरेगान के रजनीशपुरम में जाता तो विनोद उससे यही कहते, मैं ओशो का माली हूं. ओरेगान के रजनीशपुरम में उन्हें एक छोटा सा कमरा मिला. छह गुणा चार फुट का. वह इसी में खुश और संतुष्ट थे.

Vinod khanna, osho
कहां तो वो मुंबई में बड़े बंगले के मालिक थे, जिंदगी किंगसाइज थी. दौलत-शौहरत सबकुछ थी लेकिन जब वो अमेरिका के ओरेगान स्थित ओशो के आश्रम में गए तो वहां उन्हें छह फुट लंबा और चार चौड़ा कमरा मिला, लेकिन वो इसी में खुश थे. (सौजन्य-ओशो न्यूज)


फिर विनोद सफेद दाढ़ी के साथ भारत लौट आए

1985 में फिर एक दिन वह वापस लौट आए. एक भारतीय पत्रिका के कवर पर सफेद दाढी में उनकी तस्वीर छपी. कई तरह की बातें उड़ीं. मसलन - उनके पास पैसा खत्म हो चुका है. रजनीश से उनके मतभेद हो गए हैं. दरअसल वर्ष 85 उथल-पुथल भरा था. बचपन की दोस्त गीतांजलि, जिससे शादी की थी, उससे तलाक गया. रजनीश को अमेरिकी सरकार ने वापस भेज दिया था. वह रजनीश से ओशो के रूप में रूपांतरित होकर 1987 में वापस पुणे लौट आए.

वो अमिताभ से ज्यादा पैसे लेने लगे फिर राजनीति में आ गए
जब विनोद लौटे तो लगातार यही कहा कि वह ताजिंदगी ओशो से जुड़े रहेंगे. ऐसा ही हुआ भी. वह लगातार पुणे जाते रहे. उन्होंने फिर फिल्में करनी शुरू कर दीं.  निर्माताओं की कतार उनके घर पर जुटने लगी. आते ही उन्होंने जितने पैसे लेने शुरू किए, वो अमिताभ बच्चन के बाद सबसे ज्यादा रकम थी. हालांकि वह राजनीति की ओर भी मुड़ गए. 1997 में गुरदासपुर से लोकसभा का चुनाव लड़ा और अटल सरकार में पर्यटन राज्यमंत्री बने.

Vinod khanna, Osho
सौजन्य- ओशो लाइफ


विनोद खन्ना के निधन पर क्या थी ओशो आश्रम की प्रतिक्रिया

27 अप्रैल 2017 को जब मुंबई में विनोद खन्ना का निधन हुआ. तो ओशो आश्रम की आधिकारिक वेबसाइट पर उसी दिन एक सूचना प्रसारित हुई, हम स्वामी विनोद भारती की याद में कोरेगांव पार्क में एक संगीतमय कीर्तन आयोजित करेंगे. आश्रम की पुस्तिका पर ओशो संन्यासियों ने अपने अनुभवों को लिखकर उन्हें याद किया.
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