Vishwanath Pratap Singh Birthday: राजनैतिक भूचाल ला दिया था मांडा के राजा ने

वीपी सिंह (VP Singh) को हमेशा गरीबों के लिए कुछ करने का प्रयास करते देखा गया था. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

Vishwanath Pratap Singh Birth anniversary: मांडा के राजा (King of Manda) कहे जाने वाले सिंह को मंडल कमीशन (Mandal Commission) जैसे विवादास्पद और साहसिक फैसले लेने के लिए जाना जाता है.

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    विश्वनाथ प्रताप सिंह (Vishwanath Pratap Singh) भारत के 7वें प्रधानमंत्री (7th PM of India) बने थे. उन्हें भारत की राजनीति के साथ देश का परिदृश्य ही बदलने के लिए जिम्मेदार माना जाता है. वे भारत के एकमात्र ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो पूर्व में किसी रियासत के राजा रहे थे. 25 जून को उनका जन्मदिवस है. आइए जानते हैं कि कैसे मांडा के राजा (King of Manda) ने भारत की राजनीति में हलचल मचाकर प्रधानमंत्री की कुर्सी पाई और कैसे उन्होंने प्रधांनमंत्री बनने के बाद ऐसे फैसले लिए जिसने देश की राजनीति की दिशा और दशा दोनों बदल गई.

    मंत्री पद छोड़ उसी सरकार के खिलाफ
    विश्वनाथ प्रताप सिंह को लोग कांग्रेस की उस मजबूत सरकार को ढहा कर खुद प्रधानमंत्री बनने वाले व्यक्ति के रूप में जानते हैं जिसमें वे खुद वित्तमंत्री और रक्षामंत्री रह चुके थे. इसके अलावा बहुत से लोग उन्हें मंडल का मसीहा के रूप में जानते हैं जिन्होंने मंडल कमीशन लागू किया था. इसके अलावा भी उनके प्रधानमंत्रित्व काल में कई घटनाएं ऐसी भी हुई जिनके लिए उन्हें जिम्मेदार माना जाता है.

    कांग्रेस से गहरा नाता
    सिंह 1969 में कांग्रेस से जुड़े उसके बाद वे लोकसभा सदस्य भी रहे. 1980 में वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. उनके कार्यकाल में फूलन देवी गैंग का खात्मा किया था. राजीव गांधी के शासन में वे देश के वित्तमंत्री रहे थे और उन्हीं के कार्यकाल में मशहूर बोफोर्स घोटाला उजागर हुआ था. जिसके बाद उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था. बोफोर्स घोटाले के कारण ही वे कांग्रेस से अलग हुए 1988 में जनता दल नाम की नई पार्टी बनाई और 1989 चुनावों में  उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से राष्ट्रीय मोर्चा के सरकार बनाई.

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    1989 में कांग्रेस को सत्ता से हटाने के लिए बोफोर्स घोटाला वीपी सिंह (VP Singh) का प्रमुख और कारगर हथियार साबित हुआ. (फाइल फोटो)


    प्रधानमंत्री की कुर्सी तक
    सिंह ने इस चुनाव में बोफोर्स मुद्दे को खूब उछाला था और कांग्रेस सहित राजीव गांधी पर इसमें शामिल होने के आरोप लगाए थे. बहुत से विश्लेषकों का मानना है कि सिंह ने बोफोर्स मुद्दे को अपने लिए सीढ़ी की तरह उपयोग किया जिससे वे प्रधानमंत्री बन सकें. फिर भी इसमें कोई दो राय नहीं कि वीपी सिंह को चुनाव में बोफोर्स मुद्दे का बहुत फायदा मिला था.

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    मंडल कमीशन का भूत
    संयुक्त मोर्चा सरकार में वैसे तो कई बेमेल साथी थे. लेकिन सिंह ने सबको साथ लिया और सरकार बनाई और उनका कार्यकाल कई विवादों के जन्म का कारण बना. इसमें सबसे प्रमुख है मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करना. इसके तहत उन्होंने पिछड़े वर्गों को 27 प्रतिशत आरक्षण अनिवार्य कर दिया था. इस फैसले से देश भर में हलचल मच गई थी. कई जगह विरोध प्रदर्शन हुए एक बार फिर जातिवाद की आग में देश झुलसता दिखा.

    1989 में विपरीत विचारधाराओं वाले दलों का सहयोग लेकर सरकार बनाना वीपी सिंह के लिए एक बड़ी उपलब्धि थी. (फाइल फोटो)
    1989 में विपरीत विचारधाराओं वाले दलों का सहयोग लेकर सरकार बनाना वीपी सिंह के लिए एक बड़ी उपलब्धि थी. (फाइल फोटो)


    मंडल का या गरीबों का मसीहा
    वीपी सिंह को मंडल का मसीहा भी कहा जाता है. ये सच है कि उनके साहसिक फैसला ऐसा ही था. उस दौर में उनके बयान यही बताते हैं कि वे खुद को पिछड़ों के बड़े पैरोकार की तरह पेश करते थे. वे हमेशा गरीबों के लिए कुछ ना कुछ करना तो चाहते थे, लेकिन करते भी थे. राजनैतिक विशेषज्ञों का मानना है कि उनका अचानक राजनैतिक पटल पर कमजोर होने की वजह उनका संगठनात्मक आधार ना होना था. उनके बहुत से सहयोगी या तो उनसे ही आगे निकलना चाहते थे. या फिर वे अपने स्वार्थ के लिए दूसरे राजनैतिक दलों में जा मिले थे.

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    लेकिन वीपी सिंह ने अपने राजनैतिक मूल्यों से समझौता नहीं किया. उन्हें कभी ऐसा प्रयास करते नहीं देखा गया जिससे लगे वे सत्ता में वापस आना चाहते हों सत्ता गंवाने के बाद वे राजनीति में वापस आने के लिए वैसे कुलबुलाते नहीं देखे जैसे की आमतौर पर राजनेता देखे जाते हैं. सत्ता खोने के कुछ साल बाद ही वे अपनी सेहत से जूझते नजर आए और साल 2008 में वे 77 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गए.

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