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Vishwanath Pratap Singh B’day: बहुत अलग ही तरह के नेता थे विश्वनाथ प्रताप सिंह

विश्वनाथ प्रताप सिंह (Vishwanath Pratap Singh) बहुत तेजी से राजनीति में उठे और तेजी से गायब भी हो गए. (फाइल फोटो)

विश्वनाथ प्रताप सिंह (Vishwanath Pratap Singh) बहुत तेजी से राजनीति में उठे और तेजी से गायब भी हो गए. (फाइल फोटो)

विश्वनाथ प्रताप सिंह (Vishwanath Pratap Singh) ऐसे राजनेता रहे जो बहुत ही अलग तरह से और अलग मुद्दों के कारण सुर्खियों में रहे. एक समय इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) के काफी खास नेता रहे सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री भी रहे. लेकिन बाद में खुद को कांग्रेस से अलग किया और संघर्ष का रास्ता चुनकर प्रधानमंत्री (Prime Minister) पद पहुंचे. उनका कार्यकाल विवादित घटनाओं और फैसलों से भरपूर रहा और वे सत्ता से बाहर होने के बाद खुद भी राजनैतिक पटल से गायब होते गए.

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    भारत के पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह (Vishwanath Pratap Singh) कई कारणों से याद किए जाते हैं जो उन्हें एक अलग ही किस्म के राजनेता की श्रेणी में पहुंचाते हैं कांग्रेस (Congress) के खास और इंदिरागांधी और राजीव गांधी (Rajeev Gandhi) के करीबी नेताओं में से एक रहे व्ही पी सिंह कांग्रेस से ऐसे अलग हुए कि उन्होंने कांग्रेस को सत्ता से भी बाहर कर दिया और चुनाव जीत कर खुद प्रधानमंत्री भी बने, लेकिन विवादों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. यह पूरी कहानी अपने आप में काफी रोचक है कि कैसे मंडा के राजा अचानक राजनैतिक सुर्खियों में आए, विवादों में रहे और फिर राजनैतिक परिदृश्य से गायब भी हो गए.

    राजपरिवार में जन्म
    विश्वनाथ प्रताप सिंह का जन्म 25 जून 1931 को उत्तरप्रदेश के इलाहबाद (अब प्रयागराज) जिले में  राजा बहादुर राय गोपाल सिंह के पुत्र के रूप में हुआ था, जो मंडा रियासत के राजा थे. कॉलेज के समय ही वे छात्र संगठन के उपाध्यक्ष बने. 1957 में उन्होंने भूदान आंदोलन में भाग लेते हुए अपनी जमीनें दान कर जिसका विवाद इलाहबाद उच्च न्यायालय तक पहुंच गया था.

    कांग्रेस के शीर्ष नेता
    राजनीति में उनकी गहरी रुचि शुरू से ही रही थी और 1969 में ही वे कांग्रेस से जुड़ गए और 1980 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी बन गए थे. इसके बाद 1983 में केंद्रीय वाणिज्य मंत्री भी बने. वे उस समय प्रधानमंत्री इंदिरागांधी के काफी करीबी नेताओं में गिने जाते थे. बाद में इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद वे देश के वित्तमंत्री तक बने.

    राजनैतिक जीवन का दूसरा दौर
    1987 तक सिंह कांग्रेस के शीर्ष नेता तो थे, लेकिन उसके बाद बोफोर्स घोटले ने सब कुछ बदल गिया और यहां से सिंह का एक अलग रूप दिखाई दिया. उन्होंने घोटले के कारण रक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दिया और बोफोर्स घोटाला का विरोध करते हुए कांग्रेस के भी विरोधी हो गए. उन्होंने जनता दल नाम की खुद की एक पार्टी बना ली.

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    विश्वनाथ प्रताप सिंह (Vishwanath Pratap Singh) एक समय इंदिरा गांधी के विश्वस्तों में से एक माने जाते थे. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

    चुनाव में जीत
    1989 के चुनावों में सिंह ने कांग्रेस और राजीव गांधी का का पुरजोर विरोध किया और बोफोर्स घोटाले के दोनों की ही जिम्मेदार ठहराते रहे. इस मुद्दे का उन्हें और उनकी पार्टी को बहुत फायदा मिला और  चुनाव में उनकी पार्टी को 144 सीटें मिली. इसके बाद जनता दल, वाम मोर्चा और भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बनाने का फैसला हुआ और वे  प्रधानमंत्री पद के लिए गए.

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    पिछड़ों के मसीहा
    लेकिन इस तरह से बेमेल पार्टियों की मिली जुली गठबंधन सरकार चलाना बहुत मुश्किल हो रहा था. उनके कार्यकाल में कश्मीरी हिंदुओं पर अत्याचार और पलायन की घटनाएं हुईं तो मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू करने के बाद वे खुद को एक मसीहा के तौर पर साबित करते से दिखे. उनके इस फैसले ने भारतीय राजनीति को एक अलग ही दिशा दे दी और कुछ लोगों के लिए मसीहा तो कुछ के लिए खलनायक बन गए.

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    विश्वनाथ प्रताप सिंह (Vishwanath Pratap Singh) अक्सर विवादों के कारण ही सुर्खियों में रहे. (फाइल फोटो)

    सरकार गिरने पर दिया इस्तीफा
    राम मंदिर के मुद्दे पर भाजपा विश्वनाथ प्रताप सिंह से नाराज हो गई और सिंह की सरकार को अपना बहुमत गंवाना पड़ा. सिंह ने खुद को अपने सिद्धांतों से समझौता ना करने वाले नेता के रूप में पेश किया. इसके बाद कांग्रेस ने चंद्रशेखर को समर्थन दिया जिससे समाजवादी जनता पार्टी की सरकार बनी, लेकिन यह सरकार जल्दी ही गिर गई और देश ने 1991 में आम चुनाव का समाना किया.

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    इसके बाद वीपी सिंह राजनैतिक परिदृश्य से गायब हो गए. इसकी सबसे प्रमुख वजहें थी राजीव गांधी की मौत, राममंदिर का ज्वलंत मुद्दा जिसमें मस्जिद का ढांचा गिरने के बाद वे इस मुद्दे पर चर्चा में नहीं दिखे. उनकी पार्टी के अन्य नेता अपने –अपने राज्यों में तो शीर्ष पर रहते हुए राष्ट्रीय राजनीति में दिखे, लेकिन व्हीपी सिंह गरीबों के लिए अपने कार्य करते रहे और राजनीति में दिखना कम होते गए. 1996 में एक बार फिर उन्हें संयुक्त मोर्चा के नेता के रूप में प्रधानमंत्री पद ऑफर हुआ, लेकिन उन्होंने इस बार इनकार कर दिया. बाद में उन्होंने  समाज सेवा और पेंटिंग परही ध्यान केंद्र रखा, स्वास्थ्य कारणों से वे सक्रिय राजनीति से पूरी तरह से दूर होगई और 27 नवंबर 2008 को उनका देहांत हो गया.

    Tags: India, Indian politics, Research, VP Singh Government

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