Finger print की तरह अलग होती है हमारी देखने की क्षमता, शोध ने बताया कैसे

Finger print की तरह अलग होती है हमारी देखने की क्षमता, शोध ने बताया कैसे
शोध के मुताबिक हम चीजों की जगहों के साथ उनके आकार को भी अलग तरीके से देखते हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

शोध में पाया गया है कि जैसे हर इंसान का फिंगरप्रिंट (Finger print) अलग होता है वैसी ही उसके चीजों को देखने का तरीका (Visual performance) भी अलग होता है.

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क्या हर इंसान (Humans) एक ही तरह से देखता है. अगर इस सवाल को इस तरह से पूछा जाए कि क्या हर इंसान एक ही चीज को एक ही तरह से देखता (Vision) है तो आप क्या जवाब देंगे. ताजा शोध ने अध्ययन कर यह पाया है कि इंसान चीजों की अलग अलग जगह पर देखते हैं यूसी बर्कले (UC Berkeley) के ताजा शोध के मुताबिक हमारी किसी एक जगह की स्थिति और किसी चीज के आकार को सुनिश्चित करने की क्षमता अलग-अलग होती है. यह हमारी नजर के दायरे (Field of vision) के हिसाब तक से बदल जाती है.

हम चीजों को वैसे ही नहीं देखते जैसी वे होती हैं
यूसी बर्कले में मनोविज्ञान के डॉक्टोरल छात्र जिजुआन वांग जो कि इस अध्ययन की प्रमुख लेखिका हैं, का कहना है, “हम मान कर चलते हैं कि जो हम समझ रहे हैं वह हमारे संसार का सटीक रिफ्लेक्शन है. लेकिन यह अध्ययन बताता है कि हममें से हरएक एक अलग विजुअल फिंगरप्रिंट है.”

इन क्षेत्रों में होगी इस शोध की अहमियत
यूसी बर्कले की विटनी लैबोरेटरी फॉर परसेप्शन एंड एक्शन में वांग और उनके सहयोगी शोधकर्ताओं की इस खोज का चिकित्सा, तकनीक, ड्राइविंग और खेलों में बहुत प्रभाव पड़ने वाला है जहां चीजों के स्थान को सटीकता से देखना बहुत अहम होता है. मिसाल के तौर पर यदि किसी ड्राइवर ने यह अंदाजा लगाने में गलती कर दी कि सड़क पार करने वाले व्यक्ति की सटीक स्थिति क्या है, तो इससे दुर्घटना हो सकती है. इसी तरह खेलों में भी नजर के गलत फैसले से विवाद हो सकता है.



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हर व्यक्ति के नजर का दायरा भी अलग होता है. (Photo-pixabay)


क्या जानने की हुई कोशिश
शोधकर्ताओं ने यह जानने का प्रयास किया कि क्या अलग-अलग लोग अपने आसपास की वस्तुओं को बिलकुल एक ही तरह से देख सकते हैं? जैसे क्या एक कॉफी के कप को देखते हुए दो लोग उसके सटीक स्थान पर सहमत हो सकते हैं? बहुत से प्रयोग करने के बाद पाया गया कि वे शायद सहमत न हों, लेकिन लोगों का उनके दिमाग के साथ संयोजन इस तरह का हो जाता है कि व्यवहारिक तौर पर कॉफी के कप की स्थिति कैसी भी हो, वे उसे सही तरह से उठा लेते हैं. वांग के अनुसार यह हमारे दिमाग की ट्रेनिंग होती है जिसकी वजह से हम जो देखते हैं उसके अनुसार हमारी गतिविधि की तालमेल बैठ जाता है.

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क्या अध्ययन किया शोधकर्ताओं ने
शोधकर्ताओं ने अपने प्रयोग में दृष्टि संबंधी स्थानीकरण का टेस्ट लिया. प्रतिभागियों को एक कम्प्यूटर स्क्रीन पर एक गोल निशाने की स्थिति बताने को कहा. एक दूसरे प्रयोग में प्रतिभागियों की नजर के दायरे की सटीकता में बदलाव जानने की कोशिश की गई. इसके लिए प्रतिभागियों को दो रेखाओं को देखकर बताना था कि क्या एक लाइन दूसरी लाइन के मुकाबले घड़ी की सुई की दिशा में हैं या फिर विपरीत दिशा में.

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शोध के नतीजे चिकित्सा, खेल, ड्राइविंग जैसे क्षेत्रों के लिए बहुत उपयोगी है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


एक प्रयोग यह भी
आकार नापने कि प्रयोग में प्रतिभागियों ने अलग-अलग लंबाई के चाप (Arc) देखकर उनकी लंबाई का अनुमान लगाया.  कुछ स्थिति में एक लंबाई की चापों को लोगों को बड़े दिखे तो किसी स्थिति में छोटे, जबकि वे एक ही लंबाई के थे.

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इन प्रयोगों से साफ हुआ कि हर व्यक्ति की दृष्टि अलग-अलग होती है यहां तक कि हर व्यक्ति की दृष्टि का फिंगरप्रिंट अलग होता है. वांग का कहना है कि इस अंतर का स्रोत मस्तिष्क हो सकता है.  लेकिन इस मामले में आगे न्यूरल आधार पर अध्ययन करने की जरूरत है. लेकिन अहम बात यह है कि हम इसकी वजह से होने वाली गलतियों के हिसाब से ढलने की कोशिश करते हुए काम करते हैं.
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