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सेना और CCTV ही नहीं, रूसी राष्ट्रपति पुतिन की सुरक्षा में तैनात हैं शिकारी परिंदों की फौज

क्रेमलिन में राष्ट्रपति भवन की सुरक्षा में पक्षियों की तैनाती भी की गई- सांकेतिक फोटो (Pixabay)
क्रेमलिन में राष्ट्रपति भवन की सुरक्षा में पक्षियों की तैनाती भी की गई- सांकेतिक फोटो (Pixabay)

रूस में बाज और उल्लू जैसे पक्षियों को भी राष्ट्रपति भवन (presidential house in Russia) की सुरक्षा में तैनात किया गया. ये पक्षी फेडरल गार्ड सर्विस (FGS) का हिस्सा हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 5, 2020, 10:05 AM IST
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रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Vladimir Putin) आएदिन किसी न किसी वजह से सुर्खियों में रहते हैं. खासकर उनका आक्रामक रवैया हमेशा चर्चा में रहा. अब पता चला है कि पुतिन जहां रह रहे हैं, वहां यानी क्रेमलिन (Kremlin) में राष्ट्रपति भवन की सुरक्षा में पक्षियों की तैनाती भी की गई है. बाज और उल्लू जैसे पक्षियों को ट्रेनिंग गई कि वे आने-जाने वाले पर निगाह रख सकें और खतरे के हालात में अलर्ट कर सकें.

दशकों से हो रही है तैनाती
साल 1984 से ये पक्षी FGS का हिस्सा हैं. रेप्टर नाम का शिकारी परिंदा इस स्क्वाड का लीडर है. इसके अलावा टीम में फिलहाल 10 से ज्यादा बाज और उल्लू हैं. इन बाजों और उल्लुओं को सुरक्षा के लिहाज से खास तरह की ट्रेनिंग दी गई है.

टीम में फिलहाल 10 से ज्यादा बाज और उल्लू हैं- सांकेतिक फोटो (Pixabay)

पहले अलग मकसद था


हालांकि शुरुआत में शिकारी पक्षियों की तैनाती का मकसद कुछ और ही था. राष्ट्रपति भवन के आसपास कौओं और दूसरे छोटे पक्षियों का झुंड मंडराता रहता था. वे खाने की तलाश में आया करते थे. हालांकि राष्ट्रपति भवन में बचे हुए खाने को फेंकने की व्यवस्था काफी बढ़िया थी लेकिन इसके बाद भी कौओं का आना कम नहीं हुआ.

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सारे प्रयास रहे बेकार
तत्कालीन सोवियत संघ के शुरुआती दौर में इमारतों की सुरक्षा के लिए कौओं को मार गिराने या दूर भगाने वाले गार्ड रखे गए थे. साथ ही उन्हें डराने के लिए शिकारी परिदों की रिकॉर्डेड आवाज का भी इस्तेमाल किया गया था, परंतु ये सभी तरीके बेकार साबित हुए और कौओं का आना जारी रहा.

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किताब में भी है जिक्र
इस बारे में सोवियत संघ के दौरान राष्ट्रपति भवन के सुपरिंटेंडेंट रहे पावेल मेल्कॉव ने अपने किताब में भी इस समस्या का जिक्र किया है. लेनिन ने आने के बाद गौर किया कि केवल कौओं को मारने के लिए रूस कितना गोलाबारूद और मैनपावर बेकार कर रहा है. तब उन्होंने ही इसपर रोक लगाने की बात की. हालांकि इससे समस्या तो खत्म होनी नहीं थी.

रूस का राष्ट्रपति भवन


परिंदों की फौज हुई तैनात
साफ-सफाई के लिए जाने जाते रूसियों को डर हुआ कि कौओं के कारण कहीं बीमारियां भी न फैलने लगे. इसे देखते हुए ही क्रेमलिन में शिकारी परिंदों की तैनाती की तैयारी हुई. यानी बनाने के पीछे कारण किसी दुश्मन की शातिर चालों को नाकाम करना नहीं बल्कि कौओं व अन्य पक्षियों के बीट व मूत्र और अन्य गंदगी से राष्ट्रपति भवन और वहां बनी सरकारी इमारतों को इस नुकसान और गंदगी से बचाना था.

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अब FGS में चुन-चुनकर ऐसे शिकारी पक्षी रखे जा रहे हैं, जिनकी अलग-अलग खासियत हो. जैसे कोई रात में शिकार करता हो तो कोई दिन का शिकारी हो. पक्षियों को कौओं को मारने या भगाने की अलग से ट्रेनिंग मिलती है. इसके लिए कई सारे प्रशिक्षणकर्ता भी तैनात हैं. वे ध्यान रखते हैं कि ट्रेनिंग के दौरान इन बड़े पक्षियों को किसी तरह का नुकसान न हो.

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ड्रोन मार गिराने का भी प्रशिक्षण
साथ ही साथ अब बाज जैसे परिदों को दुश्मन की चाल नाकाम करने का भी प्रशिक्षण मिल रहा है. इन शिकारी परिंदों को अब एक विशेष प्रकार की ट्रेनिंग दी जा रही है ताकि अगर कोई छोटा ड्रोन भी राष्ट्रपति भवन के आसपास दिखाई दे तो वो उससे भी निपट सकें. विदेशी ड्रोनों को पहचानने की भी इन्हें ट्रेनिंग दी गई है ताकि वे दोनों में फर्क कर दुश्मन के जासूसी ड्रोन को ही निशाना बनाएं.

उल्लुओं की फौज रात में नजर रखने का काम करती है- सांकेतिक फोटो (pxhere)


दूसरे देश भी ले रहे सबक
रूस के अलावा फ्रांस और नीदरलैंड्स की पुलिस ने भी जासूसी ड्रोन को मार गिराने के लिए इस तरह के एंटी-ड्रोन प्रोग्राम शुरू कर दिए हैं. हालांकि फिलहाल इनकी सफलता के बारे में ज्यादा चर्चा नहीं हो रही है.

वैसे परिंदों का इस्तेमाल जासूसी में हमेशा से किया जाता रहा. बहुत से देश जासूसी के लिए कबूतरों का सहारा लेते रहे हैं.कबूतरों की एक प्रजाति, जिसे Racing Homer कहते हैं, एक बेहद खास कबूतर होते हैं. उन्हें इस तरह से ट्रेन किया जाता है कि वे तेजी से उड़े और गंतव्य तक पहुंचकर वापस लौट सकें. पहले और दूसरे वर्ल्ड वॉर के दौरान कबूतरों की इसी प्रजाति को एक से दूसरी तरह जासूसी या संदेश पहुंचाने के इस्तेमाल किया गया.

लाखों कबूतरों को मिली नौकरी
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान कबूतरों का इस्तेमाल बढ़ा. तब यूएस और ब्रिटेन में कबूतर पालन करने वालों ने अपने सारे पक्षी सेना को दे दिए थे. तब ब्रिटिश सेना ने ढाई लाख के लगभग कबूतरों को नौकरी पर रखा था. तब 32 कबूतरों को उनकी बहादुरी के लिए Dickin Medal भी मिला था. अमेरिका के Central Intelligence Agency (CIA) ने पीजन मिशन शुरू कर दिया, जिसका मकसद ही था कबूतरों को ट्रेन्ड करके उनसे जासूसी करवाना. The Smithsonian में इसका जिक्र मिलता है कि सेना इसके लिए एनिमल ट्रेनर्स को नियुक्त करती थी, जो कबूतरों को जासूसी सिखाते थे.
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