क्या वाकई भारतीय संस्कृति में समलैंगिकता नहीं रही है, हैरत में पड़ जाएंगे

खजुराहो के मंदिर की दीवारों पर समलैंगिक पुरुष और महिलाओं की भावपूर्ण मूर्तियां खूब नजर आ जाती हैं.

खजुराहो के मंदिर की दीवारों पर समलैंगिक पुरुष और महिलाओं की भावपूर्ण मूर्तियां खूब नजर आ जाती हैं.

समलैंगिकों की शादी को लेकर केंद्र सरकार ने हाईकोर्ट में हलफनामा पेश करके कहा है कि ये हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं रहा है. क्या वाकई है. हालांकि हमारे कुछ ग्रंथों और पौराणिक कहानियों में समलैंगिकता और ऐसी शादियों का उल्लेख हुआ है. जानें पुराण और पौराणिक कहानियां क्या कहती हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 25, 2021, 5:29 PM IST
  • Share this:
केंद्र ने हाईकोर्ट में समलैंगिक शादियों के लिए हिंदू मैरिज एक्ट के तहत अनुमति देने का विरोध किया है. केंद्र ने इस बारे में दिल्ली हाईकोर्ट में एक हलफनामा दायर करके कहा है कि ये भारतीय संस्कृति और लोकाचार से मेल नहीं खाता है.

बता दें कि एलजीबीटी (Lesbian-Gay-Bisexual and Transgender-LGBT) समुदाय से जुड़े लोगों ने दिल्‍ली हाइकोर्ट में याचिका दाखिल कर स्पेशल मैरिज एक्ट और हिंदू मैरिज एक्ट के तहत समलैंगिक शादी को मान्यता देने की मांग की है. जबकि इस मामले की सुनाई दिल्‍ली हाईकोर्ट में जस्टिस राजीव सहाय एंडला की बेंच कर रही है.

क्या वाकई भारतीय संस्कृति में समलैंगिकता की जगह रही है. ये एक बड़ा सवाल है. वैसे ये बात सच है कि दुनियाभर में तमाम धर्मों और समाज में इसके बारे में विचार नकारात्मक ही रहे हैं. अगर भारतीय समाज के नजरिए की बात करें तो ये पुख्ता तौर पर निगेटिव रहा है. हालांकि इसके पीछे बहुत तार्किक और वैज्ञानिक आधार नहीं दिए गए.



दुनिया की ज्यादातर संस्कृतियों में रही है समलैंगिकता
इतिहास की बात करें तो दुनिया की ज्यादातर संस्कृतियों में समलैंगिकता मौजूद रही है. भारतीय संस्कृति में भी ये कुछ हद तक रही है. प्रसिद्ध मानवशास्त्री मार्गरेट मीड के अनुसार आदिम समाजों में समलैंगिकता प्रचलन में थी. रोमन सभ्यता में भी इसे बुरा नहीं माना गया, वहीं प्राचीन यूनान में तो इसे मान्यता ही मिली हुई थी. मानवीय सभ्यता के शुरुआती दौर में समलैंगिकता न कोई अप्राकृतिक काम था न ही कोई अपराध.

जो अप्राकृतिक दिखता है वो प्राकृतिक है
ऋग्वेद की एक ऋचा के अनुसार ‘विकृतिः एव प्रकृतिः’, यानी जो अप्राकृतिक दीखता है वह भी प्राकृतिक है. अक्सर समलैंगिकता की पैरवी करने वाली इस बात को सामने भी रखते हैं. उनके अनुसार ‘विकृतिः एव प्रकृतिः का मतलब ही है कि प्राचीन भारत समलैंगिकता के प्रति सहिष्णु रहा है.

है समलैंगिकता और किन्नरों का उल्लेख
रामायण, महाभारत से लेकर विशाखदत्त के मुद्राराक्षस, वात्स्यायन के कामसूत्र तक में समलैंगिकता और किन्नरों का उल्लेख है. हालांकि इन्हें सहज सम्मान की दृष्टि से तो नहीं देखा जाता था लेकिन कहीं इनके अतिशय अपमान का भी उल्लेख नहीं मिलता है.

क्या है बराहमिहिर के ग्रंथ वृहत जातक में
बारहवीं सदी में बराहमिहिर ने अपने ग्रंथ वृहत जातक में कहा था कि समलैंगिकता पैदाइशी होती है. इस आदत को बदला नहीं जा सकता है. आधुनिक वैज्ञानिक शोधों से भी यह बात साबित हो चुकी है कि समलैंगिकता अचानक पैदा हुई आदत या विकृति नहीं है, बल्कि यह पैदाइशी होती है.

वात्सायन ने कामसूत्र में किया है उल्लेख
गुप्त काल में वात्स्यायन ने जब कामसूत्र की रचना की तो उन्होंने साफ लिखा कि किस तरह से उनके मालिक, सेठ और ताकतवर लोग नौकरों, मालिश करने वाले नाइयों के साथ शारीरिक संबंध बना लेते थे. वैसे मध्य काल और उसके बाद भारत में तमाम राजवंशों में इससे जुड़े किस्से खूब प्रचलन में रहे हैं.

जब विष्णु मोहिनी बनकर शिव को रिझाते हैं
भारतीय संस्कृति में ही महादेव शिव का एक रूप अर्धनारीश्वर वाला भी है. मिथकीय आख्यान कहते हैं कि एक बार विष्णु मोहिनी स्त्री रूप धारण कर शिव को रिझाते हैं. इससे उन्हें पुत्र अयप्पा की प्राप्ति होती है. महाभारत में अर्जुन की मर्द से बृहन्नला बन जाते हैं. भगीरथ की दो रानियों के संबंध से उत्पन्न हुए पुत्र की कहानी भी पौराणिक कहानियों में सुनी कही जाती रही है.

राजा इल स्त्री बन गए और पुत्र को जन्म भी दिया
पुराणों में राजा इल के स्त्री रूप में ऋषि बुध के रीझने और उससे एक पुत्र प्राप्ति की कहानी भी है. पुराणों में बुध के विवाह के विषय में इसका रोचक तरीके से वर्णन किया गया है.

कथा के अनुसार राजा इल एक बार शिकार खेलने वन में गये. अनजाने में ही वह अम्बिका नामक वन में पहुंच गये. अम्बिका वन भगवान शिव द्वारा शापित था. एक बार शिव और पार्वती इस वन में विहार कर रहे थे. उसी समय ऋषियों का एक समूह वन में आ पहुंचा. इससे पार्वती शरमा गईं. शिव जी को ये अच्छा नहीं लगा और उन्होंने शाप दे दिया कि शिव परिवार के अलावा अम्बिका वन में जो भी प्रवेश करेगा वह स्त्री बन जाएगा.

शिव के शाप के स्त्री बने और बुध मोहित हो गए
भगवान शिव के शाप के कारण राज इल स्त्री बन गए. अपने बदले रूप को देखकर इल बहुत दुःखी हुए. वन से बाहर निकलने पर उनकी मुलाकात बुध से ई. ऋषि बुध राज इल के स्त्री रूप पर मोहित हो गए. इल ने अपना नाम ईला रख लिया. बुध से विवाह कर लिया. ईला और बुध से पुरूररवा का जन्म हुआ. पुराणों में बताया गया है कि पुरूरवा बड़े होकर राजा बने, इनकी राजधानी गंगा तट स्थित प्रयाग थी.

बेटे ने फिर वापस पुरुष रूप दिलाया
राजा पुरूररवा को एक दिन माता ईला ने दुःखी होकर अपने स्त्री बनने की कथा बतायी. इसके बाद पुरूरवा ने निश्चय किया कि वह अपनी माता को वास्तविक रूप में लाने की कोशिश करेंगे. इसके लिए पुरूरवा ने गौतमीगंगा यानी गोदावरी तट पर शिव की उपासना की. पुरूरवा की उपासना से प्रसन्न होकर शिव और पार्वती प्रकट हुए. वरदान मांगने के लिए कहा.

पुरूरवा ने शिव से कहा कि उनकी माता ईला पुनः राजा इल बन जाए. इस पर भगवान शिव ने वरदान दिया कि गौतमी गंगा में स्नान करने से ईला फिर इल बन जाएगी. ईला ने गौतमी गंगा में स्नान किया और पुनः राजा इल बन गयी.

वैदिक शास्त्रों में हुआ है समलैंगिकता का जिक्र
अमरा दास विल्हम की किताब तृतीय प्रकृति - पीपुल ऑफ थर्ड सेक्स कई सालों के गहन शोध के बाद लिखी गई. इसमें उन्होंने संस्कृत में लिखे उन ग्रंथों का गहन अध्ययन किया जो प्राचीन और मध्य भारत में लिखे गए. उन्होंने ये साबित किया कि समलैंगिकता की प्रवृत्ति भारतीय समाज में भी हमेशा से रही लेकिन उन्हें बहुत कम स्वीकार किया गया.

दूसरी सदी में लिखे गए भारतीय ग्रंथ "कामसूत्र" के "पुरुषायिता" अध्याय में किताब एक ऐसी समलैंगिक स्त्रियों का जिक्र करती है, जिन्हें स्वर्णिनिस कहा जाता था. ये महिलाएं अक्सर दूसरी स्त्रियों से शादी कर लेती थीं और बच्चा पालती थीं.

खजुराहों की दीवारों पर भी चित्रण 
अगर खजुराहों के मंदिरों की दीवारों पर बनी तमाम मुद्राओं की मूर्तियों को देखेंगे तो उसमें समलैंगिक पुरुषों और महिलाओं का चित्रण भी खूब हुआ. वो उसी भाव में नजर आते हैं. माना जाता है कि ये मंदिर 12वीं शताब्दी में बनाए गए थे.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज