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#MissionPaani: अगर इन उपायों को अपनाया जाए तो खत्म हो सकता है पानी का संकट

पानी को लेकर गंभीर पॉलिसी बनाए जाने की जरूरत है

पानी को लेकर गंभीर पॉलिसी बनाए जाने की जरूरत है

भारत पानी की भीषण समस्या से जूझ रहा है. इसमें पॉलिसी लेवल के बदलाव की जरूरत है. महाराष्ट्र में इस दिशा में पहली बार काम हो रहा है. इस दिशा में बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है.

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    भारत एकसाथ कई समस्याओं से जूझ रहा है. पानी की समस्या उनमें से एक है. हालात बुरे हैं. लेकिन कहते हैं कि कभी कभार बुरे हालात से ही नए रास्ते निकलते हैं. मसलन 90 के दशक में जब देश भीषण आर्थिक संकट से गुजर रहा था तो संकट से ही रास्ता निकला. ओपन मार्केट पॉलिसी को अपनाकर देश आर्थिक संकट से उबर पाया. पानी को लेकर अभी इसी तरह की पॉलिसी पर विचार करने की जरूरत है. ऐसा भी नहीं है कि इस दिशा में कदम नहीं उठाए जा रहे हैं.

    पॉलिसी लेवल पर पानी को कई बड़े कदम इसी महीने उठाए गए हैं. मसलन महाराष्ट्र में एक बड़ा बदलाव हुआ है. महाराष्ट्र के बारामती इलाके में अतिरिक्त पानी की सप्लाई रोक दी गई है. ये शरद पवार का संसदीय क्षेत्र है. पावरफुल संसदीय क्षेत्र होने की वजह से यहां पानी की अतिरिक्त सप्लाई होती रही है. इसकी वजह से अन्य इलाकों में पानी का सही बंटवारा नहीं हो पा रहा था. ये अब तक संभव नहीं हो पाया था.

    पानी की समस्या से निपटने का एक और उपाय है किसानों को गन्ने की खेती के प्रति हत्सोहित करना. गन्ने की फसल में पानी की काफी जरूरत होती है. महाराष्ट्र जैसे पानी की समस्या से जूझ रहे इलाकों में गन्ने की फसल पानी के संकट को बढ़ाने वाला है. लेकिन ऐसे मसलों पर राजनीतिक विरोध सामने आता है. इस बारे में थोड़ा सख्ती बरतते हुए वाटर रेग्यूलेटरी का कहना है कि पानी की किल्लत की स्थिति में सभी इलाकों में इसका बराबर का बंटवारा होगा.

    महाराष्ट्र में पहली बार पानी के संकट पर गंभीरता से हो रहा है काम

    पानी की समस्या से निपटने के लिए देश ने पहला कदम महाराष्ट्र में ही उठाया था. महाराष्ट्र में 2015 में पहली बार वाटर रेग्यूलेटरी अथॉरिटी (WRA) बनी थी. समस्या की गंभीरता को देखते हुए इस सरकार ने भी कदम उठाए हैं. पहली बार ऐसा हुआ है कि केंद्र में जल शक्ति मंत्रालय के नाम से अलग मंत्रालय बना है. महाराष्ट्र के उदाहरण का फायदा देश के अन्य राज्य भी उठा सकते हैं.

     water crisis in india pani problem what is solution of water crisis and chalanges of policy level facing india today

    देश के अन्य छह राज्यों- अरुणाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, जम्मू कश्मीर केरल और गुजरात वाटर रेग्यूलेटरी अथॉरिटी बनाने को तैयार थे. लेकिन सिर्फ महाराष्ट्र ही ऐसा कर पाया. जुलाई 2018 तक अन्य सभी राज्य इस बारे में नीतिगत फैसले ही ले रहे थे. पानी की कीमत और उसके बंटवारे को लेकर. महाराष्ट्र की वाटर रेग्यूलेटरी अथॉरिटी ने भी बहुत अधिक कामयाबी नहीं पाई है.

    बारामती के इलाके में अतिरिक्त पानी देने से रोकना, हाल फिलहाल में उठाया गया अथॉरिटी का बड़ा कदम है. पानी के संकट ने अथॉरिटी को प्रासंगिकता और मजबूती दी है. इस दिशा में अभी और सुधार की जरूरत है. 14 जुलाई 2017 को महाराष्ट्र वाटर रिसोर्सेज रेग्यूलेटरी अथॉरिटी ने म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन ऑफ ग्रेटर मुंबई को एक नोटिस भेजा. नोटिस में लिखा गया था कि ग्राउंड वाटर के गैरकानूनी तरीके से अत्यधिक इस्तेमाल को रोकने के लिए क्या किया जा रहा, इस बारे में जानकारी दी जाए. लेकिन इस नोटिस का कोई जवाब नहीं दिया गया क्योंकि वहां का वाटर टैंकर माफिया काफी ताकतवर है. वाटर टैंकर माफिया की अकेले मुंबई से हर साल करीब 10 हजार करोड़ की कमाई होती है.

    पानी को लेकर सख्त पॉलिसी बनाए जाने की जरूरत है

    जनवरी 2018 में महाराष्ट्र वाटर रिसोर्सेज रेग्यूलेटरी अथॉरिटी ने एक आदेश जारी किया. आदेश में कहा गया था कि पानी के उपयोग के वॉल्यूम के आधार पर कीमतें तय की जाए. कई राउंड की बातचीत के बाद ये तय हो पाया था. लेकिन आदेश के पारित हो जाने के बाद भी इस दिशा में कुछ नहीं किया गया. पुराने तरीके से ही फ्लैट रेट पर पानी की कीमतें वसूली गईं, चाहे कितने भी वॉल्यूम में पानी का उपयोग हो रहा हो. इसकी वजह ये बताई गई कि राज्य के पास इस बात का पता लगाने का कोई मैकेनिज्म नहीं था कि किस वॉल्यूम में पानी का उपयोग हो रहा है.

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    पानी की समस्या दिन ब दिन विकराल होती जा रही है


    पानी की कीमतें तय करने वाला महाराष्ट्र पहला राज्य है. इस दिशा में सरकार ने साउथ आस्ट्रेलिया से मदद ली है. लेकिन अभी तक इसका मैकेनिज्म तैयार नहीं हो सका है कि ग्राउंड वाटर के दोहन को किस तरह से मापा जाए. इस दिशा में इजरायल की सरकार से सलाह ली जा रही है. सेंसिंग तकनीक के जरिए इस बात का पता लगाया जा सकता है कि ग्राउंड वाटर का कितना दोहन किया जा रहा है. उम्मीद की जाती है कि सरकार भूजल और सतह के जल दोनों को मापने के तरीके को विकसित कर पाए. ताकि पानी का सही तरीके से बंटवारा हो और उसकी सही कीमतें तय की जा सके.

    बेहतर तकनीक की बदौलत बदले जा सकते हैं हालात

    इस ओर अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है. वाटर रेग्यूलेटरी एक्ट में ऐसा प्रावधान है, जिसके जरिए अथॉरिटी पानी से संबंधित हर डिपार्टमेंट से जानकारी लेकर समस्या का बेहतर तरीके से आकलन कर सकती है. कृषि, वाटर रिसोर्सेज, वाटर कंजर्वेशन, पीने के पानी की सप्लाई करने वाला विभाग, शहरी विकास जैसे विभागों से पानी को लेकर डाटा इकट्ठा किया जा सकता है. इस तरह के डाटा से समस्या की जड़ तक पहुंचने में मदद मिलेगी. वेब बेस्ट अप्लीकेशन फॉर्मेट में ऐसे डाटा के कलेक्शन से ज्यादा मदद मिलेगी. ताकि रियल टाइम में संबंधित डिपार्टमेंट डाटा हासिल कर सके. ऐसा पहली बार महाराष्ट्र में हो रहा है जिसमें पंचायत और तहसील स्तर पर बारिश के पानी की मॉनिटरिंग रियल टाइम बेसिस पर की जा रही है.

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    पानी को लेकर गंभीरता से सोचना होगा


    महाराष्ट्र वाटर रिसोर्सेज रेग्यूलेटरी अथॉरिटी की सफलता और विफलता पर अन्य राज्यों की नजर है. इसी के जरिए पानी की पॉलिसी तय की जा सकती है. आजादी के 70 वर्षों बाद पहली बार पानी की समस्या को लेकर गंभीरता से काम हो रहा है. हालांकि इसमें गति हासिल करने में अभी भी महीनों या वर्षों का वक्त लग सकता है.

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