जितना दिख रहा उससे भयानक है देश में जलसंकट, कैसे निपटा जाए?

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Updated: August 27, 2019, 2:40 PM IST
जितना दिख रहा उससे भयानक है देश में जलसंकट, कैसे निपटा जाए?
भारत में जलसंकट कई मोर्चों पर है.

#MissionPaani: जलसंकट (Water Crisis) को लेकर नीतियों के स्तर पर और फिर उनके लागू होने के स्तर पर कैसे आगे बढ़ा जाना चाहिए? जानें इस बारे में पानी मामलों से जुड़े विशेषज्ञ (Expert) क्या कहते हैं...

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भारत के सामने पानी से जुड़ी समस्याएं एक नहीं बल्कि कई मोर्चों पर हैं. हमारे पास पानी से जुड़े ठीक आंकड़े तक नहीं हैं, पानी को लेकर पर्याप्त नीतियां और सक्षम संस्थाएं नहीं हैं, भूमिगत जलस्तर की समस्या फोकस में नहीं है, बांधों की अपनी एक कहानी है और शहरों में पानी के लगातार दोहन का अपना ही रोना है. भारत में जलसंकट जितना दिख रहा है, क्या उससे ज़्यादा भयानक है? पानी से जुड़े मामलों के विशेषज्ञ हिमांशु ठक्कर के साथ सीएनबीसी ने एक टेलिफोनिक साक्षात्कार किया, उसके महत्वपूर्ण अंश.

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सवाल : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' में लोगों से पानी बचाने की अपील की. क्या आपको लगता है कि भारत में गहराते जलसंकट की दिशा में इस अपील से देश का ध्यान जाएगा?
जवाब : प्रधानमंत्री की इस अपील का स्वागत किया जाना चाहिए और उन्होंने भी जिस बात पर ज़ोर दिया, वह यह कि बारिश के पानी का संरक्षण किया जाए. हालांकि उन्हें पहले ये देखना चाहिए कि कितनी सरकारी इमारतों में रेनवॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम है. और इसकी शुरूआत भी दिल्ली स्थित श्रम शक्ति भवन से होना चाहिए, जहां जल संरक्षण विभाग का दफ्तर है. सरकार को अपनी योजनाओं को लेकर भी सावधान रहना चाहिए.

उदाहरण के लिए सरकार की प्राथमिकता वाला प्रोजेक्ट नदियों को जोड़ने का है. देखिए कि केन—बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के लिए बुंदेलखंड में करीब 46 लाख पेड़ काटे जाएंगे और इससे जलग्रहण क्षेत्र पर काफी नकारात्मक असर पड़ेगा.

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सवाल : भारत में जलसंकट कितना गंभीर है और इस पर कैसे आगे बढ़ा जाना चाहिए?
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जवाब : हमारे सामने वाकई गंभीर संकट है लेकिन यह जल प्रबंधन का संकट ज़्यादा है. भारत में जल प्रबंधन को लेकर मेरे हिसाब से, चार मोर्चों पर काम किया जाना चाहिए. पहला, भूमिगत जल को लेकर है, जो भारत की जीवनरेखा है. देश की दो तिहाई से ज़्यादा सिंचित भूमि भूमिगत जल के दायरे में है. ग्रामीण घरेलू क्षेत्रों में 85 फीसदी से ज़्यादा और शहरी व औद्योगिक क्षेत्र में वॉटर सप्लाई 55 फीसदी से ज़्यादा भूमिगत जल पर निर्भर करती है. हमारी राष्ट्रीय जल नीति का मुख्य फोकस इसी पर होना चाहिए.

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सवाल : इस भूमिगत जल को कैसे सहेजा और दोबारा भरा जाए? क्या इस दिशा में हमें किसी किस्म के नियामक दखल या किसी तरह के मूल्य आधारित सिस्टम पर सोचना चाहिए?
जवाब : देखिए, ये आर्टिफिशियल रिचार्ज मैकेनिज़्म के ज़रिए संभव हो सकता है. उदाहरण के​ लिए, दिल्ली सरकार ने यमुना के बाढ़ संभावित क्षेत्र में जल संरक्षण के एक पायलट प्रोजेक्ट का ऐलान किया है और पल्ला से वज़ीराबाद के बीच एक बड़ा रिज़र्वायर बनाया जा रहा है. लेकिन, मुख्य बात भूमिगत पानी के नियमन की है. और नियमन का मतलब सिर्फ मूल्य व्यवस्था से नहीं है. हमें संसाधन के, स्रोत के स्तर पर यानी जलभर के स्तर पर ध्यान देना होगा. और वो भी विकेंद्रीयकरण जैसे तरीके से.

सवाल : भारत में वॉटर सप्लाई बेहतर करने के लिए और कहां ध्यान ​देने की ज़रूरत है?
जवाब : दूसरा मुख्य फोकस जलग्रहण यानी कैचमेंट लेवल पर ज़रूरी है. देखिए चेन्नई और एक तरह से ​तमिलनाडु भारी जलसंकट से जूझ रहे हैं जबकि ​पिछले साल मानसून में स्थिति ये थी कि सारे बांधों से पानी छलक रहा था क्योंकि उनकी स्टोरेज क्षमता से ज़्यादा पानी था. इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि हमारे कैचमेंट एरिया क्षमता, स्टोरेज, रिचार्ज और उसके बाद डिस्चार्ज हर स्तर पर पिछड़ चुके हैं. हमें इस भयानक स्थिति का खुली आंख से सामना करना होगा और वनों का कवर, आर्द्र भूमि, स्थानीय जल निकायों और मिट्टी में कार्बन तत्व के संरक्षण व बढ़ोत्तरी की तरफ सोचना होगा.

तीसरा बड़ा मोर्चा है शहरी जलस्तर प्रबंधन. तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण के चलते यहां जलस्तर तेज़ी से खिसक रहा है. शहरी जल क्षेत्र को लेकर भारत में कोई नीति नहीं है. उदाहरण देखिए कि दिल्ली जैसे मेट्रो शहर में पड़ोसी राज्यों के बांधों से पानी लेकर डिमांड की पूर्ति की जा रही है. मुंबई जैसे हमारे कई बड़े शहर कमोबेश इसी राह पर चल रहे हैं. सरकार स्मार्ट सिटी बना रही है लेकिन पानी के लिए किसी स्मार्ट सिस्टम के बगैर क्या ये मुमकिन होगा?


सवाल : इतने बड़े जलसंकट से निपटने के लिए क्या हमारी संस्थाएं समर्थ हैं या इनमें भी सुधारों की ज़रूरत है?
जवाब : संस्थाओं के स्तर पर सहयोग एक बड़ा महत्वपूर्ण फैक्टर है लेकिन विडंबना ये है कि हमारी जल नियामक संस्थाएं आज़ादी के पहले के माइंडसेट से बनी थीं, जो कोई खास विकसित नहीं हुईं. सच तो ये है कि हमारे पास पानी से जुड़ा विश्वसनीय डेटा तक नहीं है. जिस अमेरिकी एजेंसी से सर्वे के आधार पर डेटा लिया जाता है वह केवल वॉटर डेटा जुटाने पर फोकस रखती है और जल संसाधन विकास या दूसरे कामों से उसका कोई सरोकार नहीं होता. वेबसाइट पर ये डेटा डेली दिया जाता है, जिसे आप देख सकते हैं.

इस अमेरिकी जियोलॉजिकल सर्वे की भारतीय समकक्ष संस्था है सेंट्रल वॉटर कमीशन. यह आयोग वॉटर डेटा के साथ ही नीति निर्माण, टेक्किनल बॉडी, बांध डिज़ाइन, बांध सुरक्षा, बांध लॉबी, शोध विश्लेषण और कई काम कर रहा है. जिस संस्था को वॉटर प्रमोशन बॉडी के तौर पर बनाया गया था उसके दायरे इतने फैल जाने के बाद भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि भूमिगत जल देश की जीवन रेखा नहीं है. कुल मिलाकर बात ये है कि एक बड़े सुधार की ज़रूरत है और डेटा के अलग प्रबंधन पर फोकस ज़रूरी है.


सवाल : उस बात पर लौटते हैं, जो आपने कही कि ज़रूरत जल प्रबंधन की है. तो क्या आपके हिसाब से पानी के संसाधन पूरी आबादी की ज़रूरत को पूरा करने के लिए पर्याप्त हैं?
जवाब : जब आप पूरी आबादी के लिए पानी की बात करते हैं तो इसका मतलब ये नहीं होता कि राजस्थान में आप गन्ने की फसल उगा सकते हैं! या किसी सूखाग्रस्त इलाके में बोतलबंद पानी की मैनुफैक्चरिंग यूनिट लगा सकते हैं! कृषि हो या उत्पादन, आपको संसाधनों का सही ढंग से इस्तेमाल करना होगा. जहां कम पानी है, वहां की ज़रूरतों के हिसाब से कृषि या उत्पादन के बारे में फैसले लिये जाएंगे. ऐसी कई बातें हैं, जो आदर्श तौर पर नहीं होना चाहिए लेकिन हो रही हैं. पानी की उपलब्धता बरकरार रखने के लिए हमें बहुत बदलाव करने होंगे. ढर्रे वाली सोच के साथ आगे नहीं बढ़ा जा सकता.

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भूमिगत जलस्तर प्रायद्वीपीय भारत में वैसे ही सीमित है और फिर भी उसका दोहन अव्यवस्थित ढंग से हुआ.


सवाल : महाराष्ट्र के मराठवाड़ा की तरह देश के कई हिस्से सूखे की समस्या से जूझ रहे हैं, इस समस्या से कैसे निपटा जाए?
जवाब : मराठवाड़ा अपने आप में एक केस स्टडी है. देखिए महाराष्ट्र में बड़े बांधों की संख्या इतनी है कि बांध के मामले में उसके पीछे आने वाले दो तीन राज्यों के बांध मिलाकर भी उतने नहीं होते. इसके बावजूद वहां इस तरह का संकट है. पहली बात तो ये कि ये बांध डिलीवर नहीं कर रहे. दूसरी बात, भूमिगत जलस्तर प्रायद्वीपीय भारत में वैसे ही सीमित है और फिर भी उसका दोहन अव्यवस्थित ढंग से हुआ. तीसरा ये कि महाराष्ट्र, खासतौर से मराठवाड़ा व विदर्भ का पूरा जल प्रबंधन सवालों के घेरे में है और फसलों का पैटर्न भी.

इसी तरह अगर भीमा और कृष्णा नदियों के बेसिन के बारे में समझा जाए तो इनका पानी सीधे समुद्र में चला जाता है. बारिश के पानी से ये नदियां लबालब होती हैं लेकिन इसका फायदा नहीं होता क्योंकि ये पानी धाराओं में जाने के बजाय समुद्र में जाता है. इस तरफ भी ध्यान दिया जाए तो महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि तेलंगाना और आंध्र को भी बड़ा फायदा होगा.

(आईआईटी के एल्युमिनाई ठक्कर फिलहाल बांधों, नदियों पर दक्षिण एशिया नेटवर्क के संयोजक हैं.)

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First published: August 27, 2019, 2:30 PM IST
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