Mission Paani : क्या है वो तकनीक, जो सूखाग्रस्त राजस्थान की तस्वीर बदल रही है

जोहड़ में तालाब की तरह ही पानी जमा किया जाता है. हालांकि कई बातें इसे तालाब से अलग और ज्यादा असरदार बनाती हैं.

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Updated: July 16, 2019, 1:03 PM IST
Mission Paani : क्या है वो तकनीक, जो सूखाग्रस्त राजस्थान की तस्वीर बदल रही है
राजस्थान में जोहड़ आंदोलन चल रहा है (प्रतीकात्मक फोटो)
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Updated: July 16, 2019, 1:03 PM IST
देश का बड़ा हिस्सा जलसंकट और खासकर पीने के साफ पानी के संकट से जूझ रहा है. ऐसे में राजस्थान में पानी बचाने के लिए ट्रेडिशनल तरीकों पर जोर दिया जा रहा है. इसी में से एक है जोहड़ों को पुर्नजीवित करना. जोहड़ में तालाब की तरह ही पानी जमा किया जाता है. हालांकि कई बातें इसे तालाब से अलग और ज्यादा असरदार बनाती हैं. जोहड़ इतने प्रभावी होते हैं कि पुराने वक्त में घरेलू जरूरतों के अलावा सिंचाई में भी इनका पानी इस्तेमाल होता था.

क्या है जोहड़
ये पानी के संचय की एक ट्रेडिशनल तकनीक है जो राजस्थान में प्रचलित है. राज्य के अलग-अलग हिस्सों में इसके अलग नाम हैं, जैसे बाड़मेर, बीकानेर, गंगानगर और जैसलमेर में जोहड़ को सर कहते हैं तो जोधपुर में नाड़ा-नाड़ी कहते हैं. अलवर और भरतपुर में इसे जोहड़ ही कहा जाता है. जोहड़ों की बनावट चांद के आकार की होती है. जिस हिस्से पर जल का दबाव ज्यादा हो सकता है, उसे दो या तीन गुना ज्यादा गहरा बनाते हैं. जोहड़ बनाते हुए ध्यान रखा जाता है कि पानी का वाष्पीकरण न हो या कम से कम हो. यानी इसकी गहराई ज्यादा होती है, जबकि लंबाई-चौड़ाई कम होती है. जिस जगह पर मुरूम यानी एक खास तरह की गिट्टी वाली जमीन होती है, जोहड़ वहीं बनाए जाते हैं ताकि पानी लंबे वक्त तक जमा रह सके.

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जोहड़ों का इस्तेमाल राजस्थान में पुराने समय से होता चला आ रहा था (फाइल फोटो)
जोहड़ों का इस्तेमाल राजस्थान में पुराने समय से होता चला आ रहा था (फाइल फोटो)


दोबारा दिया जोर
जोहड़ों का इस्तेमाल राजस्थान में पुराने समय से होता चला आ रहा था. तकनीकी विकास से पानी बचाने की इस ट्रेडिशनल तकनीक पर रोक लग गई. बाद में वॉटर मैन के नाम से ख्यात राजेंद्र सिंह ने वापस से राजस्थान में जोहड़ों के निर्माण पर जोर दिया. साल 1985 में जोहड़ों को दोबारा जीवित किया जाने लगा. इसे जोहड़ आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है. ये आंदोलन संगठित और असंगठित दोनों ही तरह से सामने आया.
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कहां बनाए जाते हैं 
ये पब्लिक और प्राइवेट दोनों ही जगहों पर बनाया जाता है. वैसे निजी जमीन पर बने जोहड़ भी सार्वजनिक हो जाते हैं यानी सबके उपयोग के लिए खोल दिए जाते हैं. हालांकि तब ये इस्तेमाल घरेलू जरूरतों के लिए ही होता है और खेतों में सिंचाई जैसे कामों के लिए इस जोहड़ का उपयोग वही करते हैं, जिनकी जमीन पर ये बना है. यही वजह है कि जोहड़ों को सार्वजनिक जमीन पर बनाए जाने पर जोर दिया जा रहा है और इसे बनाने में गांववालों का श्रमदान भी लिया जा रहा है.

जोहड़ों को बचाने के लिए ग्रामसभाएं हो रही हैं (प्रतीकात्मक फोटो)
जोहड़ों को बचाने के लिए ग्रामसभाएं हो रही हैं (प्रतीकात्मक फोटो)


सिंचाई भी हो सकती है
जोहड़ एकदम से असरदार नहीं होते. बारिश में पानी भरने के बाद धीरे-धीरे ये पानी का स्थायी स्त्रोत बन जाते हैं. यहां तक कि साल 1950 से पहले जोहड़ सिंचाई का प्रभावी साधन हुआ करते थे. खासकर राजस्थान, बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश में इसी से पानी की बड़ी-छोटी जरूरतें पूरी होती थीं. बाद में अंग्रेजों के समय में भूमिगत पानी के इस्तेमाल पर जोर दिया जाने लगा और पानी बचाने और इस्तेमाल का ये ट्रेडिशनल तरीका पीछे छूट गया.

परंपरा को जीवित करने की कोशिश

राजस्थान में एक संगठन जोहड़ आंदोलन का अगुआ बना हुआ है. तरुण भारत संघ नाम के इस संगठन की शुरुआत अलवर के एक गांव से हुई थी. धीरे-धीरे ये इतना लोकप्रिय हो गया कि इसे जोहड़ बनाने वाले संगठन के तौर पर जाना जाने लगा. अब ये संगठन पूरे राज्य में घूम-घूमकर जोहड़ों को पुर्नजीवित करने का काम कर रहा है. जोहड़ों को दोबारा जीवित करने के कारण ही राजस्थान के कई सूखाग्रस्त इलाकों जैसे गोपालपुरा और गुवारा देवाड़ी जैसे गांवों में हरियाली है. जोहड़ों को बचाने के लिए ग्रामसभाएं हो रही हैं. गांव के लोग खुद ही फैसला लेते और श्रमदान कर रहे हैं. एक बार जोहड़ तैयार हो जाने के बाद उसके रखरखाव की जिम्मेदारी भी गांववालों की ही है.

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First published: July 16, 2019, 12:39 PM IST
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