जब मास्क के भीतर इत्र रखते थे चिकित्सक, महामारियों को मानते थे गंध से फैलने वाली बीमारी

तब मास्क चिड़िया के चेहरे के आकार का होता था, जिसमें चोंच भी निकली होती थी- सांकेतिक फोटो (flickr)

तब मास्क चिड़िया के चेहरे के आकार का होता था, जिसमें चोंच भी निकली होती थी- सांकेतिक फोटो (flickr)

साल 1347 में प्लेग फैलने पर डॉक्टरों ने अजीबोगरीब मास्क (mask during plague pandemic) बनाया. इसमें भीतर की ओर वे दालचीनी, लौंग या इत्र रखा करते थे ताकि मरीज से निकलती विषैली हवा सुगंधित हो जाए और बीमारी न फैले.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 10, 2021, 7:54 AM IST
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देश में कोरोना की नई लहर (coronavirus new wave in India) आतंक मचा रही है. पिछली लहर के मुकाबले इस बार युवा इसकी चपेट में ज्यादा हैं. यहां तक कि वैक्सीन (corona vaccine) की दोनों डोज ले चुके डॉक्टर भी संक्रमित हो रहे हैं. इसपर विशेषज्ञ चेताने लगे हैं कि अगले दो सालों तक भी मास्क पहनने की जरूरत पड़ सकती है. वैसे इससे पहले भी दुनिया में कई महामारियों के दौरान मास्क की जरूरत पर जोर दिया जाता रहा. साल 1347 में प्लेग फैलने पर डॉक्टरों ने मास्क की तरह काम करने वाली चीज बनाई, जो चिड़िया की चोंच से मिलती-जुलती थी.

क्यों पड़ी मास्क बनाने की जरूरत 

अक्टूबर 1347 में फैला ब्यूबॉनिक प्लेग आज तक के इतिहास में सबसे संक्रामक बीमारी मानी जाती है, जिसने लगभग 20 मिलियन जानें लीं. उस वक्त ब्यूबॉनिक प्लेग के बारे में खास जानकारी नहीं थी, सिवाय इसके कि ये काफी संक्रामक है. तब मरते हुए लोगों की जान बचाने में लगे डॉक्टरों के पास मास्क तो था नहीं. लिहाजा उन्होंने काफी दिलचस्प दिखने वाला मास्क तैयार किया.

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साथ ही पूरी पीपीई किट तैयार की गई

इसमें सिर से पैर तक काले कपड़े होते थे, सिर पर गोल हैट होती और नोंकदार ग्लव्स होते थे. लेकिन पीपीई किट का सबसे मजेदार हिस्सा था मास्क. ये चिड़िया के चेहरे के आकार का होता था, जिसमें चोंच भी निकली होती थी. गूगल पर ब्यूबॉनिक प्लेग डॉक्टर (bubonic plague doctor) लिखने पर इस पीपीई किट को पहनी हुई तस्वीरें देखी जा सकती हैं.

mask coronavirus bubonic plague doctor
चोंचदार मास्क बनाने का श्रेय फ्रेंच डॉक्टर Charles de Lorme को जाता है- सांकेतिक फोटो (flickr)




गंदी हवा से फैलती है बीमारी!

तब प्लेग के बारे में जानकारी न होने के कारण डॉक्टर मानते थे कि ये मरीज से निकलने वाली दूषित हवा के कारण होता है. इस दूषित हवा को miasma कहते थे. इससे ही बचाव के लिए वे लंबी चोंच वाला मास्क पहनते. चोंच के भीतर वे खुशबूदार चीजें, जैसे दालचीनी, लोबान, शहद या परफ्यूम आदि रख लेते और तब मरीज के कमरे में जाते थे. उन्हें यकीन था कि खुशबू सूंघते रहने पर गंदी हवा उनकी नाक तक नहीं जा सकेगी और वे बीमारी से बच जाएंगे.

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शाही डॉक्टर ने बनाया मास्क

चोंचदार मास्क बनाने का श्रेय फ्रेंच डॉक्टर Charles de Lorme को जाता है. वे 17वीं शताब्दी में फ्रांस के काफी ख्यात डॉक्टर थे, जो राजाओं का इलाज किया करते. पीपीई किट के साथ ही मरीज को देखने वाले लोग अपने एक लोहे की एक रॉड भी रखा करते थे. वे मरीज को देखने से पहले इससे ठेलकर पीछे करते थे. ये सोशल डिस्टेंसिंग मेंटेंन करने का 17वीं सदी का तरीका था.

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अक्टूबर 1347 में फैला ब्यूबॉनिक प्लेग आज तक के इतिहास में सबसे संक्रामक बीमारी मानी जाती है- सांकेतिक फोटो


मौत के जहाज थे वो

हालांकि जिस गंदी हवा से बचने के लिए इतने तरीके आजमाए गए, वो बीमारी हवा से नहीं, बल्कि येर्सिनिया पेस्टिस बैक्टीरिया से होती थी. चूहों में पाया जाने वाला ये बैक्टीरिया मक्खियों के जरिए इंसानों में फैलता था. बीमारी की शुरुआत होती है साल 1347 के अक्टबूर से, जब 12 जहाज इटली के सिसली बंदगाह पर लगे. जब तट पर लगने के काफी देर बाद तक जहाज से कोई नहीं उतरा तो नीचे इंतजार में खड़े लोग ऊपर पहुंचे. वहां का नजारा देखते ही चीखें निकल गईं. जहाज पर लाशों का ढेर लगा था. कुछेक लोग ही जिंदा थे. उन्हें उठाकर लाया गया और ठीक होने का इंतजार शुरू हुआ.

20 मिलियन से ज्यादा जानें गईं

जिंदा बचे लोगों की हालत ठीक नहीं थे, उनके शरीर पर गिल्टियां बनी हुई थीं, जिनसे मवाद और खून बह रहा था. उनकी देखभाल कर रहे लोग भी बीमार होने लगे. अगले 5 सालों में उन 12 जहाजों के कारण यूरोप में 20 मिलियन से भी ज्यादा जानें गईं. मौतों का ठीक आंकड़ा अब तक बताया नहीं जा सका लेकिन माना जाता है कि इसकी वजह से एक तिहाई यूरोपियन आबादी की मौत हो गई.

चीन था बीमारी की वजह

इटली और यूरोप के दूसरे देशों तक पहुंचने से पहले चीन से ही प्लेग की शुरुआत हुई थी. इतिहासकारों के अनुसार लगभग 2 हजार साल पहले चीन की वजह से ही दूसरे देशों में प्लेग का एक खास प्रकार पहुंचने लगा. अक्सर व्यापार के आने-जाने वाले जहाजों के जरिए ये फैलता था. 1340 के बाद चीन में एक बार​ फिर प्लेग ने दस्तक दी लेकिन तब ये बड़ी तेजी से दूसरे महाद्वीपों तक भी पहुंच गया.

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प्लेग से संक्रमित चूहे सामान के साथ जहाज पहुंच गए और फिर दुनियाभर में संक्रमण फैलने लगा- सांकेतिक फोटो


ये देश आए चपेट में

प्लेग से संक्रमित चूहे सामान के साथ जहाज पहुंच गए और लगभग 4 हफ्तों के रास्ते में उनसे होता हुआ संक्रमण जहाज के हरेक आदमी तक पहुंच गया. इनमें व्यापारी भी थे, नाविक भी और दूसरे कर्मचारी भी. जल्दी ही जहाज लाशों और बीमारों से पट गया. इटली पहुंचने पर इसी जहाज के जरिए बीमारी दूसरों तक पहुंची और लगभग 8 महीनों के भीतर ही बीमारी अफ्रीका, इटली, स्पेन, इंग्लैंड, फ्रांस, ऑस्ट्रिया, हंगरी, स्विट्‌जरलैंड, जर्मनी, स्कैन्डिनेविया और बॉल्टिक पहुंच चुकी थी.

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प्लेग के इलाज के लिए अजीबोगरीब तरीके

गिल्टियों पर उबलता पानी डाल देना या उस हिस्से को गर्म सलाख से दागना जैसे तरीके थे, जिसमें ज्यादातर मरीजों की इलाज के दौरान ही मौत हो जाती. जल्दी ही यूरोप के लोग बीमारी को ईश्वर की नाराजगी मानने लगे. इससे बचने के लिए वे तरीके खोजने लगे. इसी दौरान एक भयानक प्रथा जन्मी, जिसे मानने वाले ईश्वर के गुस्से से बचने के लिए खुद को कोड़े मारते, उन्हें Flagellants कहा जाता था. ये लोग साढ़े 33 दिनों तक दिन में रोज 3 बार खुद को कोड़े मारते. धीरे-धीरे ये पंथ लोकप्रिय हो गया लेकिन प्लेग ने तब भी पीछा नहीं छोड़ा.
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