क्या प्राचीन भारतीय मांसाहारी थे?

क्या प्राचीन भारतीय मांसाहारी थे?
क्या हमारे पूर्वज भी शाकाहार पर भरोसा करते थे या मांसाहार उन्हें ज्यादा पसंद था (सांकेतिक तस्वीर)

हरियाणा (Haryana) के राखीगढ़ी (Rakhigarhi) में खुदाई के दौरान तंदूर जैसे स्ट्रक्चर और चिकन की हड्डियां भी मिल चुकी हैं.

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वैज्ञानिक लगातार समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या कोरोना (coronavirus) की जड़ में चमगादड़ या कोई दूसरा जानवर था. इसी बीच इस बात पर भी बहस हो रही है कि मांसाहार हमारे कितना जरूरी है या फिर कितना खतरनाक है. बहुत से देश मीट ईटिंग पर बैन (ban on meat eating) लगाने की बात भी कर रहे हैं. सेंसस के अनुसार भारत में बड़ी आबादी पूरी तरह से शाकाहारी है. जानिए, क्या हमारे पूर्वज भी शाकाहार पर भरोसा करते थे या मांसाहार उन्हें ज्यादा पसंद था.

इंसानी शरीर की संरचना ऐसी है जिससे साफ पता चलता है कि हम सिर्फ शाकाहार खाने के लिए नहीं बने हुए हैं. इसे ऐसे समझा जा सकता है कि जो जंतु सिर्फ शाकाहार पर निर्भर होते हैं, उनका पाचन तंत्र हमसे काफी अलग होता है. जैसे गाय, हिरण और खरगोश की एनाटॉमी हमसे काफी अलग होती है, यही वजह है कि वे घास खाकर उसे पचा पाते हैं. वहीं हम पौधों में बहुतायत में मिलने वाला सेल्युलोज भी नहीं पचा सकते हैं.

इंसानी शरीर की संरचना ऐसी है जिससे साफ पता चलता है कि हम सिर्फ शाकाहार के लिए नहीं बने हैं (Photo-pixabay)




हालांकि हमारे पास पूरी तरह से मांसाहारी जानवरों जैसी भी संरचना नहीं. मिसाल के तौर पर हमारे जबड़े और दांत बड़े नहीं और न ही हमारे पंजे शिकारियों जैसे हैं. यानी अगर हम मांस खाते भी हैं तो दौड़ते हुए शिकार करके नहीं, बल्कि औजारों की मदद से शिकार करते हैं और पकाकर खाते हैं. मतलब शारीरिक संचरना के लिहाज से देखा जाए तो हम गुरिल्ला, चिंपाजी के ज्यादा करीब हैं. वे ज्यादा शाकाहारी हैं और कुछ प्रतिशत मांस भी खाने से परहेज नहीं.



तो कब से हमने शाकाहार और मांसाहार दोनों ही खाना शुरू किया?
आग और पत्थर से बने हथियारों की मदद से हमने खाने को पकाना और उसकी वैरायटी तैयार करना शुरू किया. आग ने एक तरह से बाहरी पेट का काम किया, जो खाने को पकाकर पचाने के लिए तैयार करने का काम कर देती. इससे हमारा खाने में लगने वाला काफी सारा वक्त बचने लगा. जैसे चिंपाजी को ही लें तो वो अपने दिन का 50 प्रतिशत हिस्सा खाने और उसे पचाने में लगाता है. जायंट पांडा को लें तो वो 10 से 12 घंटे खाता है और फिर पचाने में भी काफी वक्त लगता है.

जैसे-जैसे हमने मांसाहार कम किया, हमारी संरचना बदलने लगी. जबड़े और मोलर दांत छोटे हो गए. Homo Habilis के जीवाश्म बताते हैं कि उन्होंने मांस और शाकाहार दोनों साथ-साथ लेना शुरू कर दिया था.

Homo Habilis के जीवाश्म बताते हैं कि उन्होंने मांस और शाकाहार दोनों साथ-साथ लेना शुरू कर दिया था


अब बात करते हैं हमारे पुरखों की. इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार भारत के सेंसस का डाटा बताता है कि 25 प्रतिशत से ज्यादा लोग पूरी तरह से शाकाहारी हैं. हालांकि प्राचीन भारत में मांसाहार के भी प्रमाण मिलते हैं. जैसे 5 हजार साल पुरानी हड़प्पा संस्कृति के अवशेषों से पता चलता है कि काफी बड़ी आबादी मांस खाया करती होगी. वैदिक सभ्यता में भी यानी आज से लगभग 3000 साल पहले जानवरों की बलि देने के बाद उसे खाए जाने की जानकारी मिलती है.

माना जाता है कि 2500 साल पहले जैन धर्म के संस्थापक ने अहिंसा के लिए मांसाहार छोड़ पूरी तरह से शाकाहार अपनाने पर जोर दिया. इसी तरह से महात्मा बुद्ध ने भी अहिंसा पर जोर दिया लेकिन खाने को अपनाने के मामले में वे थोड़े ज्यादा प्रैक्टिकल रहे. अपने शिष्यों को उन्होंने वो सब खाने की सलाह दी, जो भी भिक्षा के दौरान उनके पात्र में डाल दिया जाए. वक्त के साथ देश में शाकाहार पर जोर बढ़ने लगा. ज्यादातर ब्राह्मण और वैश्य धर्म के लोगों ने मांसाहार छोड़ शाकाहार अपना लिया.

हरियाणा के राखीगढ़ी में खुदाई में तंदूर जैसे स्ट्रक्चर और चिकन की हड्डियां भी मिल चुकी हैं


हरियाणा के राखीगढ़ी में खुदाई के दौरान तंदूर जैसे स्ट्रक्चर और चिकन की हड्डियां भी मिल चुकी हैं. बता दें कि राखीगढ़ी सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization) की जगहों में शामिल है. यहां पर 2500 बीसी पुराने मानव कंकाल भी मिल चुके हैं जो हड़प्पा सभ्यता के दौर के माने जा रहे हैं. नेशनल म्यूजियम में सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान हमारे पूर्वजों के खानपान के तरीके भी दिखाए जा चुके हैं. इसमें मांसाहार भी शामिल था. हालांकि इसके बाद म्यूजियम की आलोचना भी हुई क्योंकि वहां कई देवी-देवताओं जैसे बुद्ध की प्रतिमा भी है. इसका दूसरा पक्ष भी उभरकर आया, जिसके मुताबिक भगवान बुद्ध भिक्षु थे इसलिए खाने के लिए वे भिक्षा पर ही निर्भर थे. ऐसे में जो भी उनके पात्र में आता होगा, वे वही खाते होंगे, फिर चाहे वो मांसाहार ही हो.

फूड हिस्टोरियन पृथा सेन द मिंट से बातचीत में कहती हैं कि हड़प्पा सभ्यता में लोग मछली और कई तरह के मीट लेते रहे होंगे, साथ ही वे जौ-बाजरा भी खाते रहे होंगे. उनके अनुसार मांसाहार और शाकाहार का मेल हमारे डीएनए में है, जो हमारे पूर्वजों से चला आ रहा है.

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